Kaatil Kaun / कातिल कौन (Story On Murder Mystery)

"मैं सच कह रहा हूँ इन्स्पेक्टर साहब मुझे कुछ नहीं पता, मैं बेकसूर हूँ, प्लीज आप मुझे मत मारिए।" पुलिस स्टेशन में एक अपराधी की भाँति पीटते हुए श्याम शंकर ने गुहार लगाई।

"जब तेरी मालकिन की हत्या हुई उस वक्त घर पर तू ही था, और तू कह रहा है कि तुझे कुछ नहीं पता, ऐसा कैसे हो सकता है, हो ना हो मुझे तो लगता है तू ही कातिल है या फिर तू कातिल से मिला हुआ है।" ऐसा कहते हुए इन्स्पेक्टर साहब ने श्याम शंकर की पीठ पर एक और डंडा मार दिया।

"आह...साहब माना कि उस घटना के समय मैं घर पर ही था, लेकिन इससे ये तो साबित नहीं हो जाता ना कि गुनाहगार मैं ही हूँ।" श्याम शंकर ने डंडा पड़ने के बाद कराहते हुए कहा।

"बात तो तेरी सही है छोरे, लेकिन तुझे ये कैसे पता नहीं चला कि मारने वाला कौन था, अरे इतनी बेरहमी से मारा है तेरी मालकिन मिसेज डेविड को, थोड़ा तो चीखी-चिल्लाई होगी वो बेचारी" इन्स्पेक्टर साहब ने अपना डंडा घुमाते हुए जैसे ही पूछा श्याम शंकर की आँखों में कुछ ऐसी चमक आ गयी जैसे कि उसे कुछ याद आ गया हो।

"याद आया साहब, एक बार मुझे मैडम के चीखने की आवाज आई थी।"

"तो तू उनसे पूछी चीखने की वजह ?"

"नहीं, उस वक्त उनका कमरा अंदर से बंद था और कमरे में उनके साथ साहब थे तो मैंने सोचा......बस इसलिए बिना कुछ पूछे ही अपने काम में लगा रहा।" श्याम शंकर ने हाथ के इशारे से इन्स्पेक्टर साहब को कुछ समझने की कोशिश करते हुए कहा।

"हाँ, हाँ ठीक है, तो फिर उसके बाद तूने कोई आवाज नहीं सुनी।"

"नहीं साहब"

"उसके बाद देखा मिसेज डेविड को"

श्याम शंकर कुछ सोचते हुए, "नहीं साहब उसके बाद मैंने मेमसाहब को देखा ही नहीं, अगर देखी तो बस उनकी लाश"

"साहब मुझे तो लगता है वो साला डेविड ही काम तमाम कर गया अपनी बीवी का" इतने में ही पास ही खड़े एक हवलदार ने कहा।

"हो सकता है, लेकिन सबूत क्या है, और वो तो इतना बेचार और सीधा-सादा लगता है कि कोई भी उस पर शक नहीं करेगा, हाँ ये श्याम शंकर जरूर बदमाश नजर आता है।" इन्स्पेक्टर साहब ने फिर से श्याम शंकर की ओर डंडा घुमाते हुए कहा।

"रहम कीजिए साहब, यकीन मानिए मैं बेकसूर हूँ, मुँहफट हूँ साफ बात बोलता हूँ, लेकिन कभी झूठ नहीं बोलता और किसी की हत्या, तौबा-तौबा ऐसा तो मैं सोच भी नहीं सकता।" श्याम शंकर ने अपने दोनों कान पकड़कर कहा।

"चल ये बता कि मिसेज डेविड से मिलने के लिए कौन-कौन आता था, मेरा मतलब है किन लोगों के साथ उनका मिलना-जुलना ज्यादा था।" इन्स्पेक्टर साहब ने अपनी कुर्सी पर बैठते हुए पूछा।

"ज्यादा मिलने वाले तो नहीं थे उनके, लेकिन एक दास बाबू जरूर थे जो हर दूसरे दिन मैडम से मिलने आते थे, और दोनों के बीच घंटों तक वार्तालाप होती थी।"

