stri purush /स्त्री-पुरुष (Article On Gender Equality )
एक महीने पहले की बात है, नेहा डिलीवरी के बाद पहली बार ऑफिस जा रही थी,
दरअसल पिछले छः महीने से वो मेटरनिटी लीव पर थी, इन बीते हुए दिनों में वो
प्रेग्नन्सी, डिलीवरी, और फिर बच्चे में इतना बिजी रही कि उसे इस बात का ख्याल ही
नही रहता था कि कब सुबह हो रही है और कब रात, लेकिन आज उसके लिए वक्त पर उठना
जरूरी था, और इतना ही नही, सुबह के नाश्ते, बच्चे के लिए जो नेनी रखी है उसको निर्देश
देना एवं खुद का और पतिदेव नीरज का टिफ़िन लगाना एवं घर के छोटे-मोटे काम सभी तो
पूरे करने हैं उसे, और फिर इतने दिनों बाद ऑफिस जाना है, बहुत ही कम शब्दों में
अगर कहा जाए तो नेहा आज घबराई हुई भी है और उत्साहित भी।
उसने नेनी और मैड को सभी काम समझाए और वादा किया की वो बार-बार बच्चे के
बारे में पूछती रहेगी, एवं नीरज से भी थोड़ी-थोड़ी देर में बच्चे की खैर-ख़बर लेने की
बात कही एवं बच्चे को प्यार कर ऑफिस के लिए निकल गयी। ज़ाहिर-सी बात है आज मेटरनिटी
लीव के बाद ऑफिस में पहला दिन होने की वजह से सभी उससे मिलने के लिए उत्साहित थे,
कोई माँ बनने की बधाई दे रहा था, तो कोई पार्टी माँग रहा था, और ऑफिस में आज ढ़ेर
सारा काम था सो अलग, हद से ज्यादा बिजी होने की वजह से उसे वक्त ही नही मिला घर पर
फोन कर बच्चे की खैर-ख़बर लेने का, और जब ऑफिस खत्म होने के बाद वो घर पहुँची तो नीरज
उस पर ये कहते हुए भड़कने लगा कि घर और बच्चे की जिम्मेदारी उसकी है इसलिए उसे ही
बार-बार घर पर फोन कर खैर-ख़बर लेनी चाहिए थी, और उसे ये फरमान सुना दिया कि घर और
ऑफिस दोनों ही उससे नही संभलते तो नौकरी छोड़ दे।
पूरे दिन की थकान की वजह से और घर पर हुए हंगामे की वजह से उस रात नेहा
बिना खाना खाए सो गयी। अगले दिन जब उठी तो नीरज आराम से अखबार पढ़ रहा था, ये सोच
कि अब उसका मन शांत हो गया होगा उसने रात वाली बात को जारी रखते हुए कहा कि वो
नौकरी नही छोड़ना चाहती, बल्कि उम्मीद करती है कि वो भी उसके कामों में बराबर की
मदद करवाए। उसके इतना कहते ही घर में फिर से महाभारत छिड़ गयी। नेहा को ऑफिस जाना
था इसलिए उसने मौन धारण कर इस युद्ध पर विराम लगाया और जाने की तैयारी करने लगी,
लेकिन आज उसने हर आधे घंटे में नेनी को फोन कर बच्चे की खैर-खबर ली, उसे लगा आज तो
जरूर नीरज उससे खुश होगा, लेकिन वो गलत थी, आज भी घर में महाभारत हुई, बस कारण कुछ
अलग था, इसी प्रकार हर दिन किसी ना कारण से नीरज घर में कलेश करता और वजह किसी को
नही पता होती। नेहा सोचती शायद उसे बच्चे को नेनी के पास छोड़ना ठीक नही लगता, कभी
लगता नीरज को नेहा की सेहत की चिंता है, शायद उसे लगता है कि घर और ऑफिस
संभालते-संभालते वो थक जाती होगी, कभी कुछ लगता तो कभी कुछ लेकिन असली वजह नेहा
समझ ही नही पाती और ना ही नीरज साफ-साफ शब्दों में कुछ बताता।
एक दिन जब नीरज उस पर चिल्ला ही रहा था कि अचानक से उसके मुँह से वो शब्द
निकल गए जो नेहा सोच भी सकती थी, दरअसल नीरज को तकलीफ थी तो बस नेहा के प्रमोशन से
और उसकी वजह से बढ़ने वाली सैलरी से, जैसे ही नेहा को नीरज की नाराजगी की वजह पता
चली उसने पिछले महीनों में हुई बातचीत के ग्राफ को याद करने की कोशिश की तो महसूस
हुआ कि वाकई में नीरज की आँखों में उसकी बड़ी हुई तनख्वाह खटक रही थी।
अब जब सारी बातें साफ हो चुकी थी तो उसने नीरज को समझाने की काफी कोशिश की,
उसे ये यकीन दिलाया कि वो कभी भी अपनी बढ़ी हुई सैलरी पर प्राउड नही करेगी और कभी
भी उसे नीचा दिखाने की कोशिश भी नही
करेगी, नीरज का ही औहदा घर में ऊँचा है और वही रहेगा। लेकिन उसके द्वारा किए गए
सभी वादे व्यर्थ गए, नीरज की नाराजगी बरकरार रही और अंत में घर की शांति के लिए
नेहा को ही नौकरी छोड़नी पड़ी।
ये किस्सा किसी एक घर का नही है, बल्कि उन सभी घरों का है जहाँ पत्नी अपने
पति से ज्यादा कमाने लगती है, या औहदे में उनसे बड़ी हो जाती है, दरअसल इसमे गलती
किसी की भी नही है, गलती है तो बस संस्कारों की, वो संस्कार जो घर के बड़ों के
द्वारा दिए जाते है, वो संस्कार जो लड़के और लड़की में भेदभाव करते है। लड़कों को
हमेशा लड़कियों से ऊँचा बताया जाता है, एवं लड़कियों को हमेशा यही सिखाया जाता है कि
उन्हे ताउम्र लड़कों के लिए त्याग करने है, चाहे वो उसका भाई हो, पति हो या बेटा,
लड़कों को सिखाया जाता है कि लड़कियाँ उनके पैरों की जूती है और लड़कियों को सिखाया
जाता है कि उन्हे हमेशा लड़कों के आगे झुक कर रहना है, उनकी हर खुशी का ख्याल रखना
है, इसके लिए चाहे उन्हे खुद की खुशियों का त्याग ही क्यों ना करना पड़े, जैसे की
नेहा ने किया।
ऐसा नही है कि हमारे देश में सभी के विचार ऐसे ही हैं, बल्कि हमारी
जनसंख्या का एक बहुत बड़ा भाग ऐसा भी है जो दोनों को ही बराबर मानता है, कोई भेदभाव
नही करता, तब ही तो अनगिनीत क्षेत्रों में लड़कियाँ अपना नाम कमा रहीं है, लेकिन उन
लोगों की भी कमी नही है जो भेदभाव भरे संस्कार देते है। इस भेदभाव को रोकना होगा,
लोगों को अपने विचार बदलने होंगे, लड़का हो या लड़की दोनों को ही हर क्षेत्र में
बराबरी का दर्जा देना होगा, अगर हम एक तरफ उम्मीद करें कि लड़की आर्थिक रूप से घर
में मदद करे तो लड़कों को भी घर का काम सिखाने की कोशिश करनी चाहिए, ये काम मेरा
है, या ये काम उसका है, ये सभी बातें दिमाग से निकालनी होंगी, तब ही तो देश उन्नति
करेगा।
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