Pyar Ki Nishani ( Story On A Sad Love)
“मानसी ?” जोधपुर रेल्वे स्टेशन पर ट्रेन के इंतजार में बेंच पर बैठी एक साप्ताहिक पत्रिका में व्यस्त मैंने जैसे ही अपना नाम सुना चौंककर आवाज की दिशा की ओर देखने लगी, तो सामने एक लगभग 45-50 साल की एक महिला खड़ी हुई थी जो कि मुझे देख लगातार मुस्कुरा रही थी।
“सॉरी, क्या आपने मुझे पुकारा?” मैंने उस अपरिचित महिला से
पूछा।
“तुम मानसी ही हो ना?” उसने शायद पुष्टि कर लेना ही बेहतर
समझा।
“जी, लेकिन मैंने आपको नहीं पहचाना” कहते हुए मैं बेंच से उठ
खड़ी हुई।
“मानसी, मैं नेहा” उसने अपना परिचय देते हुए कहा।
“नेहा ! कौन नेहा ?” मेरे पूछते ही,
“अरे यार MGPS, नेहा
पढ़ाकू” उसने मेरे हाथ अपने हाथों में ले याद दिलाने की कोशिश करते हुए कहा।
“नेहा, मेरी पगली नेहा ?” मैंने उसे कन्धों से झकझोरते हुए
पूछा।
“हाँ तेरी नेहा” कहते ही उसने मुझे गले से लगा लिया।
”तू कहाँ थी इतने सालों से जब से MGPS जयपुर से अपनी स्कूलिंग
खत्म हुई है तेरी ना कोई ख़बर ना ही कोई दुआ-सलाम, और तू कितनी बड़ी हो गयी है।” मैने
खुद को उससे अलग करते हुए पूछा।
“मेरी तो तू पूछे ही मत, मेरी ज़िंदगी ने जो u-turn लिया था उसे तो तू
समझ ही नहीं सकती, लेकिन पहले ये बता कि तू यहाँ जोधपुर रेल्वे स्टेशन पर क्या कर
रही है।”
“अहमदाबाद जा रही हूँ, यहाँ अफिशल काम से आई हुई थी, अहमदाबाद
में मेरा परिवार रहता है, पति और बच्चें।“ मैंने जवाब दिया।
“अफिशल काम, तेरा मतलब है तू जॉब करती है।“ उसने आश्चर्य से
पूछा, ज़ाहिर-सी बात है, मैं पढ़ाई में सबसे कमजोर लड़की जो थी।
“हाँ, बैंक-मैंनेजर हूँ।“ मैंने संक्षिप्त में बताया।
“मुझे विश्वास नहीं हो रहा, मुझे तो लगता था कि...”
“मैं कभी कुछ नहीं कर पाऊँगी।“ मैंने उसका कथन पूरा किया।
“सॉरी यार, लेकिन यही सच है, और मैं ही नहीं बाकी स्टूडेंट को
भी यही लगता था, लेकिन तेरे लिए बहुत खुश हूँ।“ वो वाकई में खुश है या नहीं ये
समझना मेरे लिए काफी मुश्किल हो रहा था, लेकिन मैंने ये सबकुछ नजरंदाज कर बातों का
सिलसिला आगे बढ़ाते हुए पूछा।
“मेरी छोड़ तू बता कि तू यहाँ कैसे?”