"किस वक्त आते थे?" इन्स्पेक्टर साहब के पूछते ही,

"दिन में, ज्यादातर ग्यारह बजे के बाद ही आते थे।" श्याम शंकर के कहते ही,

"उस वक्त तो मि. डेविड घर पर नहीं होते होंगे।"

"हाँ वो तो नहीं होते, वैसे भी दास साहब कभी डेविड साहब के सामने आए ही नहीं वो तो मैडम के दोस्त थे तो उन्ही से मिलने आते थे।"

"और बैठते कहाँ थे, मेरा मतलब है बैठक में या कहीं ओर"

"इन्स्पेक्टर साहब, वो तो मैडम के साथ बेडरूम में ही बैठते थे, और दोनों घंटों तक हँसी-मज़ाक करते रहते थे।"

"तुम कभी गए हो बातचीत के दौरान कमरे में?" इन्स्पेक्टर साहब की शक की सुई अब दास बाबू की ओर मूड गयी थी।

"हाँ साहब कई बार, कभी चाय देने के लिए तो कभी नाश्ता"

"वैसे श्याम शंकर तुम काम कब से कर रहे हो डेविडस के घर पर" फिर से पूछे गए इस सवाल से श्याम शंकर घबरा गया।

"लगभग दस सालों से साहब, लेकिन ये सवाल तो आपने मुझे गिरफ्तार करने से पहले भी पूछा था साहब" श्याम शंकर ने घबराते हुए कहा।

"हाँ, हाँ भूल गया था, दुबारा पूछ लिया तो फाँसी चढ़वा देगा क्या।"

"तौबा, मेरी तौबा साहब ये क्या बोल रहे है आप" श्याम शंकर ने एक बार फिर से अपने दोनों कान पकड़ते हुए कहा।

"अच्छा ये बता दास बाबू और मिसेज डेविड बात क्या करते थे।" इन्स्पेक्टर साहब की सुई फिर से दास बाबू और मिसेज डेविड की ओर घूम गयी।

"कुछ नहीं" श्याम शंकर के कहते ही,

"कुछ नहीं, अरे पागल है क्या तू, वो कुछ बात नहीं करते थे या फिर तू सुन नहीं पाता था।" इन्स्पेक्टर साहब ने झुँझलाते हुए पूछा।

"दरअसल साहब हम कुछ सुन नहीं पाते थे, क्योंकि जब भी हम उनके कमरे में जाते वो दोनों चुप हो जाते या फिर मौसम की बातें करने लगते।"

"अच्छा ये बता उनका रिश्ता कैसा था, मेरा मतलब है एक दोस्त का या इससे कुछ ज्यादा" ये सवाल इन्स्पेक्टर साहब ने श्याम शंकर की आँखों में आँखें ड़ालकर पूछा।

"साहब, सच बताऊँ तो एक दोस्त से कुछ ज्यादा ही था, इसलिए तो दोनों ज्यादातर वक्त बेडरूम में ही गुजारते थे, नहीं तो किसी भी पराए मर्द को कोई भी स्त्री अपने बेडरूम में क्यों घुसाएगी।" श्याम शंकर के कहते ही,

"और ये सब मि. डेविड को पता था।"

"मेरे ख्याल से दास बाबू रोजाना आते है ये तो नहीं पता था, लेकिन दास बाबू मैडम के दोस्त है ये जरूर पता था।"

"आखिरी बार दास बाबू मिसेज डेविड से मिलने कब आए थे?"

