Pariwar Ke Liye / परिवार के लिए (Story On Family)

 

 “बाबा, आज शाम को काम से वापिस आते हुए मेरे लिए story book लेकर आना, मैं घर पर बोर हो जाती हूँ।” मुंबई के घाटकोपर इलाके में स्थित एक चॉल में बने 10x12 के कमरे के एक कोने में बैठी दिशा ने उसी कमरे के दूसरे कोने में आईने के सामने खड़े हो बाल बनाते हुए अपने पापा उमेश गायकवाड से कहा।

    “क्यों ? बोर क्यों हो जाती हो, पढ़ाई करो, शाम के वक्त आस-पड़ोस के बच्चों के साथ खेलने जाओ, और घर के कामों में अपनी आई की हेल्प क्यों नहीं करती हो, अरे और कुछ नहीं तो छोटे भाई का ध्यान ही रख लिया करो, पूरा दिन तुम्हारी आई क्या-क्या काम करेगी।” उमेश अभी दिशा को समझा ही रहा था कि...

    “सुनो जी जरा इधर आओ।” रूम के बाहर से उमेश की पत्नी संध्या ने आवाज लगायी।

    “हाँ आया......कहो क्या काम है।” बाहर आ उमेश ने चॉल के आँगन में बने नल पर कपड़े धोती संध्या से पूछा।

    “क्या कह रहे थे तुम दिशा से?”

    “गजब तेज है तुम्हारे कान तो ! अब तुम ही बता दो कि क्या कह रहा था।” उमेश ने अपनी हथेली घुमाते हुए पूछा।

    “सुनो जी, क्यों मना कर रहे हो, ले आओ ना जो माँग रही है, नहीं तो बेकार की बातों में मन भटकेगा इसका” संध्या ने अनुरोध भरी दृष्टि उमेश पर डालते हुए कहा।

    “तुम तो जानती हो संध्या पैसों की कितनी किल्लत है, एक-एक पैसा बचाना जरूरी है।”

    “एक किताब में कितना ही खर्चा हो जायेगा?” संध्या ने पूछा

    “हाँ ज्यादा तो नहीं होगा, फिर भी छोटी-बड़ी जरूरतों में खर्चे बहुत हो जाते हैं, तो सोचता हूँ जितनी संभव हो सके बचत करूँ, संध्या पैसे बचायेंगे तब ही तो अच्छा जीवन जी पायेंगे, बच्चों को अच्छी शिक्षा दिलवा पायेंगे, अच्छा खान-पान कर पायेंगे, और बुढ़ापा अच्छा बीतेगा, पैसों से ही इंसान की इज्जत है, आजकल के जमाने में बिन पैसों के कोई नहीं पूछता, और तुम तो जानती हो दिन रात भागता हूँ फिर कहीं जाकर खर्चा निकालने लायक पैसे जुटा पाता हूँ(उमेश एक घर-घर फूड डिलिवरी करने वाली कंपनी के लिए काम करता है।)” उमेश द्वारा अपना कथन पूरा करते ही,

    “ओ हो, उमेश गायकवाड साहब, आपसे बच्ची के लिए एक कहानी की किताब लाने के लिए क्या कह दिया, आपने तो हमारे पूरे जीवन का सफ़र करवा दिया।” संध्या ने ताना मारा, जिसे सुन,

    “हाँ-हाँ ठीक है समझ गया, ले आऊँगा वापिस आते हुए एक कहानी की किताब, लेकिन तुम भी सुन लो, दिशा से थोड़ा-बहुत घर का काम भी करवाया करो, कहानियाँ पढ़ने की भी एक सीमा होती है।” उमेश ने मुँह बनाते हुए कहा।

    “हाँ ठीक है, करवा लूँगी, लेकिन फिलहाल आप काम के लिए निकलों, और हाँ जाने से पहले नाश्ता करके जाना, रसोई में रखा है।” संध्या ने बाल्टी में से कपड़े निकाल निचोड़ते हुए कहा।

 

    कुछ देर बाद, “दिशा तेरे बाबा कहाँ है?” कपड़े धो वापिस अपने रूम में आ संध्या ने दिशा से पूछा।

