Ek Aur Ladki / एक और लड़की ( Story On Rape Case )
फरीदाबाद की एक कॉलोनी में स्थित एक सोसाइटी में रहने वाले सभी लोगों के चेहरे पर आज चिंता के भाव हैं, क्योंकि कल शाम इसी सोसाइटी में रहने वाली कणिका के साथ ऑफिस से लौटते वक्त कुछ लड़कों ने बड़ी ही निर्ममता से बलात्कार किया, और उसे बेहोशी की हालत में छोड़ भाग खड़े हुए। जिसे आज सुबह ही पुलिस की मदद से ढूँढकर अस्पताल में भर्ती करवाया गया है, और इस वक्त उसकी हालत काफी नाजुक बताई जा रही है।
यूँ तो कणिका के साथ अस्पताल में उसका पूरा परिवार है, उसकी मम्मी-पापा, भाई-भाभी लेकिन वो सब बेहद डरे हुए है, और उसका परिवार ही नहीं बल्कि आज तो सोसाइटी में रहने वाला हर एक सदस्य डरा हुआ हैं, सभी को अपने-अपने घर की बहु-बेटियों की चिंता हो रही है, उन्हे घर में बिठाकर रख नहीं सकते, पढ़ाई के लिए या काम पर भेजने में घबराहट होती है। सच में आज इस सोसाइटी में मातम छाया हुआ है, और ये सोच-सोचकर डर भी लग रहा है कि अस्पताल से ना जाने कब क्या खबर आ जाए, और इसलिए आज सोसाइटी की urgent meeting बुलाई गयी है।
“क्या कहें और कैसे कहें, सच में बहुत ही दर्दनाक हादसा हुआ है बेचारी लड़की के साथ” मीटिंग में बैठी सोसाइटी की कमेटी मेम्बर मिसेज नंदा ने कहा।
“हाँ सो तो है, लेकिन इसका ज़िम्मेदार कौन है, वहीं लड़की ना” ये शब्द पास ही बैठे शर्मा जी के थे।
“हाँ, बात तो सही है, गलत तो हमेशा लड़कियाँ ही होती हैं, लड़के तो बेचारे दूध के धुले होते हैं।” ये ताना वहीं बैठी एक महिला ने मारा।
“आप गलत समझ रहीं है मोहतरमा, मैंने ऐसा नहीं कहा।” शर्मा जी ने अपनी सफाई में कहा।
“अब रहने भी दीजिए, इस किस्से को लेकर सबके अलग-अलग विचार होंगे, जिन पर बहस कभी खत्म ही नहीं होगी।” ये आवाज किसी सभ्य सी दिखने वाली महिला के थे।
“हाँ बात तो सही है, लेकिन ऐसी घटना दुबारा ना हो हमें इस बारे में कुछ करना चाहिए।” ना जाने ये किसकी आवाज थी, लेकिन इसके जवाब में सोसाइटी के सेक्रेटरी निर्मल गुप्ता जी ने कहा,
“हाँ बिल्कुल, इसलिए ये मीटिंग बुलाई गयी है, जैसा कि आप सभी जानते हैं कि कल शाम हमारी ही सोसाइटी की एक लड़की कणिका के साथ ऑफिस से लौटते वक्त कुछ लड़कों ने बलात्कार किया, और अब वो अस्पताल में ज़िंदगी और मौत के बीच जूझ रही है, उसके परिवारवालों की स्थिति बेहद ही दयनीय है।”
“लेकिन सेक्रेटरी साहब कौन कहता है इन लड़कियों को इतनी रात गए ऑफिस से लौटने के लिए, वो भी आधे-अधूरे कपड़े पहनकर, और फिर लड़कों को दोष दिया जाता है, लड़की और उसके परिवार को बेचारा बताया जाता है।” इतने में शर्मा जी ने कहा।