"घटना के एक दिन पहले दोपहर तकरीबन दो बजे के आस-पास, क्योंकि उस वक्त मैडम अपना लंच खत्म कर उठी ही थी।" श्याम शंकर के कहते ही,

"हम्म, अच्छा ये दास बाबू रहते कहाँ है।"

"ये तो नहीं पता साहब, कभी जानने की जरूरत ही महसूस नहीं हुई।"

"कभी बातों ही बातों में सुना तो होगा।" इन्स्पेक्टर साहब के पूछते ही,

श्याम शंकर कुछ सोचते हुए, "शायद कांदिवली या फिर बोरिवली पता नहीं साहब गलत जानकारी देने का क्या फायदा, आप डेविड साहब से पूछ लेना"

"हम्म, अब शक की सुई तीन लोगों के ऊपर है, पहला तू, दूसरे मि.डेविड और तीसरे दास बाबू" इन्स्पेक्टर साहब के कहते ही,

"साहब मैं क्यों?" श्याम शंकर ने हाथ जोड़ते हुए जैसे ही पूछा।

"क्योंकि हत्या के समय तू घर पर ही था, समझा" इतना कह इन्स्पेक्टर साहब ने श्याम शंकर की पीठ पर एक धौल जमा दी।

"लेकिन साहब" श्याम शंकर गिड़गिड़ाया, लेकिन किसी ने इस ओर कोई ध्यान नहीं दिया, और उसके लाख मना करने के बावजूद इन्स्पेक्टर साहब के इशारे पर उसे जेल में बंद कर दिया गया।

 

कुछ देर बाद डेविडस के घर पर, "मि. डेविड, कैसा रिश्ता था आपका अपनी पत्नी मिसेज डेविड के साथ" इन्स्पेक्टर साहब के पूछते ही,

"अच्छा था, जैसा हर पति-पत्नी का होता है, थोड़ा प्यार, थोड़ी तकरार" मि. डेविड के कहते ही,

"और दास बाबू के साथ कैसे रिश्ते थे आपके"

"कुछ खास नहीं, वो मेरी पत्नी के दोस्त थे और कभी-कभार ही हमारे यहाँ मिलने आते थे, वो भी उस वक्त जब मैं घर पर ही होता। क्योंकि मेरी बीवी हमेशा कहती थी कि मि. डेविड जब भी मैं किसी गैर मर्द से मिलूँ आप मेरे साथ रहा करिए, अकेले मिलना मुझे अच्छा नहीं लगता है, बल्कि उन्हे गैर मर्दों से अकेले मिलने में ड़र लगता था, और दास बाबू तो उनके दोस्त थे फिर भी" मि. डेविड एक साँस में अपनी बात कह गए, लेकिन उसी क्षण इन्स्पेक्टर साहब के ज़ेहन में श्याम शंकर की कही हुई बात भी घूमने लगी।

"दास बाबू का ठिकाना बता सकते है आप" इन्स्पेक्टर साहब के पूछते ही,

"कांदिवली" मि। डेविड के कहते ही,

"चलिए आप भी हमारे साथ उनके घर पर, कुछ पूछताछ करनी है उनसे'

"सर मैं जाकर क्या करूँगा, और मेरी मानसिक स्थिति को तो समझने की कोशिश कीजिए, दो दिन पहले ही मेरी बीवी का खून हुआ है।" मि. डेविड के कहते ही,

"इसके लिए सॉरी मि. डेविड, लेकिन आपको पुलिस की मदद करनी पड़ेगी, वैसे भी इस वक्त गुनाहगारों की लिस्ट में आपका नाम भी है।"

"व्हाट ! आप कहना चाहते है कि मैंने अपनी बीवी का खून किया है।"

"हो सकता है, या फिर नहीं" इन्स्पेक्टर साहब के कहते ही,

"सर आप मुझ पर इल्जाम लगा रहे है, लेकिन कोई बात नहीं, क्योंकि मैं जानता हूँ जब तक असली गुनाहगार नहीं मिल जाएगा आप इस केस से जुड़े सभी व्यक्तियों पर शक करेंगे, श्याम शंकर को तो आपने गिरफ्तार भी कर लिया है।"

"यस मि. डेविड, आप बेहद ही समझदार नजर आते है, अब बेहतर यही होगा की हम दास बाबू के यहाँ चले पूछताछ करने के लिए।" इन्स्पेक्टर साहब के कहते ही सभी पुलिस की जीप में जाकर बैठ गए।

