Samaj Sudhar / समाज-सुधार (Article On Bribe)
कल शाम मेरे पास एक फोन आया, unknown नंबर देख
मैंने उसे नजरंदाज कर दिया, लेकिन जब उसी नंबर से बार-बार फोन आने लगा तो मैंने
फोन उठाना ही बेहतर समझा ।
“हैलो” मेरे कहते ही,
“हैलो आप नीरजा बोल रहीं है?” दूसरी
ओर से सवाल आया।
“जी, लेकिन आप कौन?” मेरे पूछते
ही,
“नीरजा, मैं आँचल, पहचाना ?” उसने
पूछा।
“सॉरी, माफ कीजिएगा मैंने आपको
नहीं पहचाना” मैंने कहा
“मैं आँचल, आँचल शर्मा” उसके कहते
ही,
“माफ कीजिए, मैंने आपको अभी भी
नहीं पहचाना, शायद आपने wrong नंबर लगा
दिया है।” इतना कह मैंने बिना वक्त गँवाए तुरंत फोन रख दिया।
इस घटना के लगभग तीन-चार घंटे बाद फिर से उसी नंबर से फोन आया, पहले तो
मैंने उसे इग्नोर किया, फिर ना
जाने क्या सोचते हुए फोन उठा ही लिया, और मेरे फोन उठाते ही,
“नीरजा, प्लीज फोन मत रखना, मैं
आँचल हूँ, तुम्हारी स्कूल फ्रेंड, याद आया आँचल शर्मा, तुम्हारे पीछे वाली सीट पर
बैठती थी, और अक्सर क्लास में शैतानियों के लिए टीचर्स से punish होती थी, और एक बार मैंने हमारी English की टीचर नरूला मेम के पर्स में cockroach डाल दिया था, इसके लिए मुझे एक हफ्ते के लिए स्कूल से suspend भी कर दिया गया था।” इतना सबकुछ वो एक साँस में कह गयी।
“आँचल ! Naughty आँचल” मैंने उसको पहचानते हुए कहा।
“हाँ, naughty आँचल, finally तू मुझे पहचान गयी।” इतना कहते ही उसने एक लंबी गहरी
साँस ली।
“इतने सालों तक कहाँ थी तुम, और
हाँ ये मेरा फोन नंबर कहाँ से मिला तुम्हें?” मैंने आश्चर्य से पूछा।
“तुम्हारे ऑफिस से”
“मेरे ऑफिस से ! लेकिन तुम्हें कैसे पता चला कि मैं कहाँ और
क्या काम करती हूँ।” मेरे पूछते ही,
“मैं पिछले एक साल से तुम्हारे
ऑफिस के चक्कर लगा रही हूँ, अपने पति की पेंशन शुरू करवाने के बारे में बात करने
के लिए, लेकिन कोई सुनवाई नहीं कर रहा, बहुत परेशान हो चुकी हूँ, अब तो अभी तक की
जमा पूंजी भी खत्म होने लगी है, समझ नहीं आ रहा था कि क्या करूँ, क्या नहीं, कि कल
अचानक से मैंने वहाँ एक कैबिन में तुम्हारा फोटो टंगा हुआ देख लिया, काफी पूछताछ
करने के बाद पता चला कि तुम उस ऑफिस में एक बहुत ही ऊँचे पद पर कार्यरत हो, और उस ऑफिस
के बहुत सारे कामों को अंजाम देना तुम्हारे हाथ में है”
“तुम पेंशन ऑफिस के चक्कर लगा रही
हो, पिछले एक साल से !” मैंने आश्चर्यचकित होते हुए पूछा।
“हाँ, लगा रही हूँ, क्योंकि यही
नियति को मंजूर है।” कहते-कहते आँचल की आवाज भर्राने लगी।
“आँचल, मैं तुम्हें अपना address भेजती हूँ, ऐसा करो कल सुबह आठ-साढ़े आठ बजे मुझसे आकर मिलों और हाँ पेंशन
शुरू करवाने के लिए जो भी जरूरी कागजात हैं, वो सब लाना मत भूलना।” इतना कह मैंने
उसके फोन पर अपना address
भेज दिया।
अगले दिन सुबह तकरीबन आठ बजे जब में किचन में नाश्ते की तैयारी कर रही थी