“बस, बहुत हुआ शर्मा जी, आप हद से आगे बढ़ रहें है, कणिका ने आधे-अधूरे कपड़े कपड़े नहीं बल्कि साड़ी पहनी हुई थी, वही साड़ी जिसे पहनना आपकी बहुओं के लिए अनिवार्य है, जिसे आपकी बहुओं के द्वारा पहनने से समाज में आपकी, और आपके परिवार की इज्जत बनी रहती है, और ये बात आप भी भली-भाँति जानते थे कि कणिका ने आधे-अधूरे कपड़े नहीं बल्कि साड़ी पहनी थी, तो फिर उसके पहनावे पर ऐतराज क्यों, अगर साड़ी जैसी पारंपरिक पोशाक को देखकर ही लड़कों की नीयत बिगड़ जाती है तो फिर क्या पहने लड़कियाँ, जिससे कि वो सुरक्षित रह सकें।” मिसेज नंदा ने गुस्से से आग-बबूला होते हुए कहा, और उनकी इस बात से मीटिंग में बैठे सभी सदस्य सहमत भी हैं।
“दरअसल इसमे पहनावे का कोई दोष नहीं है, दोष ऐसे लड़कों की परवरिश का है, जिन्हे शुरुआत से ही महिलाओं व लड़कियों की इज्जत करना नहीं सिखाया गया है, मुझे तो समझ नहीं आता कि लड़कियों के पहनावे को देखकर लड़कों का मन कैसे मचल जाता है, क्या उनके घर में बहन-बेटियाँ नहीं होती, क्या उन्हे भी देखकर उनका दिल मचल जाता है?” ये शब्द सोसाइटी के सेक्रेटरी साहब के थे।
“गुप्ता जी ये कैसी बात कर रहे है आप, खुद की बहन-बेटी की भी इज्जत नहीं करेगा क्या इंसान?” इतने में वही बैठी सोसाइटी मेम्बर मिसेज अरुणा ने कहा।
“मिसेज अरुणा, आप कहना चाहती है कि दूसरों की बहन-बेटी की इज्जत नहीं की जाए तो चलेगा।”
“नहीं गुप्ता जी मेरा वो मतलब नहीं था।”
“किसका क्या मतलब है, इस हादसे को लेकर कौन क्या विचार रखता है, दरअसल आज की इस मीटिंग का ये topic ही नहीं है, क्योंकि जो होना था वो हो चुका है, बल्कि आगे इस प्रकार की घटना घटित ना हो उस बारे में हमे क्या करना चाहिए इसी बात पर हम यहाँ विचार-विमर्श करने बैठे हैं।” सोसाइटी सेक्रेटरी निर्मल गुप्ता जी के कहते ही,
“ऐसी घटना आगे घटित ना हो इसके लिए हम क्या कर सकते हैं गुप्ता जी?......अब कणिका के साथ जिन लड़कों ने दुर्व्यवहार किया उन्ही की बात कर लो, भाग खड़े हुए ना दुष्कर्म करके और अब ना जाने किस लड़की को अपना शिकार बना रहें होंगे, दरअसल ऐसी घटनाओं को रोकना आसान नहीं है, जब तक कि ऐसी नीची हरकत करने वालों को कड़ी से कड़ी सजा ना दी जाए।” मिसेज नंदा ने पूछा।
“सही कहा आपने मिसेज नंदा, इस प्रकार के अपराधियों को तो ऐसी सजा मिलनी चाहिए जिसके बारे में सुनकर उनकी रूह तक काँप जाए।” वहीं बैठी सोसाइटी की एक महिला सदस्य ने मिसेज नंदा से सहमत होते हुए कहा।
“देखिए, गुनाहगार को सजा देना कानून का काम है, और पुलिस इस वक्त गुनाहगारों को ढूँढने में लगी हुई है, मेरा मतलब है कि atleast हम अपनी सोसाइटी की बहन-बेटियों का बचाव कैसे करें।”
“सबसे पहले तो सोसाइटी में एक नोटिस जारी करवा दिया जाए कि जिन-जिन परिवारों में लड़के हैं उनकी हरकतों पर नजर रखी जाए, कही हमारी ही सोसाइटी के लड़के ही तो बाहर जाकर कुकर्म नहीं कर रहे।” सबसे पीछे बैठी एक महिला ने अपने विचार रखे।