    “आई वो तो गए।” दिशा के बताते ही,

“गए ! कुछ खाया नहीं क्या?” संध्या ने रसोई में नाश्ते से भरे बर्तनों की ओर देखते हुए पूछा।

    “नहीं आई, कुछ नहीं खाया, आई, बाबा नाराज है क्या?” दिशा ने बेहद ही मासूमियत से पूछा।

    “नहीं बेटा, कोई नाराज नहीं है, कोई जरूरी काम आ गया होगा, इसलिए जल्दी चले गए होंगे।” दिशा को समझा संध्या उमेश को फोन लगाने लगी।

    “हैलो” दूसरी ओर से आवाज आयी।

    “सुनो जी, आप कुछ खाकर क्यों नहीं गए?’’ संध्या ने शिकायत भरे लहज़े में कहा।

    “तू चिंता ना कर बाहर कुछ खा लूँगा।” उमेश ने कहा

    “अरे जब घर पर खाना बना हुआ था तो खाकर जाना चाहिए था ना, अब बाहर अनाप-शनाप कुछ भी खा लोगे और फिर तबीयत खराब होगी।”

    “अरे तू चिंता मत कर, कुछ नहीं होगा, चल अब फोन रख मुझे Food delivery के लिए जाना है।” इतना कह उमेश ने बिना संध्या की प्रतिक्रिया जाने तुरंत फोन रख दिया, और फिर संध्या पास ही सो रहे अपने आठ माह के बेटे दक्ष को गोद में उठा दूध पिलाने लगी।

 

    दोपहर दो बजे, “दिशा, बेटा खाना खा ले।” संध्या ने तवे से गरम-गरम फुल्का उतारते हुए दिशा को आवाज लगायी।

    “आती हूँ।” इतना कह दिशा खाना खाने के इरादे से संध्या के पास जाने ही लगी थी कि......

    “क्या उमेश गायकवाड यही रहते है।” दरवाजे पर से एक मर्दाना आवाज आयी।

    “कौन है?” संध्या ने अंदर से पलट कर सवाल किया।

    “आप बाहर आइए, हमे उमेश गायकवाड के बारे में कुछ बात करनी है।” बाहर खड़े व्यक्ति ने कहा।

    “जी कहिए” संध्या के कहते ही,

    “उमेश गायकवाड यहीं रहते है?”

    “जी, वो मेरे पति है, कहिए क्या काम है?” पूछते ही संध्या के चेहरे पर परेशानी के भाव उबर आए।

    “क्या यही है वो” सामने खड़े व्यक्ति ने एक फोटो संध्या को दिखाते हुए पूछा।

    “हाँ ये ही है वो, लेकिन इन्हे हुआ क्या है, इनके चेहरे पर ये चोट के निशान कैसे” फोटो में घायल उमेश को देख संध्या के हाथ-पाँव फूल गए, वो कांपने लगी।

    “मारा गया है इसे”

    “मारा ! किसने और क्यों?” संध्या के पूछते ही,

    “ग्राहक ने......किसी के यहाँ food delivery के यहाँ गया था, तो उन्होंने ही पीट दिया।”

    “अरे लेकिन क्यों......और आप कौन?” संध्या ने रोते हुए पूछा।

    “मैं उसका साथी हूँ धनराज, मैं भी food delivery करता हूँ, आप मुझे नहीं जानती” उस व्यक्ति के कहते ही,

    “भैया उन्होंने मेरे पति को मारा क्यों?” संध्या ने अपना सवाल दोहराया।

    food delivery देर से करने के लिए, शायद traffic में फँसने की वजह से delivery के लिए देर से पहुँचा होगा।” धनराज ने बताया।

    “आप मुझे उनके पास ले चलिए।” इतना कह संध्या अपने दोनों बच्चों को छोड़ नगें पाँव ही धनराज के पीछे हो ली।

 

    कुछ देर बाद, “कहाँ है मेरा पति, और यह कौनसी जगह है, कोई अस्पताल तो नहीं लग रहा।” खुद को किसी अन्जान जगह पर देख संध्या ने घबराते हुए पूछा।

    “थोड़ी देर में सब पता चल जायेगा।” धनराज ने मुस्कुराते हुए कहा।

    “तुम हँस क्यों रहे हो, और मेरा पति कहाँ है?” धनराज के हाव-भाव देख अब संध्या समझ चुकी थी कि वो अब किसी जाल में फँस चुकी है।