 

कुछ देर बाद दास बाबू के घर पर, "दास बाबू, जैसा की आपको पता ही होगा मिसेज डेविड का खून हो गया है।"

"जी सर, सुनकर धक्का लगा, वो मेरी एक अच्छी दोस्त थी।"

"आखिरी बार कब मुलाकात हुई थी आपकी उनसे?" इन्स्पेक्टर साहब के पूछते ही,

"यही कोई एक महीना पहले" दास बाबू ने पूरे विश्वास के साथ कहा।

"उसके बाद आपका मिलान नहीं हुआ।"

"नहीं सर, वैसे भी मैं मि. डेविड की मौजूदगी में ही इनके घर जाता था, और पिछले एक महीने से तो ये अपने ऑफिस में काफी बिजी चल रहे है।

"ओके, दास बाबू अगर जरूरत पड़ी तो आपसे दुबारा पूछताछ की जाएगी, अभी हम चलते हैं।"

"मैं आपकी हर संभव मदद करूँगा सर, मैं भी चाहता हूँ कि मेरी दोस्त के कातिल का पता चले।" इतना कहे दास बाबू ने इन्स्पेक्टर साहब और मि. डेविड को विदा किया।

 

थोड़ी देर बाद पुलिस स्टेशन पर, "सावरकर, यह केस तो बेहद ही पेचीदा है, श्याम शंकर, और दास बाबू की बातें तो आपस में मिलती ही नहीं, और इस वजह से शक कभी घर के नौकर पर जाता है, कभी मि. डेविड पर, तो कभी दास बाबू पर" इन्स्पेक्टर साहब ने सब-इन्स्पेक्टर सावरकर से कहा।

"मुझे तो लगता है मामला प्रेम का है।" सावरकर के कहते ही,

"प्रेम ! वो कैसे" इन्स्पेक्टर साहब ने आश्चर्यचकित होकर पूछा।

"सीधी सी बात है, श्याम शंकर की बातों के मुताबिक मिसेज डेविड और दास बाबू का कुछ ना कुछ तो चक्कर था और इसकी खबर मि. डेविड को तो थी ही नहीं" सावरकर के कहते ही,

"हाँ लेकिन इस हिसाब से तो कत्ल मि. डेविड का होना चाहिए था सावरकर, क्योंकि मिसेज डेविड और दास बाबू के बीच तो वो आ रहे है।"

"सर, ऐसा तो नहीं है कि हम गलत गाड़ी में सवार हो गए हो।" सावरकर के कहते ही,

"तुम कहना क्या चाहते हो?" इन्स्पेक्टर साहब ने आश्चर्यसे पूछा।

"मेरा मतलब है हो सकता है खूनी कोई ओर ही हो, और खून करने की वजह भी कुछ ओर हो"

"पता नहीं, मेरे हिसाब से हमें एक बार दुबारा घटनास्थल का मुआयना करना चाहिए।" इन्स्पेक्टर साहब के इतना कहते ही वो खुद और सब-इन्स्पेक्टर सावरकर व कुछ हवलदार तुरंत पुलिस जीप में बैठ डेविडस के घर की ओर जाने लगे।

 

कुछ देर बाद, "बड़ी अजीब बात है, बार-बार मुआयना करने के बावजूद भी कोई सुराग हाथ नहीं लग रहा है, बल्कि गुत्थी उलझती ही जा रही है। इन्स्पेक्टर साहब ने घटनास्थल पर चारों ओर अपनी नजरें घुमाते हुए कहा।

"सर, एक मिनिट इधर आईए" इतने में ही हवलदार भानु प्रताप ने बाथरूम में से आवाज लगाई।

"हाँ कहो भानु प्रताप" सब इन्स्पेक्टर सावरकर के पूछते ही,

"ये देखिए एक चिट्ठी मिली है।"

