Naari Ki Shakti (Story On Women Empowerment)
मैं दोपहर आराम करने के बाद एक कप चाय और बिस्किट लेकर अपना मनपसंद
धारावाहिक जो की शाम पाँच बजे स्टार-प्लस पर प्रसारित होता था, देखने बैठी ही थी
कि अचानक से डोर-बेल बज उठी, उठकर दरवाजा खोला तो सामने मेरी बचपन की सहेली कुमुद
खड़ी हुई थी। “कुमुद ! व्हाट ए सप्राइज़” मैं उसे देखते ही खुशी से उछल पड़ी।
“हाय, राशि, हाउ आर यू” उसकी आवाज में उदासीनता थी।
“क्या हुआ...... चल अंदर आ......सब ठीक तो है” मैं उसका हाथ पकड़ जबरदस्ती
घर के अंदर खींचने लगी।
“तू चाय पी रही थी?” कुमुद ने चाय का कप सामने देख सवाल दागा।
“हाँ, तू बैठ तेरे लिए भी बनाती हूँ।“ इतना कह मैं रसोई की ओर जाने लगी।
“रुक, रहने दे मन नहीं है।“
“कुमुद क्या हुआ सब ठीक तो है, तू इतनी उखड़ी-उखड़ी क्यों लग रही है।“ मैंने
उसका चेहरा अपने दोनों हाथों में लेकर पूछा।
“हाँ मैं ठीक हूँ, तू बता कैसा चल रहा है।“
“अगर ठीक है तो तेरी चेहरे पर इतनी उदासी क्यों है, ऐसा लग रहा है जैसे अभी
रो पड़ेगी।“ मेरे कहते ही,
“नहीं, नहीं तो, अच्छा बता तेरे साहब कब तक आयेंगे?”
“वो तो सात बजे तक आयेंगे, तू जानती तो है, उनकी छोड़ पहले अपनी इस उदासी का
कारण बता, मैं जानती हूँ जरूर कोई बात है, नहीं तो हमेशा खिलखिलाने वाली मेरी सखी
कुमुद कभी उदास हो ही नहीं सकती।“ मैंने अभी अपनी बात पूरी की ही थी कि वो
फूट-फूटकर रो पड़ी।
“कुमुद ! क्या हुआ ! तू रोने क्यों लगी।“ उसे रोता देख मैं बुरी तरह से
घबरा गयी।
“राशि......मैं बर्बाद हो गयी, विक्रम......”
“क्या विक्रम, क्या हुआ तेरे साहब
को !” मैंने उसे सोफ़े बिठाते हुए पूछा।
“राशि, विक्रम का किसी लड़की के साथ......” इतना कहते ही कुमुद मेरे गले लगकर
जोर-जोर से रोने लगी।
“ये तू क्या कह रही है, नहीं ऐसा नहीं हो सकता, तेरे साहब तो बेहद ही शरीफ
लगते हैं, मैंने तो कभी उनको नजरें उठाते हुए भी नहीं देखा।“
“हाँ मुझे भी ऐसा ही लगता था कि वो शरीफ हैं, लेकिन एक दिन उनकी असलियत
मेरे सामने आ ही गयी।“
“जरा खुल कर बताएगी हुआ क्या?” मैं टी. वी. बंद कर उसके पास आकर बैठ गयी।
“पिछले महीने की बात है, एक दिन जब मैं मॉल में कुछ खरीददारी करने गयी थी
तो, मुझे अचानक से विक्रम जैसा लगने वाला एक आदमी नजर आया, फिर अगले ही पल ख्याल
आया कि वो तो ऑफिस के काम से शहर से बाहर गया हुआ है, लेकिन पता नहीं क्यों मुझे
वो बिल्कुल विक्रम ही लग रहा था, जब छुपते-छुपाते मैंने किसी भी तरह से उसे देखा
