Papa Ji (Story On Family)

 ”दादाजी खाना तैयार है, आकर ले लीजिए।“ मेरे भतीजे की पत्नी प्रिया ने जैसे ही पहली मंजिल से आवाज लगाई, तुरंत पापा ऊपर जाने के लिए सीढ़ियों की ओर बढ़ गए।

“पापा रुको, मैं लाती हूँ आपका खाना” ये कह मैंने उन्हे रोकने की कोशिश की।

“अरे आप तो आज ले आओगे खाना, बाद में तो मुझे ही लाना है, इसलिए मेहरबानी करके मेरी आदतें खराब मत करो।“ पापा ने हँसतें हुए कहा।

“कोई बात नहीं बाद में आप ले आना, फिलहाल तो मुझे ही लाने दो।“ ये कह मैं फटाफट सीढ़ियाँ चढ़ने लगी।

घर की पहली मंजिल पर भैया व उनका परिवार रहता है, और ग्राउन्ड फ्लोर पर मम्मी के जाने के बाद पापा अकेले रहते है।

“नमस्ते भाभी” मैंने ऊपर पहुँचते ही लिविंग रूम में तख्त पर बैठी भाभी का अभिवादन किया।“

“नमस्ते, कैसी हो” भाभी के स्वर में रूखापन साफ झलक रहा था।

“मैं ठीक हूँ, आप कैसे हो।“

“हम भी ठीक हैं, हमें क्या होगा।

“हम्म, सब ठीक ही रहना चाहिए।“

“अरे बुआ जी नमस्ते, आप आए हो खाना लेने दादा जी का”

“हाँ आज मैं आ गयी, सोचती हूँ जब भी यहाँ आऊँ पापा को थोड़ा आराम दे दूँ, नहीं तो उन्हे ही खाना लेने के लिए ऊपर आना पड़ता है।“ मैंने अप्रत्यक्ष रूप से ताना मारा, जिसका की यकीनन प्रिया और भाभी पर कोई असर नहीं हुआ।

“मैं परोस देती हूँ खाना” ये कह प्रिया रसोई की ओर जाने लगी।

“प्रिया रुक, तू क्यों परोस रही है, ये आयीं हुई है ना तो इन्हे ही परोसने दे, इन्हे पापा जी के साथ-साथ हमें भी तो आराम देना चाहिए, क्यों दीदी, सही कहा ना मैंने” भाभी ने बड़ी ही कुटिलता से कहा।

“हाँ, हाँ क्यों नहीं” और फिर उनकी कुटिल प्रवर्ति को नजरंदाज कर मैं पापा का खाना परोसने लगी।

“तुम भी आ जाना खाना खाने, राजमा-चावल बनाए हैं।“ जैसे ही मैं पापा की प्लेट लेकर नीचे जाने लगी भाभी भी मेरे पीछे-पीछे सीढ़ियों तक आ गयी।

“नहीं भाभी, मैं खाकर आयी हूँ।“

“थोड़ा तो चलेगा”

“नहीं”

“तो फिर शाम की चाय ऊपर ही पी लेना।“ भाभी ने औपचरिकता की।

“देखती हूँ।“ ये कह जैसे ही मेरे कदम नीचे की ओर बढ़ने लगे।

“शाम की चाय तो ये नीचे ही पियेगी, रोजाना मैं बनाता हूँ, आज ये बनाएगी हम दोनों के लिए” सीढ़ियों के पास ही खड़े पापा ने हमारी बातें सुन कहा।

“ठीक है, कोई जरूरत हो तो बता देना।“ इतना कह भाभी ने अपना फ़र्ज़ पूरा किया।

 

“क्या बनाया है खाने में” कम दिखाई देने की वजह से पापा ने अपनी प्लेट में हाथ फैराते हुए मुझसे पूछा।

“अरहर की दाल और सूखे आलू की सब्जी है।“ मेरे कहते ही,

“हम्म, ऐसा कर दाल हटा दे, फ्रिज में से दही निकाल ले, कई बार कह दिया फिर भी ये लोग समझते ही नहीं है कि मुझे अरहर की दाल हजम नहीं होती, बार-बार वो ही बना कर दे देते हैंl“ पापा ने नाराजगी जताते हुए कहा।

मैं फटाफट से कुछ ओर बना दूँ” मैने जैसे ही पूछा, पापा की नाराजगी थोड़ी और बढ़ गयी।