"चिट्ठी ! क्या लिखा है इसमे" इतना कह सब-इन्स्पेक्टर सावरकर उसे खोलकर पढ़ने लगे।

"सर" और अगले ही पल वो चिट्ठी लेकर इन्स्पेक्टर साहब की ओर दौड़े।

"क्या हुआ सावरकर"

"आप ये पढिए, सारा माजरा समझ में आ जाएगा, और कातिल कौन हैं, ये भी पता चल जाएगा।" सावरकर के कहते ही इन्स्पेक्टर साहब वो चिट्ठी पढ़ने लगे, जैसे-जैसे वो पढ़ते जा रहे थे उनकी आँखों की चमक बढ़ती जा रही थी।  

"सावरकर, इसी वक्त महिला कॉन्स्टेबल बुलवाकर दास बाबू के घर चलो।" इतना कह इन्स्पेक्टर साहब और सब इन्स्पेक्टर अपनी पूरी टीम के साथ पुलिस जीप में जाकर बैठ गए।

 

एक घंटे बाद, "इन्स्पेक्टर साहब आपके पास क्या सबूत है कि कत्ल मेरी पत्नी मोनिका ने किया है।" दास बाबू ने लगभग चिल्लाते हुए पूछा।

"चिल्लाइए मत दास बाबू, अगर हमारे पास सबूत नहीं होता तो हम इन्हे गिरफ्तार करने आते ही क्यों, लेकिन आश्चर्य की बात तो यह है कि श्याम शंकर ने आपकी पत्नी का नाम तक नहीं लिया, जबकि कत्ल वाली रात वो मि. डेविड के घर पर ही थी।" सब इन्स्पेक्टर सावरकर के कहते ही,

"लेकिन सर आप मुझे पूरी बात समझाइए तो सही" दास बाबू के कहते ही,

"मिसेज दास, आई मीन मोनिका जी, आप बतायेंगी सबकुछ या फिर हम बताए।" इन्स्पेक्टर साहब के  कहते ही,

"मैं बताती हूँ......हाँ ये सच है कि मिसेज डेविड का कत्ल मैंने ही किया है, लेकिन ये भी सच है कि श्याम शंकर मुझसे मिला हुआ था, उसे मेरे द्वारा की गयी प्लानिंग के बारे में सबकुछ पता था, लेकिन जब कत्ल हुआ उस वक्त वो किचन में था, या फिर ये कह लीजिए ये हमारी प्लानिंग का हिस्सा था।"

"तब ही उसने आपका नाम नहीं लिया, ठीक है आगे बताईए" इन्स्पेक्टर साहब ने बीच में ही टोका।

"जब से मेरी शादी हुई है तब से मैं इतना तो जानती हूँ कि मेरे पति दास बाबू और मिसेज डेविड एक बहुत ही अच्छे दोस्त है, लेकिन ये बात मुझे कुछ साल पहले ही पता चली कि ये दोस्ती नहीं बल्कि प्यार है, मुझसे ये बर्दाश्त नहीं हुआ, मैंने दास बाबू को कई बार इस रिश्ते को तोड़ने की सलाह दी, डराया, धमकाया, हर संभव कोशिश की लेकिन वो मिसेज डेविड का साथ छोड़ने के लिए तैयार ही नहीं थे, जब मैंने देखा कि मेरे लिए अपने पति को उस औरत के चुंगल से निकालना असंभव है तो मेरे दिमाग में उसे रास्ते से हटाने का ख्याल आया, लेकिन ये मुश्किल था, क्योंकि श्याम शंकर हर वक्त घर पर ही मौजूद रहता, नतीजन मुझे श्याम शंकर को कान्फिडन्स में लेना पड़ा, और धीरे धीरे उसे अपने प्लान से अवगत कराने लगी, लेकिन मेरा साथ देने के लिए उसने बहुत बड़ी रकम की माँग की, जिसे देना मेरे लिए असंभव था, यानि की मुझे मेरा प्लान डूबता हुआ नजर आया। फिर एक दिन श्याम शंकर ने मेरे सामने एक ऐसा प्रस्ताव रखा जिसे सुन मेरे पैरों तले जमीन खिसक गयी।" इतना कहते ही मिसेज दास बाबू की नजरें झुक गयी।