    “तेरा पति भी यहीं है, और घायल भी है, मैंने कोई झूठ नहीं बोला था, लेकिन हाँ उसे किसी ओर ने नहीं मैंने ही मारा था।” धनराज ने अपनी मूँछों पर ताव देते हुए जैसे ही कहा,

    “अरे तो क्यों मारा, मेरे पति ने तुम्हारा क्या बिगाड़ा था?” स्वंय को किसी बड़ी मुसीबत में फँसा देख संध्या ने पूछा।

    “मेरे सामने अपनी जुबान चलाई थी, मेरे साथ बहस की थी, मुझे गलत और खुद को सही साबित करने की कोशिश की थी इसने, अब अपने कर्मों का भुगतान तो करना ही पड़ेगा ना, और साथ में तू भी भुगतेगी इसके कर्मों की सजा, हाँ मैंने बच्चों को बख्श दिया है, छोटे है ना वो बेचारे...” अपनी बात पूरी करते ही धनराज रस्सी से संध्या का बाँधने लगा।

    “अरे ये क्या कर रहे हो भैया, आप तो इनके दोस्त हो ना, और दोस्ती में थोड़ी-बहुत कहासुनी हो ही जाती है, तो इसमे बुरा क्यों मानना, मैं इनकी तरफ से आपसे माफी माँगती हूँ।” संध्या ने धनराज को समझाते हुए मामला खत्म करने की कोशिश की।

    “दोस्त ! कौन दोस्त, मैं इसका कोई दोस्त-वोस्त नहीं हूँ, ये मेरे यहाँ food-delivery के लिए आया था, मेरे मेहमानों के सामने मेरी बेइज्जती की है इसने, अब ऐसी सजा दूँगा ना, ज़िंदगी भर याद रखेगा।” धनराज ने पास ही बेहोश पड़े उमेश को लात मारते हुए कहा।

    “भैया, मुझे पूरा मामला नहीं पता, फिर भी मैं आपसे हाथ जोड़कर विनती करती हूँ कि मेरे पति को छोड़ दीजिए, छोटे-छोटे बच्चे हैं हमारे, वो घर पर इंतजार कर रहे हैं।” संध्या धनराज के आगे गिड़गिड़ाने लगी।

    “संध्या, तुम यहाँ, तुम यहाँ कैसे आयी?” इतने में ही उमेश को होश आने लगा।

    “अच्छा हुआ तू होश में आ गया, नहीं तो बेहोशी की हालत में ही भगवान के घर चला जाता।” धनराज के कहते ही,

    “मेरी कोई गलती नहीं थी, फिर भी बार-बार आपसे माफी माँग रहा हूँ, प्लीज माफ कर दीजिए, और मुझे और मेरी पत्नी को जाने दीजिए।” उमेश ने हाथ जोड़कर धनराज से विनती करते हुए कहा।

    “लेकिन...सुनों जी हुआ क्या था, ये भाईसाहब आपसे इतना नाराज क्यों है?” इसी बीच संध्या ने उमेश की ओर सवाल दाग दिया।

    “मैं बताता हूँ..., मेरे घर पर मेहमान आए हुए थे, ये तेरा पति मेरे घर food delivery के लिए आया वो भी देर से, और जब मैंने देर से आने का कारण पूछा तो उल्टा मुझ पर ही चिल्लाने लगा वो भी मेहमानों के सामने, कहने लगा traffic में फँस गया था, साला झूठ बोल रहा था, कहने लगा आपको हमारी मजबूरी समझनी चाहिए, हम पूरा दिन कड़कड़ाती धूप में food delivery के लिए इधर से उधर भागते रहते हैं, ट्रैफिक में लेट हो गया तो इसमे मेरी क्या गलती” कहते-कहते धनराज चिल्लाने लगा।

    “बुरा मत मानना भैया, मेरा पति गलत नहीं है, अगर थोड़ी-बहुत देर भी हो गयी तो इसमे कौनसा पहाड़ टूट पड़ा, और हर मुंबई में रहने वाला यहाँ के traffic का हाल जानता है, आपके मेहमान भी जानते होंगे, तो फिर आप क्यों नहीं समझ पा रहे है, और इनकी अशिष्टता के लिए मैं आपसे माफी माँगती हूँ।” संध्या ने बहुत ही शांति से धनराज के सामने हाथ जोड़ते हुए उसे समझाने की कोशिश की लेकिन...