“अब तू कुछ बनाएगी तो फिर मैं खाना कब खाऊँगा, वैसे आलू की सब्जी से दिक्कत नहीं है मुझे, लेकिन कुछ रसेदार साथ में हो तो सही है, दाँत नहीं होने की वजह से सूखा-सूखा खाया नहीं जाता” इतना कह पापा दही व आलू की सब्जी से रोटी खाने लगे और मैं वही पास रखी कुर्सी पर बैठ उनसे बातें कर लगी।

ऐसा नहीं है कि ये घटनाक्रम आज पहली बार घटित हुआ है, ये तो रोज ही होता है, हाँ अगर मेरे सामने होने की बात करूँ तो महीनें में तीन से चार बार तो हो ही जाता है, क्योंकि मेरा ससुराल मात्र आधे घंटे की दूरी पर होने की वजह से मैं पापा से मिलने महीनें में तीन-चार बार तो चली ही आती हूँ, वैसे मन तो इससे ज्यादा मिलने का करता है लेकिन ससुराल की ज़िम्मेदारियाँ और मायके में भैया-भाभी के आगे इज्जत बनाए रखनी भी जरूरी है। वैसे इसकी कोई जरूरत नहीं है, क्योंकि उन्होंने कभी मेरी इज्जत की ही नहीं, और ना ही कभी उनके बच्चों ने, अगर सच कहूँ तो मेरा मायके जाने का एकमात्र कारण सिर्फ पापा हैं।

“क्या हुआ क्या सोचने लगी।“ अचानक ही पापा की आवाज से मैं चौंक गयी।

“नहीं कुछ भी तो नहीं”

“तो फिर पानी क्यों नहीं दे रही।“

“ओह सुना नहीं”

“और फिर कह रही है कुछ सोच नहीं रही।“ पापा के ऐसा कहते ही मैं मुस्कुराते हुए उनके गिलास में पानी ड़ालने लगी।“

“ज्यादा मत सोचा कर, जो चल रहा है उसे स्वीकार करो, और लोगों को माफ करते चलो, क्षमा वीरस्य भूषणम, समझी कुछ” कहीं ना कहीं पापा अप्रत्यक्ष रूप से कह रहे रहे थे कि वो सब जानते है कि मैं क्या सोच रही हूँ।

“हाँ, वैसे मैं कुछ नहीं सोच रही थी।“ मैंने साफ झूठ बोल दिया, लेकिन पापा भी समझ रहे थे कि मैं झूठ बोल रही हूँ। क्योंकि वो भी जानते थे कि उनके साथ होने वाले ऐसे व्यवहार से मैं नाखुश थी, सच कहूँ तो गुस्सा ज्यादा था, और सबसे ज्यादा गुस्सा तो मुझे प्रिया पर आता था, एक सताईस-अठाईस साल की कम उम्र लड़की कैसे अस्सी साल के बुजुर्ग जिनकी की नजरें भी कमजोर है से कह सकती है कि आप ऊपर आकर खाना ले जाओ, मैं इसमे ज्यादा गलती भाभी की समझती हूँ क्योंकि उनका फ़र्ज़ बनता था अपनी बहु को ये सब बातें समझाने का। खुद तो पैरों के दर्द की वजह से बार-बार सीढ़ियाँ चढ़ने उतरने में असमर्थ है, बहु को भी तकलीफ नहीं देना चाहती, तो फिर क्या अस्सी साल के पापजी सारे काम करेंगे।

“थोड़ी देर में सोने जाऊँगा, तब तक तू भी थोड़ा आराम कर ले, फिर साथ बैठकर चाय पीयेंगे, और हाँ तेरे लिए बेसन के लड्डू और मठरी मँगवा रखी है, खा लेना, और ले भी जाना।“ पापा ने अपनी थाली उठाते हुए कहा।

“लाओ मैं ले जाती हूँ थाली, और साफ भी कर देती हूँ।“ इतना कह जैसे ही मैं उनके हाथ से थाली लेने लगी,

“क्यों मेरी आदतें खराब कर रही है, एक बार तू माँज देगी, फिर तो मुझे ही माँजनी होगी।“

“कामवाली से क्यों नहीं मंजवा लेते।“

“मुश्किल से आठ-दस बर्तन होते हैं पूरे दिन में, इसके लिए भी कामवाली रखूँ।“ पापाजी ने अपनी बात रखी।

