Beta - Bahu / बेटा - बहु (Story On Family)
कुछ कदम चलने के बाद अचानक से सावी रुक गयी, और पीछे मुड़ ना जाने किसे ढूँढने लगी, “सावी क्या हुआ, किसे ढूँढ रही हो।“ मेरे पूछते ही वो पहले तो थोड़ा सकपकाई, फिर बोली,
“नहीं, किसी को भी तो नहीं, तुम चलो,
मैं भी आती हूँ।“
“रिदम का इंतजार कर रही हो?”
“नहीं, नहीं तो”
“क्यों झूठ बोल रही हो, मैं जानती हूँ, तुम्हें अभी भी उम्मीद है उसके आने की।“ मेरे कहते ही,
“अरे नहीं, वो तो बस यूँ ही, तुम चलो, मैं थोड़ा धीरे-धीरे चलूँगी, पैरों में दर्द होता है, उम्र हो गयी है ना इसलिए” सावी ने कहा और मुझसे बिना नजरें मिलाए चलने लगी।
उम्र तो मेरी भी हो गयी है, फिर भी चाल में कुछ गति तो है, तुम तो जैसे सरक-सरक कर चल रही हो, अगर तुम कहो तो वापिस लौट चले, क्या मालूम इस बार रिदम......”
कहते-कहते मैं रुक गयी, क्योंकि अचानक से सावी मुझे खा जाने वाली नज़रों से घूरने लगी थी।
सावी, मेरी बहन है, मेरी बड़ी बहन, मात्र एक साल का ही फ़र्क है हम दोनों में, लेकिन कुछ लोग तो हमें जुड़वा ही समझते है, हर बात साँझा करते है हम एक दूसरे से, बेहद ही पारदर्शी है हमारा रिश्ता, शायद इसलिए मुझे उसकी तकलीफ उसके बिन कहे ही समझ आ जाती है।
पिछले हफ्ते की ही बात है, मैं उस वक्त अपने परिवार, यानि कि अपने पति, और बेटे-बहु के साथ कानपुर स्थित अपने घर में थी, कि देर रात सावी का फोन आया, जो कि मेरे लिए पहला झटका था, क्योंकि इससे पहले कभी उसने मुझे रात नौ बजे बाद फोन ही नहीं किया था, फिर भी मैंने इस ओर ज्यादा ध्यान नहीं दिया, और सावी से बातें करने लगी, बातें तो कुछ खास नहीं हुई लेकिन इस दौरान उसकी आवाज में मुझे वो खनक नजर नहीं आयी जो हमेशा आती थी, और यही बात मुझे खटकी और और फिर बिन कुछ सोचे-समझे मैंने प्रयागराज जाने के लिए बस के टिकट करवा लिए, जहाँ कि सावी दो साल पहले दिल का दौरा पड़ने से जीजाजी की मृत्यु के बाद से अपने अपने बेटे-बहु के साथ रहने लगी थी।
प्रयागराज पहुँचकर मैंने जो देखा उस पर यकीन करना मेरे लिए असंभव था, कारण था सावी के बेटे रिदम और बहु वान्या का उसके साथ किया जाने वाला कटु व्यवहार, फिर भी मैंने कुछ ऐसा जताया कि मुझे कुछ समझ ही नहीं आ रहा है, “रिदम, कैसा लगा तुझे मेरा सप्राइज़?”
“कैसा सप्राइज़ मौसी जी?” जिसका जवाब
वान्या ने दिया।
“मेरे अचानक से आने का सप्राइज़”
“ये कहिए ना कि मम्मी जी ने आपको
हमारी शिकायत करके बुलवाया है।“
“वान्या ! ये कैसी बातें कर रही हो,
सावी ने मुझसे ऐसा कुछ नहीं कहा है।“
“अगर ऐसा कुछ नहीं कहा है तो आप यहाँ
क्यों आयी है मौसी?” ये सवाल रिदम की ओर से आया।
“मैं कुछ समझी नहीं?” देखा जाए तो
वाकई में मुझे बात की गहराई समझ नहीं आयी थी।
“क्यों अंजान बन रही हो मौसी, क्या
मम्मी ने आपसे हमारी शिकायत नहीं की।“
“रिदम बेटा, ये तुम क्या कह रहे हो,
मुझे कुछ समझ नहीं आ रहा, सावी की कसम” मेरे द्वारा सावी की कसम खाते ही रिदम और
वान्या के हाव-भाव ही बदल गए, ज़ाहिर-सी बात है वो दोनों अब ये समझ चुके थे कि मैं
वाकई में कुछ नहीं जानती।
“ओह, हमें लगा कि......” कहते-कहते
वान्या रुक गयी।
“हाँ मैं कुछ नहीं जानती, मैं तो बस यूँ ही सावी से मिलने आ गयी थी, उससे जब फोन पर बात हुए थी तो वो थोड़ा low sound कर रही थी, तो मुझे लगा कि शायद उसकी तबीयत ठीक नहीं है इसलिए मिलने चली आयी, लेकिन अब मैं सबकुछ जानना चाहती हूँ।“ इतना कहते ही मेरी नजरें कभी रिदम तो कभी वान्या को देखने लगी।
“नहीं कुछ नहीं, हम तो बस यूँ ही...”