तो वो विक्रम ही था, वो भी किसी लड़की के साथ, वो लड़की भी उसे विक्रम ही पुकार रही
थी, मुझे यकीन ही नहीं हुआ, क्योंकि मेरी जानकारी के हिसाब से तो वो शहर में ही
नहीं था।“
“फिर, फिर क्या हुआ?” मैं सबकुछ जानने के लिए उत्सुक होने लगी थी।
“मैंने विक्रम को फोन किया तो उसने कहा कि वो एक मीटिंग में बिजी है, मुझे
पता था कि वो मुझसे झूठ बोल रहा है, लेकिन अभी मैं उससे कुछ नहीं कहना चाहती थी,
इसलिए उसके वापिस घर लौटने का इंतजार करने लगी, दो दिन बाद जब वो वापिस आया तो
मैंने उसे मॉल वाली बात बतायी, तो जानती हो वो जोर-जोर से हँसने लगा, और बोला
कुमुद तुम चलते हुए भी सपनें देखती हो क्या? “
“फिर, फिर तूने क्या कहा?” मेरे पूछते ही,
“कहती क्या, मेरे मन का वहम होगा ये सोच चुप हो गयी, लेकिन दो दिन बाद
मैंने विक्रम को उस लड़की से फोन पर बात करते हुए फिर से पकड़ लिया, लेकिन उसने मुझे
फिर से झुठला दिया।“ इतना कहते ही कुमुद ने मुझसे पानी लाने का इशारा किया।
“सॉरी, वो मैं पानी पूछना तो भूल ही गयी” इतना कह मैं उसके लिए तुरंत पानी
ले आई।
“बार-बार मुझे विक्रम पर शक हो रहा था, लेकिन वो हर बार मुझे झुठला देता,
मुझे भी लगने लगा कि शायद मैं ही गलत हूँ, लेकिन कल सुबह जब मैं दो दिन के लिए
मम्मी के घर पहुँची ही थी कि वहाँ जाकर पता चला कि पापा-मम्मी तो बुआ के घर गए हुए
हैं, क्या करती वापिस लौटने के अलावा मेरे पास कोई चारा भी नहीं था, लेकिन मैंने
जान-बूझकर विक्रम को ये बताया ही नहीं कि मैं वापिस आ रही हूँ, जिस तरह से मैंने
पापा-मम्मी को सप्राइज़ दिया था, उसी प्रकार विक्रम को भी देना चाहती थी, लेकिन ये
अलग बात थी कि दोनों ही जगह मुझे ही सप्राइज़ मिल गया।“ इतना कहते ही कुमुद ने एक
लंबी साँस ली, जिसका कि मैंने फायदा उठाया,
“अंकल-आंटी का घर पर ना मिलना तेरे लिए सप्राइज़ था, इतना तो मैं समझ गयी,
लेकिन विक्रम की ओर से क्या सप्राइज़ मिला” मेरे पूछते ही,
“उसकी बाहों में एक लड़की......”
“क्या ! “
“हाँ राशि, जब मैं दरवाजे का लॉक खोलकर जैसे ही विक्रम को सप्राइज़ देने के
इरादे से घर के अंदर गयी तो वो बेड़ रूम में एक लड़की के साथ था, वो लड़की विक्रम की
बाहों में थी” कुमुद के इतना कहने के बाद कुछ देर तक मेरे घर में एक दिल दहला देने
वाला सन्नाटा छा गया, जिसकी वजह थी कि हम दोनों ही नहीं समझ पा रहे थे कि अब आगे
क्या बोले। लेकिन आखिरकार इस चुप्पी को मैंने ही तोड़ा,
“तो फिर अब आगे क्या सोचा है, और विक्रम का क्या कहना है?”