“अजमेर जा रही हूँ।”
“अजमेर !” मेरे कहते ही,
“ससुराल है मेरा”
“तो फिर यहाँ जोधपुर में कैसे? मैंने पूछा।
“अपने बेटे से मिलने आयी थी।“ उसके स्वर में मुझे दर्द महसूस
हुआ।
“ये बात तू दुखी होकर क्यों बता रही है।“
“वो मेरे पहले पति का बेटा है, अपने ससुराल वालों से छुपकर
मिलने आती हूँ उससे”
“पहला पति ! तो क्या तुम्हारा तलाक हो गया था?” मेरे पूछते
ही,
“नहीं, वो अब नहीं है।“ ये कथन कहते हुए मुझे उसकी आँखों में
तकलीफ साफ-साफ नजर आयी।
“सॉरी, लेकिन तेरे ससुरालवालों को तेरे ही बेटे से मिलने पर
ऐतराज क्यों है।“
“क्योंकि उन्हे पता ही नहीं उसके बारे में” नेहा के कहते ही,
“नेहा इसमे छुपाने वाली क्या बात है, अरे ज़ाहिर-सी बात है तुम
शादी-शुदा थी तो बच्चा भी हो सकता है।“ मैंने आश्चर्यचकित होते हुए कहा।
“हाँ, लेकिन दुनिया की नज़रों में नहीं” कहते ही उसकी नजरें
झुक गयी।
“मैं कुछ समझी नहीं” मैंने कहा।
“मानसी, स्कूलिंग के बाद हम अलग हो गए थे इसलिए मेरे बारे में
तुझे ज्यादा कुछ नहीं पता, दरअसल मेरा admission
महारानी कॉलेज B. sc फर्स्ट ईयर में हो
गया था, और तेरा शायद कॉमर्स फर्स्ट ईयर कनोडिया कॉलेज में?”
“हम्म” मैंने हामी भरी।
“हाँ मैंने सुना था......सबकुछ सही चल रहा था, स्कूल की तरह
से कॉलेज में भी मैं सारे टीचर्स की चहेती स्टूडेंट बन गयी, पढ़ाई में होशियार होने
की वजह से मैं हमेशा centre of attraction रहती, शायद इसी बात का मुझे गुरूर हो गया था, खुद को
महान समझने लगी थी, कोई क्या कह रहा है क्या समझाना चाहता है, मेरे लिए सब फ़िज़ूल
था।“ इतना कहते ही नेहा ने कुछ क्षण के लिए अपनी आँखें मूँद ली, और इसी चुप्पी का
फायदा उठा मैंने कहा
“मैं कुछ समझी नहीं !”
“उस वक्त में सेकंड ईयर में आ चुकी थी कि एक दिन मेरी मुलाकात
महाराजा कॉलेज में पढ़ने वाले एक लड़के विकास से हुई जो कि मुझसे एक साल बड़ा यानि कि
B.sc थर्ड ईयर में था, पहली ही मुलाकात में आकर्षित हो गयी थी मैं
उसकी ओर, शायद उसकी personality देखकर, और
इसी वजह मैं उससे बार-बार मिलने के बहाने ढूँढने लगी, धीरे-धीरे हम एक अच्छे दोस्त
बन गए, और ये दोस्ती कब प्यार में बदल गयी हमें पता ही नहीं चला, लेकिन ये बात जब
मैंने दीदी को बताई तो उस दिन पहली बार मुझे पापा के हाथ का थप्पड़ खाने को मिला।“
“दीदी ने अंकल से तेरी शिकायत कर दी?” मैंने बीच में ही सवाल
दाग दिया,
“नहीं पापा ने हमारी बातें सुन ली, मेरा कॉलेज जाना बंद करवा
दिया गया, आगे की पढ़ाई मैने प्राइवेट की, लेकिन मैने भी बगावत कर दी, कुछ हफ्तों
बाद एक दिन जब पूरा परिवार दो दिन के लिए किसी उत्सव में बुआ के घर गया हुआ था तो