“ये कैसी बात कर रहीं है मिसेज जोशी आप, आपको क्या लगता है लड़के शराफत से अपना गुनाह कबूल कर लेंगे, नहीं, बल्कि वो सतर्क हो जायेंगे, और नेक-दिल इंसान की तरह से पेश आने लगेंगे।” मिसेज नंदा के कहते ही,
“तो फिर क्या करना होगा?” मिसेज जोशी ने पूछा।
“सोसाइटी की सभी लड़कियों का एकत्रित कर उन्हे समझाना होगा कि वो जब भी घर से बाहर जाए, और किसी मुसीबत में फँस जाए तो वो अपना बचाव कैसे करें, इसके लिए हमें सबसे पहले तो सभी लड़कियों के लिए जूडो-कराटे क्लास का बंदोबस्त करना होगा, साथ में pepper spray रखने की सलाह दी जाएगी, हो सके तो कहीं भी अकेले ना जाकर किसी के साथ जाने के लिए कहा जाएगा, फोन में मदद के लिए सरकार द्वारा महिलाओं की मदद के लिए बताया गया नंबर save करने लिए कहा जाएगा, जिससे कि उन्हे तुरंत मुसीबत से बचाया जा सके, और ये भी सलाह दी जाएगी कि वो समय-समय पर अपनी live location अपने परिवार के किसी भी एक सदस्य के साथ शेयर करती रहें, साथ ही उन्हे इस बात से अवगत करवाती रहें कि वो कहाँ है और कितनी देर में अपने गंतव्य स्थान पर पहुँचने की उम्मीद है, इसके साथ और भी कई बातें हैं जिन्हे हम लड़कियों को समझाने की कोशिश करेंगे।” मिसेज नंदा के कहते ही,
“और अगर वो कहीं भी आने-जाने के लिए कैब या ऑटो का इस्तेमाल कर रहीं हैं तो उसका नंबर, ड्राइवर की जानकारी या फिर राइड का लिंक शेयर करें।” सोसाइटी के सेक्रेटरी साहब ने मिसेज नंदा की बात पूरी करते हुए कहा।
“इसका मतलब सबकुछ लड़कियों को ही समझना होगा, उन्हे ही adjust करना होगा।” मिसेज जोशी ने तपाक से कहा।
“नहीं, आप गलत समझ रहीं है, बल्कि लड़कों को भी स्त्री वर्ग की इज्जत करनी होगी, उन्हे बुरी नजर से देखना बंद करना होगा, और इसके लिए शुरुआत होगी उनके खुद के घरों से मिलने वाले संस्कारों से, उनके माता-पिता को इस बात की जानकारी रखनी होगी कि उनका बेटा क्या कर रहा है, कहाँ जाता है, किससे मिलता है, उसके दोस्त कौन हैं, कैसे हैं, और अगर कोई लड़का गलत राह पकड़ चुका है तो उसे सर्वप्रथम तो प्यार से समझाकर सुधारने की कोशिश करनी होगी, अगर ये संभव नहीं तो सजा देनी होगी, अगर जरूरत पड़े तो पुलिस के हवाले करने में भी संकोच नहीं करेंगे।” मिसेज नंदा के कहते ही,
“पुलिस !, ये क्या कह रहीं है आप मिसेज नंदा, कौन माता-पिता अपने ही बेटे को पुलिस के हवाले करेंगे, और ये कहेंगे कि बिगड़ गया है बेटा हमारा, अब मारो डंडे इसे” मीटिंग में बैठी एक महिला ने आश्चर्यचकित होते हुए कहा।
“क्यों, क्यों नहीं कर सकते ऐसा, जब कोई गलत काम करने पर पुलिस में रिपोर्ट लिखवाएगा तब भी तो पुलिस उसे पकड़कर लेके जाएगी, तो फिर पहले ही क्यों नहीं” मिसेज नंदा के कहते ही,
“बेटों को सुधारने के और भी बहुत तरीके हो सकते हैं मिसेज नंदा, अगर पुलिस का डर उनके मन में बैठ गया तो सुधरेंगे या नहीं ये तो नहीं पता लेकिन अपने माँ-बापों से नफरत जरूर करने लगेंगे।”