“अरे जो यहाँ साफ-सफाई करने आती है उससे करवाओ ना” मैंने लगभग चिल्लाते हुए कहा।

“तो फिर मेरा समय कैसे गुजरेगा, बोर हो जाता हूँ अकेले बैठे-बैठे, कोई बात करने वाला ही नहीं है, तो फिर कुछ काम ही कर लूँ, इस बहाने शरीर भी चलता रहेगा और टाइम भी कट जाएगा।“ पापा के तर्क ने मुझे निरुतर कर दिया, क्योंकि मैं जानती थी, वजह सिर्फ घर के माहौल से ध्यान हटाना था, वो कहते नहीं थे कभी, लेकिन भैया और उनके परिवार का व्यवहार उनके लिए असहनीय था, लेकिन उनकी मजबूरी थी की सहना जरूरी था। लेकिन आज मेरे मायके में मेरे पापा के जो भी हालात है, उनसे मैंने बहुत कुछ सीखा है, शायद इसलिए मैं अपने सास-ससुर की बहुत इज्जत करती हूँ, उन्हे उन सब तकलीफों से दूर रखने की कोशिश करती हूँ जो कि आज मेरे पापा को हो रहीं है, रखने को तो पापा को भी इन तकलीफों से दूर रख लूँ, किन्तु बेटी के घर नहीं रहना और उसके घर का खाना नहीं खाने वाली बात के आगे मैं हार जाती हूँ।

“क्या हुआ क्या सोचने लगी?” एक बार फिर से पापा ने मुझे विचारों के भँवर से बाहर निकाला।

“नहीं कुछ नहीं।“ मैंने संक्षिप्त सा उत्तर देते हुए कहा।

“अच्छा ठीक है मैं सोने जा रहा हूँ, तू भी थोड़ा आराम कर ले।“ इतना कह पापा अपने बिस्तर पर लेट गए। दोपहर का खाना खाने के बाद आधा- एक घंटा आराम करना उनकी पुरानी आदत है।

 

शाम के चार बज रहे थे, पापा उठ चुके थे, और मैं उनके और खुद के लिए रसोई मैं चाय बना रही थी, घर में सब कैसे हैं तेरे, सास-ससुर कि तबीयत कैसी रहती है?” पापा ने यूँ ही एक औपचारिक सवाल पूछा,

“ठीक है सब”

“ध्यान रखा कर सबका, तेरे सास-ससुर की भी उम्र हो रही है, कोशिश करो ज्यादा से ज्यादा उनकी सेवा करने की।“ कहीं ना कहीं पापा वो कह रहे थे जो खुद के लिए चाहते थे, लेकिन मजबूर थे।

“हम्म, करती हूँ जितना संभव होता है....अच्छा अब चाय पीकर निकलूँगी मैं, नहीं तो देर हो जाएगी।“ मैं ज्यादा देर तक इस वार्तालाप को खींचकर उन्हे दुखी नहीं करना चाहती थी।

“हाँ ठीक है, फिर जाकर शाम का खाना भी तो बनाना होगा तुझे” पापा ने पूछा।

“हाँ, थोड़ी तैयारी सुबह कर के आ गयी थी।“

“ठीक है कैब बुक कर लेना, और पहुँचकर फोन कर देना।“ पापा ने वही बात फिर से दोहराई जो कि हर बार कहते है।

“पापा आप चिंता क्यों करते हो, घर ही तो जा रहीं हूँ, और आज पहली बार तो नहीं जा रही ना, महीने में कम से कम तीन-चार बार आती हूँ आपके पास, और ऐसे ही कैब करके वापिस भी जाती हूँ। मैंने उन्हे टेंशन फ्री रखने के इरादे से कहा लेकिन,

“आज मैं तेरी चिंता कर रहा हूँ, कल जब नहीं रहूँगा तो कोई तुझे यहाँ पूछेगा भी नहीं।“ पापा के ये शब्द मुझे भावुक कर गए, क्योंकि मैं जानती थी वो जो भी कह रहे है कहीं ना कहीं वो सही है।

“ठीक है मैं पहुँचते ही इत्तला कर दूँगी।“ इतना कहते ही मैं कैब बुक करने लगी।

मेरा एक और दिन पापा के साथ गुजर चुका था, यूँ तो उनके और मेरे बीच खास बातचीत नहीं होती है, लेकिन मेरा वहाँ होना ही उनके और मेरे लिए पर्याप्त होता है, मैं उनके लिए कुछ कर पाऊँ या ना कर पाऊँ लेकिन मैं जानती हूँ, मेरे द्वारा महीने के तीन-चार दिन उनके साथ गुजराना ही उनके लिए काफी है।

आधे घंटे बाद मेरा ससुराल आ गया, और कैब से उतरते ही मेरी पुरानी दिनचर्या फिर से शुरू हो गयी, लेकिन पापा को ससुराल पहुँचने की इत्तला करने के बाद, क्योंकि मैं जानती हूँ वो मेरे फोन का बैचनी से इंतजार कर रहे होंगे।

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