मैंने घर से भागकर कुछ दोस्तों की मदद से विकास के साथ मंदिर में शादी कर ली,
लेकिन हम साथ-साथ रहने की बजाय अपने-अपने घरों में ही रहने लगे।“ इतना कहते ही
नेहा ने एक लंबी साँस ली।
“साथिया फिल्म के जैसे, विवेक ओबेरॉय और रानी मुखर्जी” मैंने
पूछा।
“हाँ, बिल्कुल वैसे ही, लेकिन अब जरूरत थी तो हमारी मुलाकातों
की जोकि हमारे लिए फिलहाल असंभव थी, और इसलिए मैंने एक दिन मम्मी को पास ही के एक
स्कूल में मुझे टीचिंग जॉब पर भेजने के लिए राजी कर लिया, पापा भी जल्द ही राजी हो
गए, या फिर ये कह ले कि मम्मी के आगे पापा की नहीं चली, और मुझे विकास से मिलने का
रास्ता मिल गया।“
“तेरी ज़िंदगी में इतना सबकुछ हुआ।“ मैंने आश्चर्य से कहा।
“हाँ, मेरे नजरिए से अब सबकुछ सही चल रहा था, सिवाय एक बात
के”
“वो क्या” मैंने टोका।
“पापा ने मेरे लिए रिश्ते देखने शुरू कर दिए थे।“
“ओह” मैंने अफसोस ज़ाहिर करते हुए कहा।
“और इधर विकास और मैंने मुलाकातों के दौरान एक दिन नाजुक पलों
में वो गलती कर दी जो कि हमें नहीं करनी चाहिए थी, और मैं प्रेग्नेंट हो गयी।”
नेहा के इतना कहते ही हम दोनों के बीच लंबे समय के लिए एक गहरी चुप्पी पसर गयी।
“फिर क्या हुआ” मैंने चुप्पी को तोड़ते हुए पूछा।
“फिर हमने फैसला लिया कि हम अपने रिश्ते के बारे में सबको बता
देंगे......लेकिन इससे पहले ही एक रोड एक्सीडेंट में विकास की मौत हो गयी।“ इतना
कहते ही नेहा की आँखों से आँसुओं की कुछ बूँदें निकल उसके कपोलों को भिगोने लगी।
“I am sorry” मैंने सहानुभूति जताई।
“मैं पूरी तरह से टूट चुकी थी, लेकिन
उस वक्त मेरा साथ दिया दिव्या ने”
“दिव्या ! कौन दिव्या” मैंने पूछा।
“वो भी उसी स्कूल में टीचर थी जिसमे
मैं पढ़ाने जाती थी, और वो मेरे और विकास के बारे में सबकुछ जानती थी, यहाँ तक कि शादी
के कागजों पर गवाह के तौर पर उसके भी साइन थे।“
“तो क्या उसने अंकल-आंटी को तेरे
बारे में?” मैंने अंदाजा लगाया।
“नहीं, उन्हे तो आजतक मेरा सच नहीं
पता।“
“तो फिर क्या किया?”
“वो मुझे लेकर जोधपुर आ गयी, हुआ यूँ
कि, विकास की मौत के बाद मैं बिल्कुल अकेली हो गयी, ज़िंदगी में हर ओर अँधेरा ही
अँधेरा नज़र आ रहा था, समझ नहीं आ रहा था कि क्या करूँ, क्या नहीं, अपनी परिस्थिति
के बारे में मम्मी-पापा, दीदी किसी को भी बताने की मेरी हिम्मत नहीं थी, और अगर
बताती तो यकीनन वो मेरा अबॉर्शन करवा देते, और मैं विकास के बच्चे को जन्म देना
चाहती थी, क्योंकि ये बच्चा ही तो उसकी निशानी के तौर पर मेरे पास रह गया था, ऐसे
में दिव्या ने फ़ैसला लिया कि वो मुझे जोधपुर लेकर जाएगी और वहाँ मेरी delivery करवाएगी।“ थूक गटकते हुए नेहा ने