“आगे क्या करूँ कुछ समझ में नहीं आ रहा, कभी सोचती हूँ उसे तलाक दे दूँ,
फिर अगले ही पल ख्याल आता है कि तलाक दे दिया तो आगे मेरा क्या होगा, वैसे भी अपने
समाज में तलाकशुदा की कोई इज्जत नहीं है, और आर्थिक रूप से भी तो मैं उस पर निर्भर
हूँ ।“ कुमुद के कहते ही,
“यही तो हमारी गलती है, ना जाने क्या सोचकर शादी तय होते ही अपनी नौकरी छोड़
देते हैं, यही गलती मैंने भी तो की थी।“
“राशि, तू ही बता मैं क्या करूँ”
“इस बारे में अब विक्रम का क्या कहना है?” मेरे पूछते ही,
“कह रहा है कि चाहे कुछ भी हो जाए वो उस लड़की को नहीं छोड़ सकता।“
“हाँ तो हो गया फ़ैसला, दे दो तुम उसे तलाक” मैंने तपाक से जवाब दिया।
“फिर ये समाज क्या कहेगा।“
“कुमुद समाज हम लोगों से ही बनता है, और जो लोग तुम पर उँगली उठायेंगे वो
अगले दिन दूसरा शिकार मिलते ही उसकी ओर मुड़ जायेंगे और तुम्हें भूल जायेंगे, और मेरी
तो समझ में नहीं आ रहा कि विक्रम की गलती की सजा तुम्हें क्यों मिलेगी।“
“यही तो मुश्किल है राशि, गलती पत्नी की हो तो उसे गुनाहगार समझा जाए तो
ठीक है, लेकिन अपने देश में तो पति की गलती की सजा भी पत्नी को ही मिलती है, जानती
हो जब लोगों को पता चलेगा कि हम दोनों में तलाक हो रहा है तो कोई ये नहीं कहेगा कि
विक्रम गलत है, बल्कि सभी ये कहेंगे कि मुझमे ही कोई कमी होगी, या फिर मैंने ही
विक्रम को रिझाने की कोशिश नहीं की होगी, जब ही तो वो किसी दूसरी लड़की के चक्कर
में फँसा।“
“हाँ बात तो तेरी ठीक है, लेकिन इसका मतलब ये तो नहीं ना कि हम अपने पति का
हर जुल्म सहे।“
“हाँ तू ठीक कह रही है, मैं कल ही किसी अच्छे से वकील का पता करती हूँ, अब
मैं कमजोर नहीं पड़ूँगी, और अपनी टीचर की नौकरी के लिए भी स्कूल्स में अर्जी देती
हूँ।“ अब कुमुद में थोड़ा आत्मविश्वास नजर आ रहा था।
“अंकल-आंटी को पता है।“ मेरे पूछते ही,
“नहीं, लेकिन मेरी ज़िंदगी है, और इसका फ़ैसला भी मैं ही करूँगी, राशि जानती
है तेरे घर आने से पहले मैं काफी ड़री हुई थी, ऐसा लग रहा था जैसे कि मेरी ज़िंदगी
ही खत्म हो गयी, बहुत ही दर्दनाक अनुभव हो रहा था, शायद मैं उसे शब्दों में ना बता
सकूँ, लेकिन अब सोचती हूँ, जब मेरी गलती ही नहीं है, तो क्यों उस इंसान की गलती की
सजा पाऊँ जिसको मेरी परवाह ही नहीं है, मैं फिर से अपने पैरों पर खड़ी होऊँगी, फिर
से नौकरी करूँगी, कोशिश करूँगी की विक्रम से अलग होने का मेरी ज़िंदगी में कोई
प्रभाव ना पड़े।“ कुमुद ने चेहरे पर एक सुकून नजर आने लगा था।
“अच्छा अब तो चाय पियेगी ना” मैंने माहौल को थोड़ा और हल्का करने की कोशिश की।
“हम्म, जरूर, चल मैं भी तेरे साथ किचन में चलती हूँ।“ और फिर वो पूरे विश्वास के साथ मेरे पीछे-पीछे किचन की ओर चल पड़ी। और मैं ये सोचने लगी नारी शक्ति के बारे में जो उसमे ही होती है लेकिन पहचान नहीं पाती।
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