तो अचानक से घर की डोर बेल बजी, दरवाजा खोल सामने देखा तो आँचल हाथ में एक फाइल
लिए खड़ी थी, जिसे मैं एक ही नज़र में पहचान गयी।
“आँचल ?” फिर भी मैंने उसका परिचय
पूछना बेहतर समझा।”
“हाँ नीरजा, मैं आँचल, naughty आँचल” इतना कहते ही वो मेरे गले लग गयी, और मैंने भी उसे अपनी बाँहों में
जकड़ लिया।
“आओ बैठो, गरमागरम नाश्ता बना रही
हूँ, चलो मिलकर करते हैं।” इतना कह जैसे ही मैं उसे जबरदस्ती dinning table की ओर ले जाने लगी।
“नहीं, आज नहीं, आज तो तुम बस
मेरी अर्जी सुन लो, बहुत परेशान हूँ मैं” उसने जैसे ही कहा, मैं अपनी maid को कुछ निर्देश दे आँचल को अपने कमरे में ले गयी।
“अब बताओ क्या हुआ है?” मेरे
पूछते ही,
“मुझे मेरे पति की पेंशन शुरू
करवानी है नीरजा, लेकिन तुम्हारे ऑफिस में कोई भी मेरी मजबूरी नहीं समझ रहा है,
बहुत मजबूर होकर तुम्हारी मदद माँगने आयी हूँ।”
“क्या हुआ था तुम्हारे पति को, और
वो कहाँ काम करते थे?” मैंने पूछा।
“ब्रैन स्ट्रोक” कहते ही उसकी
आँखें नम हो गयी।
“सॉरी” मैं बस इतना ही बोल पायी।
“एक सरकारी कंपनी में ऑफिसर थे, ऑफिस
में काम करने के दौरान ही साल भर पहले वो
मुझे और हमारे बच्चों को रोता-बिलखता छोड़ गए, सब बहुत मानते थे उन्हे, उनकी
बहुत इज्जत करते थे, लेकिन सब दिखावा था।” इतना कह जैसे ही उसने अजीब-सा मुँह
बनाया।
“क्यों क्या हुआ?” मैंने पूछा
“उनके जाते ही सब पराए हो गए,
ऑफिस वालों ने पिछले एक साल में एक बार नहीं पूछा कि भाभी जी कोई मदद चाहिए तो
बताना, रिश्तेदार तो जैसे मुझे पहचानते ही नहीं, और ये पेंशन ऑफिस वालों ने तो
ऑफिस के चक्कर कटवा-कटवाकर दुखी कर दिया है, नीरजा, अगर तुमने भी मदद नहीं की तो
सच कह रही हूँ जान दे दूँगी अपनी” इतना कहते ही वो फूट-फूटकर रोने लगी।
“आँचल-आँचल, प्लीज चुप हो जाओ, और
चलो मेरे साथ थोड़ा नाश्ता कर लो फिर हम मेरे ऑफिस चलेंगे, मैं वादा करती हूँ कि आज
ही तुम्हारे पति की पेंशन का काम हो जाएगा।” इतना कह मैं उसके हाथ से फाइल ले
देखने लगी।
“नीरजा, जानती हो ये काम तो पहले
ही हो जाता, अगर मैं रिश्वत दे देती तो, क्योंकि तुम्हारे ऑफिस में जो आदमी मेरी
फाइल देख रहा है, वो बार-बार कभी प्रत्यक्ष तो कभी परोक्ष रूप से मुझसे रिश्वत
माँग रहा है, लेकिन मैं कभी कोई ऐसा काम नहीं करूँगी जिससे कि मेरे पति की आत्मा
को दुख पहुँचे, क्योंकि वो एक बहुत ही ईमानदार अफसर थे, और उन्ही की पेंशन के लिए
रिश्वत दूँ, नहीं, कभी नहीं” उसके इतना कहते ही मेरी नजरें शर्म से झुक गयी, कहीं
ना कहीं ऐसा लगा, जैसे कि वो मुझे ताना मार रही है।
“मैं नाश्ता लगवाती हूँ, तुम
बाहर टेबल पर आ जाओ” मैं बस धीमे से इतना ही कह पायी।
सच कहूँ तो उस दिन बहुत शर्मिंदगी महसूस हुई मुझे, ऐसा लगा पेंशन ऑफिस में ऊँचे