कहा।
“और तेरे पेरेंट्स ने तुझे उसके साथ
भेज दिया?” इसी दौरान मैंने उत्सुकतावश पूछा।
“हाँ, क्योंकि पिछले कुछ महीनों में
जाने-अनजाने में दिव्या, मम्मी-पापा, और दीदी के मन में अपनी एक अच्छी इमेज बना
चुकी थी, हालात कुछ ऐसे हो गए थे कि मम्मी को अब मुझसे ज्यादा दिव्या का विश्वास
होने लगा था।“ इतने में ही दिल्ली जाने वाली ट्रेन की announcement होने लगी जिसे उसने नजरंदाज कर आगे
कहना शुरू किया,
“और इसी विश्वास का फायदा उठा हमने
बहाना बनाया कि जोधपुर के एक प्राइवेट कॉलेज में एक साल का कोई कोर्स करवाया जा
रहा है, जिससे कि हमें life में आगे चलकर अच्छी jobs की opportunity मिल सकती है, ये बात दिव्या के
द्वारा कही गयी थी तो मम्मी-पापा ने उसका विश्वास करते हुए मुझे उसके साथ भेज
दिया, और हमारी योजना सफल हो गयी।“
“तो क्या इस एक साल के दौरान कभी
तेरे परिवार से कोई तुझसे मिलने जोधपुर नहीं आया।“ मैंने पूछा।
“एक-दो बार मम्मी और दीदी ने कोशिश
की थी लेकिन बहाना बनाकर उन्हे मना कर दिया, और वैसे भी दीदी ने जॉब की वजह से और
मम्मी ने पैरों के दर्द की वजह से जोधपुर आने की ज्यादा कोशिश नहीं की।“
“इसका मतलब delivery तक तुझे ज्यादा मुश्किलों का सामना
नहीं करना पड़ा।“
“ऐसा कहना तो गलत होगा मानसी,
क्योंकि मेरी तबीयत लगातार खराब रहने की वजह से दिव्या को हर दिन एक नई मुसीबत का सामना
करना पड़ता था और मैं किसी पहचान वाले की नज़रों में ना आ जाऊँ, ये डर भी तो था, यूँ
तो जोधपुर में हमारा कोई रहता नहीं फिर भी......”
“तूने अस्पताल में दिव्या के साथ
क्या रिश्ता बताया।“
“एक बहन का, और वो ही तो निभाया था
उसने जो आज भी निभा रही है।“ नेहा के कहते ही,
“मैं कुछ समझी नहीं” मैंने
प्रश्नवाचक दृष्टि उस पर डालते हुए पूछा।
“जोधपुर शिफ्ट होने के छ: महीने बाद
मैने वेद को जन्म दिया, मेरा छोटा विकास, बहुत रोई थी उस दिन मैं विकास को याद कर,
उसके बाद मैं दो महीने और रुकी वेद के साथ, और फिर दिव्या ने मुझे वापिस जयपुर भेज
दिया, ये कहकर कि अब वेद उसकी जिम्मेदारी है, मैं अपनी पुरानी ज़िंदगी में वापिस
चली जाऊँ, लेकिन वेद को नहीं भूलूँ, क्योंकि वो मेरा है, सिर्फ मेरा, बस दिव्या के
पास मेरी अमानत के तौर पर है, और आज भी वो ही वेद का संभाल रही है एक मौसी के तौर पर।”
“तो क्या उसका अपना परिवार नहीं?” अब
मैं दिव्या के बारे में सबकुछ जान लेना चाहती थी।
“नहीं उसका मुझसे मिलने से पहले ही
डिवोर्स हो चुका था, पेरेंट्स थे नहीं, और ना ही कोई रिश्तेदार था, बिल्कुल अकेली
थी वो” नेहा ने बताया।
“फिर?”