    “मैं कुछ नहीं सुनना चाहता, मैं बस इतना जानता हूँ कि तेरे पति की वजह से मेरे मेहमानों के सामने मेरी बेइज्जती हुई है।”

    You are under arrest” इतने में एकाएक कुछ पुलिसकर्मी वहाँ आ गए।

    “पुलिस ! इन्हे किसने बुलाया, किसने इत्तला की पुलिस में” पुलिस को सामने देख धनराज बेकाबू हो गया।

    “मैंने...” सामने से एक 35-36 साल के युवक ने आते हुए कहा।

    “चेतन तू, तूने की पुलिस को इत्तला, और तुझे पता कैसे चला कि मैं यहाँ हूँ, तूने मेरे पीछे आदमी लगाए हैं?” एकाएक वहाँ पुलिस को लेकर आ पहुँचे अपने बेटे चेतन से धनराज ने पूछा।

    “नहीं पापा, मैंने आपके पीछे कोई आदमी नहीं लगाए, बल्कि जब आप घर के back-door से इस डिलीवरी बॉय के पीछे निकले तभी मैं समझ गया था कि कोई बहुत बड़ी मुसीबत आने वाली है, और इसलिए मुझे आपके पीछे आने पर मजबूर होना पड़ा, लेकिन गाड़ी खराब हो जाने की वजह से आप तक पहुँचने में बहुत देर हो गयी.........पापा आप जो भी कर रहे है वो गलत है, इनकी कोई गलती नहीं थी, ये बात आप भी अच्छी तरह से समझते है।” धनराज के बेटे ने उसको समझाने की कोशिश करते हुए कहा।

    “गाड़ी खराब हो जाने की वजह से जब तू मेरे पीछे आ ही नहीं पाया तो तुझे कैसे पता चला कि मैं यहाँ हूँ?” अपने प्लान पर पानी फिर जाने की वजह से धनराज ने गुस्से से चिल्लाते हुए पूछा।

    “आपका फोन ट्रैक करके।” इसी दौरान इन्स्पेक्टर साहब ने धनराज की ओर हिकारत भरी नज़रो से देखते हुए बताया।

    “पापा, क्या हुआ क्या नहीं यह important नहीं है, फिलहाल आपको अपनी गलती मान लेनी चाहिए, क्योंकि आप गलत है।” चेतन ने धनराज को समझाने का प्रयास किया लेकिन,

    “इसकी वजह से मेरे मेहमान नाराज हो गए, हमें business में करोड़ों का नुकसान हो जायेगा बेटा।” धनराज पागलों की तरह चिल्लाने लगा।

    “दीदी, मेरा नाम चेतन है, माफ करना, मेरे पापा की वजह से आपके पति को, और आपको जो तकलीफ हुई है उसके लिए मैं आप दोनों से माफी माँगता हूँ।” अपने पिता धनराज को नजरंदाज कर चेतन ने उमेश और संध्या से माफी माँगते हुए कहा।

    “मुझे एक बात समझ नहीं आयी भैया, आपके पिता मेरे पति के पीछे गए थे, तो इनको हमारी चॉल के बारे में कैसे पता चला, वो वहाँ मुझे लेने कैसे पहुँच गए।” संध्या ने सवालिया दृष्टि से देखते हुए उमेश से पूछा।

     “इसका जवाब तो धनराज जी ही बेहतर तरीके से दे सकते है, हाँ तो बताइए मि. धनराज कैसे पहुँचे आप चॉल तक?” इतने में इन्स्पेक्टर साहब ने पूछा।