“सच कहा जाए तो इस समस्या का कोई समाधान ही नहीं है, हम कुछ नियम अपनी सोसाइटी के लिए बना सकते हैं, लेकिन पूरे देश का क्या, जहाँ पर प्रतिदिन ना जाने कितनी ही लड़कियों का बलात्कार हो रहा है, जिनमे से अधिकतर के बारे में तो ये सोचकर छुपा दिया जाता है कि उनके और उनके परिवार की बदनामी होगी।” ये कथन सोसाइटी सेक्रेटरी निर्मल गुप्ता जी का था।
“बात तो सही है, लेकिन ऐसे दुष्कर्मों को रोकने की कोशिश कहीं न कहीं, और किसी ना किसी के द्वारा तो करनी ही पड़ेगी, हम अकेले क्या क्या कर लेंगे, ये सोचना तो कायरता की निशानी हुई ना” मिसेज नंदा ने जवाब में कहा।
“ठीक है, मैं अपने जानकार कुछ लोगों से बात करने की कोशिश करता हूँ, जो कि फरीदाबाद में ही अपने कार्यकाल के दौरान उच्च पद पर आसीन रह चुके हैं और कुछ आज भी उच्च पद पर हैं, तो हो सकता है इन लोगों की मदद से हम ऐसा कुछ कर सके जिससे कि कम से कम हमारे फरीदाबाद की लड़कियाँ तो सुरक्षित हो जाए, और मिसेज नंदा के बताए गए सुझाव पर भी विचार किया जाएगा।”
“हाँ बिल्कुल, ये एक अच्छा विचार है, लेकिन सच में बहुत ही बुरा समय आ गया है, अरे जवान लड़कियाँ ही नहीं बल्कि छोटी-बच्चियाँ और बुजुर्ग महिलायें भी सुरक्षित नहीं हैं, और पहनावा तो कुछ भी हो, छोटे कपड़े हो, या फिर पूरा शरीर ढका हुआ हो जिन्हे कुकर्म करना है वो तो करके ही रहेंगे, लड़की ने छोटे कपड़े पहने थे इसलिए लड़कों की उस पर नज़र गयी, ये सब फालतू की बातें हैं।” ये शब्द काफी देर से चुप बैठे सोसाइटी मेम्बर डॉ अनिरुद्ध के थे, जो कि इस सोसाइटी के ज़िम्मेदार सदस्य होने के साथ-साथ आँखों के डॉक्टर भी है, और फरीदाबाद के एक प्राइवेट अस्पताल में कार्यरत है।
“हम्म, बात तो सही है।” सेक्रेटरी साहब ने सहमति जताई।
“गुप्ता जी गुप्ता जी......” इतने में ही सोसाइटी का watchman हाँफता हुआ मीटिंग रूम में आया।
“क्या हुआ शंकर?” सेक्रेटरी साहब के पूछते ही,
“कुछ बड़े लोग आपसे मिलने आए हैं, साथ में पुलिस भी है।” ज़ाहिर-सी बात है कि ये लोग कणिका से संबंधित ही कुछ बात करने आए थे।
सोसाइटी कमेटी के कुछ लोग सोसाइटी ऑफिस में कुछ देर पहले आए लोगों से बातचीत कर ही रहे थे कि इतने में मिसेज नंदा का फोन बजने लगा, “अस्पताल से फोन है।” मिसेज नंदा ने मोबाईल पर नज़र डालते हुए कहा......हैलो, रजत, (रजत कणिका का भाई है) कैसी है कणिका?...... ओह...”बस इतनी-सी बात कर मिसेज नंदा ने फोन रख दिया।
“क्या हुआ, क्या कहा रजत ने?” डॉ अनिरुद्ध ने पूछा।
“नहीं रही कणिका” मिसेज नंदा के इतना कहते ही सोसाइटी ऑफिस पूरी तरह से शोक में डूब गया, ज़ाहिर-सी बात है वहाँ बैठे सभी सोसाइटी के सदस्यों के समृति-पटल पर कणिका का चेहरा उबर आया था।
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