Sukh Ke Sab Saathi, Dukh Mein Naa Koi (Story On A Helpless Brother)
“अविनाश बाबू नमस्कार, क्या हाल-चाल है?” अभी अविनाश घर से निकला ही था कि
पीछे से आवाज आयी।
“कौन ? अरे मनन बाबू, नमस्कार, कैसे है आप, आज तो बहुत दिनों बाद दर्शन हुए
है आपके”
“क्या बताऊँ, पिछले कुछ दिनों से थोड़ी परेशानी में था, वैसे तुम बताओ कैसे
हो, और इतनी सुबह-सुबह कहाँ जा रहे हो”
“मैं बिल्कुल ठीक हूँ, और फिलहाल तो सुबह की सैर के लिए जा रहा था, लेकिन
मेरी छोड़िए आप बताइए किस परेशानी की बात कर रहे हैं।“ अविनाश बाबू के पूछते ही,
“क्या बताऊँ दोस्त......तुम तो जानते ही हो कि पाँच साल पहले मैंने अपनी
बहन रिंकू की शादी एक सम्पन्न परिवार में की थी, हमें लगता था कि लड़का, परिवार
सबकुछ अच्छा है , सुलझे हुए विचारों के लोग है, नए जमाने के साथ चलने वाले,
लेकिन.....” मनन बाबू ने अविनाश बाबू के साथ सैर पर जाते हुए कहा।
“लेकिन क्या मनन बाबू, उन्होंने रिंकू को सताया है क्या”
“अब क्या बताऊँ अविनाश बाबू, वो जालिम मेरी बहन को आए-दिन पीटते हैं,
क्योंकि वो उन्हे घर का चिराग नहीं दे पाई ।“ कहते-कहते मनन बाबू की आवाज भर्राने
लगी।
“जहाँ तक मुझे याद आ रहा है, उसकी शादी के साल-डेढ़ साल बाद ही मैंने सुना
था कि उसने एक बेटी को जन्म दिया है, क्या उसी वजह से उसे वो लोग सताते हैं।“
“हाँ, और अभी पिछले साल उसने एक और
बेटी को जन्म दिया है, उसके बाद तो उसके ससुरालवालों का अत्याचार अपनी सीमा ही पार
कर गया, अगर माँ-बाबू जिंदा होते तो सबकुछ संभाल लेते, मेरी तो समझ में ही नहीं आ
रहा कि क्या करूँ, कैसे अपनी बहन की रक्षा करूँ, वो जालिम ये भी नहीं समझते कि
लड़का या लड़की होने की वजह औरत नहीं बल्कि मर्द होता है, अपने बेटे से तो वो कुछ
कहते नहीं, बल्कि रिंकू के ऊपर ही ज़ुल्म करते रहते हैं।“ मनन बाबू के कहते ही,
“आप उसे अपने घर ले आइए”
‘नहीं ला सकता’
‘लेकिन क्यो ! क्या उसके
ससुरालवालें नहीं भेजते?” अविनाश बाबू ने आश्चर्य से पूछा।
“नहीं, उसके ससुरालवाले तो चाहते है कि वो दोनों बेटियों को लेकर जल्द से
जल्द घर से निकल जाए।“
“तो फिर दिक्कत क्या है मनन बाबू” अविनाश बाबू ने रास्ते में पड़ने वाले
नारियल पानी के ठेले से दो नारियल खरीदते हुए पूछा।
“तुम्हारी भाभी” मनन बाबू ने अविनाश बाबू से नारियल हाथ में लेते हुए कहा।
“मैं कुछ समझा नहीं”
‘वो नहीं चाहती कि रिंकू अब हमारे घर वापिस आए, वो उसे कतई पसंद नहीं करती,
और अगर मैं रिंकू को अपने घर ले भी आया तो, मेरे सामने ना सही लेकिन मेरे पीछे
मेरी पत्नी उसके साथ दुर्व्यवहार करेगी, उसके साथ नौकरों जैसा व्यवहार करेगी।“
“मनन बाबू, मैं जानता हूँ रिंकू की शादी से पहले भाभी जी का व्यवहार रिंकू के
प्रति अच्छा नहीं था, लेकिन क्या पता अब वो बदल गयी हो।“
“दोस्त, वो मेरी बीवी है, जानता हूँ मैं उसे अच्छी तरह से, चाहे कुछ भी हो
जाए उसके मन में रिंकू के लिए कभी भी दया का भाव नहीं आ सकता”
“तो फिर आप रिंकू के पति से बात क्यों नहीं करते।“ अविनाश बाबू के कहते ही,
“की थी दोस्त, लेकिन वो तो अपने माँ-बाप का ही साथ दे रहे हैं।“ मनन की
