Sona Ki Shiksha (Story On Girl Education)

 सुनिए जी, कुछ पैसों कि दरकार है” लक्ष्मी ने चार हाथ लंबें घूँघट में से अपने पति रामचरण से जैसे ही कहा वो भड़क उठा,

“पैसे ! वो क्यों, और अभी कुछ दिन पहले ही तो दिए थे तुझे पैसे, फिजूलखर्ची थोड़ा कम किया कर।“

“सोना के स्कूल की फीस के लिए चाहिए थे जी, आज उसकी मास्टरनी ने कहा है कि अगर कल तक पैसे जमा नहीं करवाए तो स्कूल से नाम कटवा देंगे।“ सोना, रामचरण और लक्ष्मी की दस साल की बेटी है जो कि पाँचवी कक्षा में पढ़ती है।

“अच्छा-अच्छा, तो ऐसा बोल ना हमेशा आधी-अधूरी बात बोलती है, गंवार” रामचरण अपनी बेटी सोना की शिक्षा को लेकर काफी संजीदा था, वो उसे पढ़ा-लिखा कर एक बड़ा अफसर बनाना चाहता था, यूँ तो वो खुद इतना पढ़ा-लिखा नहीं था, और लक्ष्मी के लिए तो काला अक्षर भैंस बराबर था, शायद इसलिए ही वो अपने पढ़ने-लिखने की ख्वाहिश अपनी बेटी के ज़रिए पूरी करना चाहता था, वैसे तो वो चाहता था कि उसके बेटा हो लेकिन अब जो है उसे स्वीकार कर वो खुश है।

“जी माफ कर दीजिए मुझे” एकाएक लक्ष्मी की आँखें भर आयी, जिनका की घूँघट की वजह से रामचरण को एहसास तक नहीं हुआ।

“हम्म, लेकिन अभी तो पैसों का इंतजाम नहीं हो सकता, और पगार मिलने में अभी वक़्त है, लेकिन इस बार सोना के स्कूल की फीस जमा करवाना भूल कैसे गए, और तू करती क्या रहती है, इतना भी याद नहीं रख सकती थी, अब अगर स्कूल वालों ने उसे स्कूल से निकाल दिया तो साल बर्बाद हो जाएगा उसका” रामचरण हर तरीके से लक्ष्मी को ही दोषी ठहरा रहा था।

“जी गलती हो गयी, लेकिन अब क्या करें।“ लक्ष्मी ने माहौल शांत करने के लिहाज से उसके अकेले की गलती ना होते हुए भी उसने माफी माँग ली।

“सोचता हूँ।“ रामचरण संक्षित सा जवाब दे कुछ सोचते हुए बीड़ी जलाने लगा।  

“एक बात कहूँ अगर आप बुरा ना माने तो”

“हाँ कह” रामचरण ने नजरें टेढ़ी करते हुए लक्ष्मी से कहा।

“अम्मा जी से पूछ लो, क्या पता वो कुछ मदद कर दे।“

“अम्मा.....अरे हाँ अम्मा से पूछ सकते हैं, वैसे वो है कहाँ इस वक़्त” रामचरण ने अपने छोटे से घर में चारों ओर नजरें दौड़ाते हुए पूछा।

“कल्याणी काकी के यहाँ, पोता हुआ है उन्हे”

“हम्म, आने दे अम्मा को पूछता हूँ, तू खाना बना, यहाँ मेरे सिर पर खड़ी होकर मेरा दिमाग खराब मत कर” रामचरण लक्ष्मी को अपमानित करने का एक मौका नहीं छोड़ता था।

 

शाम को जब पूरा परिवार एक साथ खान खाने बैठे तो मौका देख रामचरण ने अपनी अम्मा से पैसों की बात छेड़ दी।

“काहे ?”

“अम्मा वो”

“अरे मैं पूछ रही हूँ क्यों चाहिए पैसे” अम्मा ने अपनी रौबदार आवाज में पूछा।

“अम्मा सोना के स्कूल की फीस जमा करवानी है।“

“हाँ अम्मा अगर कल तक मेरे स्कूल की फीस जमा नहीं करवाई तो मास्टरनी जी स्कूल से मेरा नाम काट देंगी।“ इतने में ही सोना बीच में ही बोल पड़ी।

“तू चुप कर, जब देखो तब पटर-पटर करती रहती है।“ सोना की बात सुन अम्मा उस पर भड़क गयी।

“तू रहने दे बेटा पापा बात कर लेंगे।“ रामचरण ने सोना को चुप रहने का इशारा किया, और फिर अम्मा से बात करने लगा......”अम्मा बोल दे रही है पैसे”

“हे ईश्वर तुझे क्या  मेरा पैसा यूँ ही बेफिजूल लुटाना है।“

“अम्मा....सोना का शिक्षा पर अधिकार है, मैं उसे एक बड़ा अफसर बनाना चाहता हूँ।“ राम चरण के कहते ही,

“बड़ा अफसर ! अरे तेरी सात पीढ़ियों में भी बना है कोई बड़ा अफसर”

“अम्मा क्या हुआ था उससे मुझे कोई मतलब नहीं, मेरी बेटी अफसर बनेगी तो बस बनेगी।“ रामचरण भी आज पूरी तरह से अम्मा से बहस करने के लिए तैयार था।