"कैसा प्रस्ताव मोनिका?" एकाएक ही दास बाबू ने पूछा।

"अपने साथ एक रात गुजारने का प्रस्ताव.....मैं किसी भी कीमत पर मिसेज डेविड को रास्ते से हटाना चाहती थी इसलिए मैंने वो प्रस्ताव स्वीकार कर लिया। तय कार्यक्रम के अनुसार हमे उस रात की अगली रात मिसेज डेविड का कत्ल करना था, ये सबकुछ हुआ भी लेकिन कुछ अड़चनों के साथ" कहते-कहते मिसेज दास की आँखें नम हो गयी।

"अड़चनें ! कैसी अड़चनें मिसेज दास बाबू?" इन्स्पेक्टर साहब ने पूछा।

"दरअसल उस दिन अचानक से मि. डेविड घर वापिस आ गए, मेरा मतलब है, उस दिन उन्हे किसी काम से चेन्नई जाना था, लेकिन फ्लाइट मिस हो जाने की वजह से वो घर वापिस आ गए और मुझे मेरा प्लान फेल होता हुआ नजर आया, फिर पता चला कि उनकी नेक्स्ट फ्लाइट की बुकिंग कन्फॉर्म कर दी गयी है जो कि लगभग तीन घंटे बाद थी, ये जानकर वो वापिस एयरपोर्ट की ओर चले गए और मुझे मेरे प्लान पर अमल करने का मौका मिल गया।" इतना कह अभी मिसेज दास बाबू साँस लेने के लिए रुकी ही थी कि इन्स्पेक्टर साहब ने एक सवाल दाग दिया।

"मिसेज दास बाबू जब ये सबकुछ हो रहा था उस वक्त आप कहाँ थी?"

"श्याम शंकर के कमरे में"

"ओह, मिसेज दास बाबू मानना पड़ेगा आपकी नफरत को, अपनी पति की प्रेमिका को रास्ते से हटाने की धुन इस कदर आप पर सवार थी कि आपने उस घर के नौकर को कान्फिडन्स में लेने के लिए उसके साथ सबंध बना लिए।" इतने में ही सावरकर ने कहा।

"सर लेकिन आपको मुझ पर शक कैसे हुआ, मैंने तो कोई सबूत भी नहीं छोड़ा था, बल्कि जो भी सबूत मैंने पैदा किए थे वो श्याम शंकर के खिलाफ थे और इसी वजह से आपने उसे गिरफ्तार भी किया था।" एकाएक ही मोनिका की सवालिया नजरें इन्स्पेक्टर साहब के चेहरे पर जाकर टिक गयी।

"मिसेज दास बाबू, आपने हर संभव कोशिश करी श्याम शंकर को इस हत्या के इल्जाम में फँसाने की, और आप काफी हद तक सफल भी हुई, लेकिन वो आपसे भी ज्यादा शातिर निकला उसने अपने मोबाईल में सारी बातें रिकार्ड कर ली और ये बात एक चिट्ठी में लिख बाथरूम में छुपा दी, फिर क्या था हमने उसका मोबाईल खंगाल ड़ाला, और सबकुछ सामने आ गया।"

"उसने मुझे धोखा दिया है, विश्वासघात किया है मेरे साथ, मैंने उसके साथ......फिर भी उसने,......आई हेट हिम" मिसेज दास चिल्लाने लगी।

"चिल्लाइए मत, आपका साथ देने के लिए उसे भी कड़ी से कड़ी सजा दी जाएगी, क्योंकि कातिल का साथ देने वाला भी कातिल ही होता है। कांस्टेबल महिमा गिरफ्तार कर लो मिसेज दास बाबू को। " इतना कह इन्स्पेक्टर साहब अपनी जीप में बैठ पुलिस स्टेशन के लिए रवाना हो गए।

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