Aisi Hi Hoti Hai Naari (Story On A Family)

 “ऋतु याद है ना आज शाम बनारस से पापा-मम्मी आने वाले हैं” नवीन ने रसोई में नाश्ते की तैयारी करती अपनी पत्नी ऋतु से जैसे ही पूछा.

“हाँ याद है, कैसे भूल सकती हूँ कि मेरे सास-ससुर फिर से आ रहे हैं मेरा खून पीने”

“ऋतु, प्लीज मत बोलो ऐसे, वो जैसे भी है मेरे माँ-बाप हैं, और मेरी पत्नी होने के नाते तुम्हारा फ़र्ज़ बनता है उनकी सेवा करने का, उनका ध्यान रखने का” नवीन के कहते ही, 

“फ़र्ज़ तुम्हारे भी बनते थे नवीन मेरे माँ-बाप के प्रति......उनका क्या?” ऋतु ने आँखें दिखाते हुए जैसे ही कहा नवीन मूक ही गर्दन झुका अपने कमरे में वापिस चला गया।

“अब क्यों चुप हो गए, सारे फ़र्ज़ मेरे ही हैं तुम्हारे परिवार के प्रति तुम्हारे कुछ भी नहीं, अरे जवाब तो देते जाओ।“

“मम्मी, अब बस भी करो, कितना सुनाओगी पापा को” इतने में ही वहाँ नवीन और ऋतु की बेटी सिया आ गई.

“अरे मर गए मेरे माँ-बाप तो अपनी इकलौती औलाद के दर्शन किए बिना तुम्हारी वजह से, अरे शादी हो जाती है तो क्या एक लड़की का अपने माँ-बाप से कोई संबंध नहीं रह जाता, अगर ऐसा है तो तुम्हारी बहन क्यों आए-दिन तुम्हारे ही घर पड़ी रहती है” ऋतु अचानक से फट पड़ी. 

एक साल पहले ही की तो बात है, जब एक दिन ऋतु के पीहर के पास ही रहने वाले गुप्ता अंकल का फोन आया था कि उसके मम्मी-पापा का एक्सीडेंट हो गया है और उसे तुरंत ही वहाँ बुलाया गया है, क्योंकि ऋतु के माँ-बाप का उसके सिवा कोई ओर नहीं था, बेटा हो या बेटी वो ही उनकी सबकुछ थी.

लेकिन जैसे ही उसने ये खबर ऑफिस में फोन कर नवीन को दी तो उसने कहा कि गुप्ता अंकल से कह दो कि इतनी जल्दी आना संभव नहीं अभी तो वो देखभाल कर ले हम शनिवार-इतवार की छुट्टी में आ जायेंगे.  

उसकी ये बात सुन ऋतु फोन पर ही पूरी ताकत से साथ उस पर चिल्लाई थी, तो नवीन ने ये तर्क दिया कि अगले दो दिन उसकी जरूरी मीटिंग है और सिया के भी तो एग्जाम चल रहे हैं.

लेकिन जब ऋतु ने अकेले जाने की बात करी तो नवीन ने ये कह मना कर दिया कि उसका और सिया का खाना कौन बनाएगा, इसके जवाब में ऋतु से बहुत सारे रास्ते बताए, जिससे कि नवीन और सिया को किसी भी परेशानी का सामना नहीं करना पड़ेगा. लेकिन नवीन ने उसकी कोई भी बात नहीं मानी, नतीजन ऋतु अपने माँ-बाप की खैर-ख़बर लेने के लिए नहीं जा पाई और अगले दिन उन दोनों की मौत की ख़बर आ गयी और ये खबर सुन ऋतु नवीन पर फट पड़ी, खूब सुनाया उसने नवीन को और आजतक अपने माँ-बाप की मौत का जिम्मेदार उसे ही मानती है.  

 

शाम को जैसे ही नवीन के मम्मी-पापा घर में दाखिल हुए, “प्रणाम पापा जी, प्रणाम मम्मी जी” ऋतु ने अपने सास-ससुर के पाँव छूते हुए कहा।

“खुश रहो बेटा, क्या बात है तुम दुखी नज़र आ रही हो, क्या हमारे आने की खुशी नहीं है तुम्हें”

“नहीं माँ ऐसी कोई बात नहीं है, बल्कि ऋतु तो आप लोगों का बेसब्री से इंतजार कर रही थी” ऋतु कुछ कहती इससे पहले ही नवीन बोल पड़ा.