“रामू (अम्मा कभी-कभी प्यार से रामचरण को रामू कहती थी) बेटा वो लड़की है, थोड़ा बहुत पढ़ा-लिखाकर घर ग्रहस्थी का काम सिखाओ, आखिरकार ये ही तो आगे काम आएगा।“

“अम्मा तू पैसे दे रही है या नहीं”

“नहीं, अगर इतना ही पढ़ाने का शौक था तो तेरी बीवी से कहता लड़का जन के देती।“ अम्मा तुनककर बोली।

“अम्मा ये बस फालतू की बातें है, पहले मैं भी यही सोचता था कि काश लड़का हो जाता, लेकिन जब वो फिल्म देखी तो मेरी सोच ही बदल गयी।“

“फिल्म ! भला कौनसी फिल्म, जिसने तेरी सोच बदल डाली।“

“दंगल, आमिर खान की, उसमे उसकी बेटियों ने कमाल कर दिया था, पूरे देश का नाम रोशन किया था कुश्ती में, इनाम जीता था, स्वर्ण पदक, मेरी बेटी भी ऐसे ही मेरा नाम रोशन करेगी।” रामचरण ने गर्व से कहा।

“कुश्ती ! भला लड़कियाँ कब से कुश्ती करने लगी।“

“लड़कियाँ सबकुछ कर सकती हैं अम्मा, बस उन्हे प्रोत्साहन देने की जरूरत है।“

“सब बेकार की बातें है, कुछ भी कर ले ये लड़कियाँ, अंत में तो रसोई ही बनानी है।“ अम्मा के कहते ही,

“आखिरी बार पूछ रहा हूँ दे रही है पैसे, या नहीं”

“नहीं हजार बार नहीं,  चाहे तो नाम कट जाए स्कूल से सोना का” अम्मा ने कहा और झटके के साथ उठ बाहर चली गयी।

“अब क्या होगा जी?’ इतने में ही लक्ष्मी ने चिंता जताते हुए पूछा।

“होगा क्या, उधार माँगकर देखता हूँ किसी से, सौतेली माँ है ना ये मेरी इसलिए शायद मेरी तकलीफ नहीं समझ पा रही है।” रामचरण दो बरस का था तभी उसकी माँ हैजे की भेंट चढ़ गयी, कुछ ही महीनों बाद पिता ने दूसरी शादी कर ली, सोचा था रामचरण को माँ का प्यार मिलेगा, सो मिला भी लेकिन कभी-कभार ही, अधिकतर तो अपनी सौतेली माँ की मार ही मिली, और इसी ग़म में उसके पिता भी ज्यादा ना जी सके।

मैं कुछ करूँ।“ लक्ष्मी काँपती हुई आवाज में बमुश्किल ये बोल पायी।

“तू क्या करेगी।“

“मायके से उधार माँग लेती हूँ।“

“हाँ क्यों नहीं, जिससे कि वो लोग कहें दामाद जी ने भेजा होगा पैसे लाने, सोना की फीस के बहाने।“

“नहीं जी ऐसा कुछ नहीं होगा।“ लक्ष्मी के कहते ही,

“चुपकर, जा अपना काम कर, कुछ भी करूँगा लेकिन अपनी बेटी का नाम स्कूल से कटने नहीं दूँगा। और फिर रामचरण अपनी साइकिल उठा ना जाने कहाँ चला गया।

 

रात के लगभग दो बजे, “अम्मा, अम्मा”

“कौन है”

“अम्मा मैं लक्ष्मी”

“क्या है, क्यों परेशान कर रही है इतनी रात गए।“

“अम्मा ये आए नहीं अभी”

“कौन?” अम्मा ने उनींदी हालत में लक्ष्मी से पूछा।

“सोना के पापा”

“अरे गया होगा अपनी मित्र-मंडली के साथ, आ जाएगा, जा सो जा” इतना कह अम्मा बेफिक्री से दूसरी ओर करवट ले सो गयी।

“अम्मा, मुझे चिंता हो रही है, जी भी घबरा रहा है।“ लक्ष्मी ने एक बार फिर से अम्मा से बात करने की कोशिश की ।

“अरी क्यों दिमाग खराब कर रही है, आज कौनसा पहली बार वो पूरी रात के लिए घर से बाहर है।“

“नहीं अम्मा वो बात नहीं है उन्हे सोना की फीस की चिंता थी।“

“सुबह तक इंतजार कर, फिर भी नहीं आया तो देखते हैं, और अब जा यहाँ से, सोने दे मुझे” सौतेली होने की वजह से लक्ष्मी को अम्मा के रूखे व्यवहार की आदत थी, और उम्मीद भी कुछ ऐसे ही व्यवहार की थी।

 

सुबह पाँच बजे, “माँ पापा आ गए” आँगन में दातुन करती सोना जैसे ही चिल्लाई, लक्ष्मी दौड़ती हुई बाहर आ गयी।

“क्या हुआ जी कहाँ रह गए थे रात भर, मेरी तो चिंता के मारे हालत ही खराब हो रही थी।“

“बंदोबस्त करने गया था सोना की फीस का”

‘आपने कुछ गलत....” कहते-कहते लक्ष्मी अचानक से रुक गयी।

“नहीं, विश्वास कर अपने पति पर” रामचरण सही कह रहा था क्योंकि इस बात की गवाही उसके हाथ में पड़े छाले और चेहरे पर नज़र आ रहा सुकून दे रहे थे।

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