आवाज से साफ प्रतीत हो रहा था कि वो हार चुका है।
“तुम इतनी मुसीबत में हो और मैं भी तुम्हारे लिए कुछ नहीं कर पा रहा हूँ।“
अविनाश बाबू के कहते ही,
“नहीं, नहीं दोस्त ऐसा कुछ नहीं है, तुम मेरी मदद कर सकते हो, अगर भाभी भी
राजी हो तो” मनन बाबू के कहते ही,
“मैं ! मैं क्या कर सकता हूँ।“
“तुमसे एक विनती है, कुछ दिनों के लिए मेरी बहन को अपने घर में पनाह दे
दो।“ ऐसा कहते हुए खुद-ब-खुद ही मनन बाबू के हाथ जुड़ गए और नजरें झुक गयी।
“मैं कुछ समझा नहीं मनन बाबू”
“दोस्त, मैं अब रिंकू और उसके पति का तलाक करवाना चाहता हूँ और इसमे मुझे
तुम्हारी मदद चाहिए।“
“हाँ बोलो मनन बाबू, क्या कर सकता हूँ मैं आपके लिए”
“मैंने सोचा है कि रिंकू को यहाँ ले आऊँ, और फिर उसकी पढ़ाई दुबारा से शुरू
करवा दूँ, बस अपनी कॉलेज की पढ़ाई पूरी कर ले, उसके बाद कहीं छोटी-मोटी नौकरी लग
जाएगी तो खुद का और बच्चियों का भरण-पोषण कर लेगी, लेकिन यहाँ लाकर उसे कहाँ रखूँ,
इसलिए इस बारे में तुमसे बात कर रहा हूँ, काश मैंने पहले ही उसकी पढ़ाई पूरी करवा
दी होती।“
“हाँ दोस्त मैं कर तो सकता हूँ तुम्हारी मदद, लेकिन क्या भाभी जी को अच्छा
लगेगा ये सब सुनकर” अविनाश बाबू के पूछते ही
“नहीं, नहीं उसे पता नहीं चलना चाहिए अगर ऐसा हुआ तो मैं अपनी बहन की कोई
मदद नहीं कर पाऊँगा।“ मनन बाबू के कहते ही
“जानता हूँ मनन बाबू, भाभी जी कभी भी रिंकू का भला नहीं चाहेंगी, खूब सुनकर
रखा है अपनी बीवी से उनके बारे में, लेकिन उन्हे पता चल गया तो.....आप तो जानते है
औरतों के पेट में बात नहीं पचती, कहीं ऐसा ना हो मेरी बीवी ही जाकर बोल दे।“
अविनाश बाबू के कहते ही,
“दोस्त, तुमने मेरे बात सुनने के लिए इतना वक्त निकाला, शुक्रिया, लेकिन
तुम बिल्कुल नहीं बदले हो, घुमा-फिराकर कैसे किसी को ना बोला जाये, तुम ही बेहतर
समझ सकते हो।“ मनन बाबू ने निराश होते हुए कहा।
“नहीं, नहीं दोस्त तुम गलत समझ रहे हो, मेरा वो मतलब नहीं था, मैं तो बस कह
रहा था कि अगर भाभी जी को पता चला तो उनके हमारे परिवार के साथ भी सम्बन्ध खराब हो
जायेंगे, आप तो जानते है मेरी बीवी और भाभीजी अच्छी सहेली हैं।“ अविनाश ने जैसे ही
अपनी बात रखी,
“कोई बात नहीं दोस्त, अगर कोई मदद करना चाहे तो राह निकल ही आती है, अगर
कोई करना ही नहीं चाहे तो कोई क्या करे, लेकिन इन बातों से मुझे एक शिक्षा मिली
है, चाहे कुछ भी हो जाए हमें अपनी बेटियों को खूब पढ़ाना चाहिए, और हो सके तो उन्हे
इतना सक्षम बनाना चाहिए कि वो अपने पैरों पर खड़ी हो सके, जिससे की जरूरत पड़ने पर
उन्हे किसी के आगे हाथ नहीं फैलाना नहीं पड़े। दोस्त आज मैं खुद तो बहुत लाचार
महसूस कर रहा हूँ, लेकिन तुम फिक्र मत करना, तुम्हारी ओर से मेरे मन में कोई मैल
नहीं है......ये तो दुनिया की रीत है, सुख के सब साथी, दुख का ना कोई” और इतना
कहते ही मनन बाबू गुनगुनाते हुए वापिस चले गए, और अविनाश बाबू दोस्त की मदद ना कर
पाने का दर्द दिल में लिए बस जाते हुए देखता रहे।
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