“फिर ठीक है, बहु के हाव-भाव देख मैं तो कुछ ओर ही सोच बैठी थी, चलो अब यहाँ आए हैं तो अपने बेटे बहु से खूब सेवा करवायेंगे” अपनी सास की कही हुई बात का ऋतु जवाब देती उससे पहले ही,

“बिल्कुल माँ, आपका हक बनता है, अपनी बहु से सेवा करवाने का” दरअसल नवीन पूरी कोशिश कर रहा था कि ऋतु कुछ भी ना बोले, क्योंकि उसे ड़र था कि वो अपने मन की भड़ास उसके मम्मी-पापा पर ना निकाल दे, और ऋतु भी नवीन की मनोस्थिति समझ रही थी इसलिए उसने भी कुछ नहीं बोला. और कुछ इधर-उधर की बातों, तो कुछ नवीन के ड़र, तो कुछ ऋतु के गुस्से के बीच नवीन के मम्मी-पापा का स्वागत उसके घर में हो गया.

 

रात आठ बजे, “सिया जरा आकर खाना बनवाने में मेरी थोड़ी मदद करवा दो”

“जी मॉम”

“आज डिनर बनाने में थोड़ा लेट हो गया, तुम्हारे दादा जी को दवाई भी तो लेनी है।“ दाल में तड़का लगाते हुए ऋतु ने सिया से कहा.

“इट्स ओके मॉम, मैं हेल्प करवाती हूँ, काम जल्दी हो जाएगा।

“थैंक्स बेबी, लव यू” ऋतु का इतना ज्यादा सहज व्यवहार देख सिया को आश्चर्य हो रहा था, लेकिन उसने ज़ाहिर नहीं होने दिया, और अपनी मम्मी की मदद करवाती रही।

फिर बेहद ही शांति भरे माहौल में हँसते-हँसाते सबका डिनर भी हो गया, लेकिन इस दौरान भी नवीन के दिल की धड़कने बढ़ी ही रहीं.

रात के खाने के बाद जब सभी अपने-अपने कमरों में सोने चले गए और ऋतु भी रसोई समेट चुपचाप उठ छत की ओर चल पड़ी, और वहाँ पहुँच कुछ देर तक तो उसने खुद पर काबू रखा फिर अचानक से फूट-फूटकर रो पड़ी, वो बार-बार अपने दिवंगत मम्मी-पापा से माफी माँगने लगी, क्योंकि कुछ हद तक वो उनकी मौत का जिम्मेदार नवीन से ज्यादा खुद को समझती थी, उसे लगता था वो उनके पास जाने की नवीन से जिद भी तो कर सकती थी, जब कुछ चाहिए होता है तब भी तो जिद करती है, फिर उस दिन क्यों नहीं की, लेकिन कही ना कही वो कुछ हद तक नवीन को भी दोषी समझती थी क्योंकि उस वक्त नवीन ने उसके मम्मी-पापा को महत्त्व नहीं दिया, क्या उस वक्त उसके खुद के  मम्मी-पापा होते तो भी क्या वो उन्हे नजरंदाज कर देता, और इन सब बातों के लिए वो अपने सास-ससुर को तो बिल्कुल भी दोषी नहीं मानती, तो उन्हे सजा क्यों दे, इसलिए उनका पूरा ध्यान रखने का, उन्हे किसी भी प्रकार की शिकायत का मौका नहीं देने का निश्चय तो वो पहले ही कर चुकी थी.

अगले दिन सुबह, “ऋतु मुझे माफ कर दो, तुम्हारे मम्मी-पापा को जब हमारी जरूरत थी तो मैंने उन्हे नजरंदाज कर दिया, अगर उस दिन हम वक्त पर उनके पास पहुँच जाते तो आज निश्चित रूप से वो हमारे साथ होते” नवीन ऋतु के सामने आकर माफी की मुद्रा में हाथ जोड़े खड़ा हो गया.

“तुमसे किसने कहा कि मेरे मम्मी-पापा अब इस दुनिया में नहीं हैं, जरा बाहर गार्डन में जाकर देखो दोनों चाय-बिस्कुट का लुफ़्त उठा रहे हैं.” इतना कह ऋतु मुस्कुरा दी, और उसका कथन सुन नवीन की आँखें नम हो गयी, और ऋतु की दरियादिली के आगे उसका सिर झुक गया, और वो समझ गया कि वाकई में नारी एक देवी का ही रूप होती है, और साथ ही उसे ऋतु के मम्मी-पापा के साथ उनके आखिरी वक्त में किए गए व्यवहार के लिए दुख भी हुआ, जिसका वो सिर्फ पश्चाताप ही कर सकता था।

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