रिदम ने बात को वही खत्म करने के इरादे से जैसे ही कहा,
“बात कैसे नहीं है रिदम, और मौसी जी
से छुपाने का क्या मतलब है, मेरे हिसाब से उन्हे सबकुछ मालूम होना चाहिए।“ वान्या
के कहते ही,
“हाँ मैं भी सबकुछ जानना चाहती हूँ।“
सबकुछ जानने की अब मेरी इच्छा तीव्र हो गयी थी।
“मौसी जी हम माँ से परेशान हो गए
हैं।“
“ये तुम क्या कह रही हो, कुछ तो
सोच-समझकर बोलो वान्या”
“हम्म, अब सोचने-समझने के लिए कुछ
बचा ही नहीं है मौसी” इस बार रिदम ने कहा।
“साफ-साफ बताओ बात क्या है।“ सावी ने
फोन पर बात करते वक्त मुझे जो एहसास हुआ था वो अब सच हो रहा था।
“मौसी, मम्मी बात-बात पर हमे टोकती
है, कहीं जाओ तो सवाल, कहीं से आओ तो सवाल, कुछ करो तो सवाल, ना करो तो सवाल, खाना
तो हम कभी अपनी पसंद का खा ही नहीं पाते, बच्चे कभी पिज्जा-पास्ता की डिमांड करते
है तो मम्मी को उससे भी ऐतराज होता है, होटल से कभी खाना मँगवा लो तो पूरा घर सिर
पर उठा लेती है, दोस्तों को तो कभी घर पर बुलाने की हम सोच भी नहीं सकते, मौसी सच
कहूँ तो हमारी अपनी कोई ज़िंदगी रह ही नहीं गयी।“ रिदम ने थूक गटकते हुए अपनी बात
पूरी की।
“लेकिन सावी ऐसी तो पहले नहीं थी।“
मेरे चेहरे पर आश्चर्य के भाव थे।
“हाँ अब वो ऐसी ही है।“ वान्या ने
जवाब दिया।
“ठीक है, अगर तुम कहो तो मैं उससे
बात करूँ।“ मैंने रिदम और वान्या से इजाजत लेना बेहतर समझा क्योंकि मैं सावी के
पारिवारिक मामले में दखलंदाज़ी नहीं करना चाहती थी।
“बात क्या करनी है मौसी, आप उन्हे
अपने साथ ही ले जाइए, अगर आपसे भी नहीं संभले तो भेज देना किसी old age home में” रिदम के इन शब्दों ने मेरे
पैरों तले जमीन खिसका दी, अब मेरे लिए सावी को वहाँ छोड़ना एक पल ले लिए भी गवारा
नहीं था, चाहे वो गलत ही क्यों ना हो।
“ठीक है, मैं कल सुबह हुई उसे लेकर
निकल जाऊँगी।“ बस इतना कह मैं सावी के कमरे की ओर बढ़ गयी।
सच कहूँ तो मेरा अब इम्तिहान शुरू
होने वाला था, क्योंकि सावी को रिदम और वान्या के द्वारा बताई गयी बातें कहना मेरे
लिए मुश्किल था, और उसे बिन कुछ कहे बेवजह यहाँ से लेकर जाना और भी मुश्किल।
“सावी, क्या कर रही है, सुन मेरे साथ
इस बार कानपुर चल ना, तुझसे मिलकर वहाँ सबको अच्छा लगेगा।“ मैंने एकाएक ही बात की
शुरुआत कर दी
“क्या कह रहे थे रिदम और वान्या
तुझसे रावी?” अचानक से सावी ने मेरी ओर सवालिया नज़रों से देखते हुए पूछा।
“तू कहना क्या चाहती है।“ मैंने
अन्जान बनते हुए जैसे ही कहा, सावी ने मेरे सामने रिदम और वान्या के द्वारा किए
जाने वाले व्यवहार के कुछ ऐसे खुलासे किए कि जिन पर यकीन करना किसी के लिए भी
असंभव हो सकता है लेकिन मैंने किया, क्योंकि मैं अपनी बहन सावी की रग-रग से वाकिफ
थी, उसकी आवाज से, उसके हाव-भाव से, उसकी आँखों से, उसके कहने के अंदाज से मैं समझ
जाती थी कि वो सच कह रही है या झूठ।
“तू ये क्या कह रही है सावी, इसका
मतलब उन दोनों ने अभी तक जो कुछ भी कहा वो सब झूठ था, तेरे साथ बदसलूकी, तुझे भूखा
रखना, और बाहर वालों के सामने तेरा त्रिसकार करना, और कुछ नहीं बल्कि अपनी आजादी
के लिए तुझे यहाँ से भगाने की एक साजिश है उन दोनों की”
“हाँ, ये तो तू मेरे लिए एक फरिश्ता
बनकर आ गयी रावी, नहीं तो ये दोनों कुछ ही दिनों में मुझे किसी old age home में भिजवा देते” इतना कहते हुई सावी की
आँखों से आँसू बहने लगे।
“अरे ऐसे कैसे भिजवा देते, सामान पैक
कर अपना, तू मेरे साथ चल रही है, और अब वहीं रहेगी।“ और इतना कहते ही मैं सावी का
सामान पैक करने लगी, इस डर के साथ कि कहीं एक दिन मेरे बेटे-बहु भी......?
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