“उसके बाद मैं जयपुर आ गयी अपने
पेरेंट्स के पास वापिस, और आते ही मेरे लिए रिश्ते देखे जाने लगे और लगभग एक ही
साल में मेरी शादी सुमित से हो गयी, संयुक्त परिवार, अच्छा परिवार, अच्छा पति,
दुनिया भर की खुशियाँ मिल गयी थी मुझे, बस नहीं था तो मेरा वेद...हाँ मानसी मैं
अपने वेद को बहुत याद करती थी...” और इतना कहते ही नेहा फूट-फूटकर रोने लगी, जिसे
कि मैंने बमुश्किल संभाला।
“तो फिर क्या सुमित से भी तेरे बच्चे
हैं?’ उसके संभलने के बाद मैंने ही बातचीत का सिलसिला आगे बढ़ाते हुए पूछा।
“हाँ हैं, बेटा आरव और बेटी अनन्या,
मानसी सच कहूँ तो दुनिया की नज़रों में मैं बहुत खुश हूँ, आज्ञाकारी बच्चे, हद से
ज्यादा प्यार करने वाला पति और अपनी बेटी से ज्यादा मुझसे प्यार करने वाले मेरे
सास-ससुर, लेकिन मेरा वेद नहीं है, और किसी को
उसके बारे में बता भी नहीं सकती।“ कहते-कहते नेहा फिर से रोने लगी।
“क्या वेद को पता है उसकी सच्चाई?’
नेहा के शांत होने के पश्चात मैंने पूछा,
“हाँ जानता है, सब जानता है वो, मैंने उससे कुछ नहीं
छुपाया।“ इतना कहते ही नेहा ने एक लंबी साँस ली।
“तुमने जब बताया तो क्या रिएक्शन था उसका?”
मैंने पूछा,
“उसने नाराजगी नहीं जताई, और ना ही कोई
सवाल किया, मेरे साथ वैसा ही रिश्ता कायम रखा जो पहले था, मानसी मेरे लिए यही काफी
है कि मेरा बेटा आज भी वैसे ही मिलता है जैसे वो सच्चाई जानने से पहले मिलता था” नेहा
के स्वर में संतुष्टि साफ नजर अअ रही थी।
“तुम्हारी ज़िंदगी में जो कुछ भी हुआ
सुनकर ही भयभीत हो रही हूँ मैं, तो तुमने इन सबका कैसे सामना किया होगा नेहा?’
मैंने उसके कँधे पर सहानुभूति भरा हाथ रख पूछा।
‘पता नहीं शायद विकास का प्यार था
मेरे साथ और उसी प्यार से सब कुछ सहने, आगे बढ़ने की ताकत मिल रही थी मुझे......अच्छा
मेरी छोड़ अपनी बता, बैंक मैनेजर है तू, विश्वास ही नहीं हो रहा, जानती है पढ़ाई में
सबसे कमजोर लड़की थी तू, जीवन में कुछ कर पाएगी सोच भी नहीं सकता था कोई, और मैं
क्लास की सबसे होशियार लड़की आज सुबह-शाम घर के काम कर रही है, एक हाउस-वाइफ बनकर
रह गयी है।” नेहा ने हल्की-सी मुस्कुराहट के साथ कहा
“हाँ सही कह रही है तू, ये सब मेरे
पति राजन की वजह से हुआ, उन्होंने मुझे विश्वास दिलवाया कि मैं ज़िंदगी में बहुत
कुछ कर सकती हूँ, वो नहीं चाहते कि मेरा जीवन व्यर्थ जाए, मेरा अपना अस्तित्व हो,
लोग मुझे राजन के नाम से नहीं बल्कि मेरे खुद के नाम से जाने।“ कहते-कहते मैं गर्व
महसूस करने लगी।
“सच में मानसी बहुत किस्मत वाली है
तू, मैं दुआ करूँगी कि बहुत सारी खुशियाँ मिले तुझे” नेहा अभी अपनी बात कह ही रही
थी कि अहमदाबाद जाने वाली ट्रेन की announcement होने लगी।
“मेरी ट्रेन का टाइम हो गया, अब मुझे
निकलना होगा नेहा” मैंने कहा।
“हम्म, लेकिन इससे पहले हमें अपने
नम्बर एक्सचेंज कर लेने चाहिए।“ नेहा ने सुझाव दिया और तुरंत ही हमने अपने नम्बर
बदल लिए और आगे मिलते रहने का वादा कर अलग हो गए।
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