पद पर काम करने की वजह से रिश्वतखोरीयों द्वारा रिश्वत लेने ले लिए मैं ही
ज़िम्मेदार हूँ, और कहीं ना कहीं आँचल मुझे ही ताना मार रही है, साथ ही बहुत दुख भी
हुआ, system के बारे में जानकर, जो काम बहुत पहले हो जाना चाहिए था,
उसको करने में एक साल लग गया, घर के खर्चे, बच्चों की पढ़ाई कैसे मैनेज हो रही
होगी, भगवान ना करे अगर मैं इसकी जगह होती तो......सोचकर ही मेरी रूह काँप गयी,
गुस्सा आने लगा खुद पर, ऑफिस के कार्यकर्ताओं पर, आँचल के पति के ऑफिस में काम
करने वाले कार्यकर्ताओं पर, जिन्होंने भी अभी तक उसकी कोई मदद नहीं की, आँचल के उन
रिश्तेदारों पर जिन्होंने जररूरत पड़ने पर उससे मुँह मोड लिया। लेकिन यहाँ मुझे
बाकी लोगों से ज्यादा खुद पर गुस्सा आ रहा था, क्योंकि मैं उस ऑफिस की मुख्य
कार्यकर्ता थी जिसमे पेंशन के लिए आँचल पिछले एक साल से चक्कर लगा रही थी, लेकिन
मैं अकेली कर भी क्या सकती हूँ, किस-किसको सुधारूँ, जब सारा सिस्टम ही खराब है, जब
बिना रिश्वत लिए कोई हिलता भी नहीं है, और इतना ही नहीं बेकसूर होते हुए भी, मैं
इन सबके साथ दोषी करार दी जाती हूँ, सच में गेहू के साथ घुन तो पिसता ही है।
नाश्ता करने के बाद मैं और आँचल सीधा मेरे ऑफिस पहुँचे, और वहाँ पहुँचते ही
मैंने सबसे पहले आँचल की फाइल देख रहे कर्मचारी को कैबिन में बुलाया और उसकी
खैर-ख़बर ली, और कहा कि अब जितना जल्दी हो सके आँचल का काम करें, लंच टाइम से पहले
ही आँचल का काम हो चुका था, जो काम पिछले एक साल से रुका हुआ था, वो दो घंटे के अंदर
हो गया, अब उसके पति की पेंशन उसके अकाउंट में बिना किसी अड़चन के पहुँच जाया
करेगी।
आँचल मेरी दोस्त थी, मेरे बारे में पता चलते ही वो मेरे पास आ सकी, जिससे
कि मैंने उसका काम करवा दिया, लेकिन जिनकी कोई जान-पहचान नहीं, जिनके पास रिश्वत
देने के लिए पैसे नहीं, उनका काम कैसे होता होगा, मेरे ही ऑफिस मैं नहीं बल्कि
किसी भी ऑफिस में, ये सब सोचकर मेरा दिमाग खराब होने लगा, साथ ही खुद पर शर्म भी
आने लगी, लेकिन मैं भी क्या कर सकती हूँ, किस-किसको सुधारूँ, अगर ऑफिस में रिश्वत
लेने पर बैन भी लगा दूँ तो लेने वाले किसी भी तरीके से ले ही लेंगे, फिर भी मैंने
एक फैसला लिया कि कल से ही ऑफिस में एक नियम बनाऊँगी कि ऑफिस का कोई भी कर्मचारी
किसी से भी रिश्वत नहीं लेगा, और अगर ली तो उसके खिलाफ कड़ी कार्यवाही की जाएगी, और
जितना जल्दी हो सके पेंशन शुरू करने का काम पूरा किया जाएगा।
ऑफिस में मैंने ये एक नियम तो बना दिया, लेकिन इसके उपरांत मेरी ज़िंदगी में
एकाएक दोस्तों की संख्या कम और दुश्मनों की संख्या ज्यादा हो गयी, अब मुझे समझ आ
रहा था कि शायद इसलिए कोई भी समाज सुधार जैसे दलदल में कदम नहीं रखना चाहता।
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