     “मैं इस डिलीवरी वाले के पीछे गया था, तो मैंने देखा कि इसने अपने बाइक एक चॉल के अंदर ले जाकर रोक दी है, बाइक से उतरते  ही जैसे ही ये चॉल में जाने लगा मैंने इसे पकड़ लिया, और इसे जबरदस्ती अपनी गाड़ी की ओर ले जाने लगा, तो उसने कहा कि ये यहाँ रहता है और अपने परिवार के साथ दोपहर का खाना खाने आया है, उसी दौरान इसने इशारे से मुझे अपना रूम दिखाया, उस वक्त तो मैं इसकी बात को अनसुना कर जबरदस्ती इसे अपनी गाड़ी में बिठा अपने साथ ले गया, लेकिन फिर बाद में मेरे मन में इसके परिवार को परेशान करने का भी विचार आया, और मैं इसे बाँध वापिस इसकी चॉल में चला गया।” धनराज ने अपनी करनी अपने ही शब्दों में कह डाली।       

    “हवलदार, धरम सिंह, इसको अस्पताल ले जाकर मरहमपट्टी करवाओ......” इन्स्पेक्टर साहब ने उमेश की ओर इशारा कर अपने एक पुलिसकर्मी से कहा।

    “सर, क्या मैं अपने पापा को लेकर घर जा सकता हूँ?” इसी दौरान चेतन ने इन्स्पेक्टर साहब से पूछा। 

    “मि. चेतन, आपके पिताजी एक साधारण व्यक्ति नहीं बल्कि एक बहुत बड़े business man है, उनका ऐसी हरकत करना उन्हे किसी दिन मुसीबत में डाल सकता है, आप जानते भी है इन delivery करने वालों की एक पूरी यूनियन होती है, सब एकजुट हो गए तो हम भी कुछ नहीं कर पायेंगे, क्योंकि वो सही के लिए लड़ रहे होंगे।” इन्स्पेक्टर साहब ने चेतन को आगाह करते हुए कहा।

    “इस बार माफ कर दीजिए इन्स्पेक्टर साहब, आगे से मैं इन सब बातों का खास ख्याल रखूँगा, वैसे मेरे पापा बुरे इंसान नहीं है, वो बस अपने बिजनेस को लेकर काफी possessive है, और वैसे भी अभी इन्होंने अपने ही मुँह से अपना गुनाह कबूल तो कर ही लिया है।” चेतन के कहते ही,

    “नहीं, फिलहाल हमें आपके पिताजी को गिरफ्तार करना होगा, उमेश को बंदी बनाने, उसके साथ मारपीट करने और संध्या को गुमराह कर यहाँ लाने के जुर्म में” और फिर पुलिसकर्मी दल धनराज को हथकड़ी पहना अपने साथ ले गया।

 

    दूसरी ओर अस्पताल में, “शुक्र मनाओ, ज्यादा चोट नहीं आयी है, वरना मारने वाले ने तो कोई कसर नहीं छोड़ी थी।” उमेश के घावों पर मरहम-पट्टी कर रहे कम्पाउंडर ने कहा।

“हाँ ठीक कहा भैया आपने, मुझे तो लगता है दिमागी तौर पर बीमार था वो आदमी, जो इतनी-सी बात पर मेरे पति को मार-मारकर अधमरा कर दिया।” संध्या ने दुखी स्वर में कहा। 

    “कोई बात नहीं, जो होना था सो हो गया, देखा जाए तो थोड़ी-बहुत गलती मेरी भी थी, मुझे उन साहब से बेरुखी से बात नहीं करनी चाहिए थी” उमेश ने अपने द्वारा किए व्यवहार पर अफसोस जताते हुए कहा।

    “जो होना था सो हो गया, अब आप ये नौकरी ही छोड़ दो, बहुत सारे और भी काम है करने को, वो कर लेना।” संध्या के कहते ही,

    “तुझे क्या लगता है, दूसरी जगह काम मिलना आसान होता है, और तू क्यों इन बातों में अपना दिमाग खराब कर रही है, अरे जो होना था, सो हो गया, अच्छा-बुरा वक्त चलता रहता है।”

    “जैसी आपकी मर्जी......भैया दुबारा कब आना है पट्टी करवाने?” बेमन से उमेश की बात पर सहमति जताते हुए संध्या कम्पाउंडर से अगली बार आने के बारे में पूछने लगी।

    “कल ही आ जाना” कम्पाउंडर ने कहा और फिर संध्या और उमेश वापिस अपने घर के लिए निकल लिए।

    घर पहुँचते ही, “बाबा, मेरी कहानी की किताब?” बिना अपने पिता की हालत देख दिशा ने घर में घुसते ही उमेश से पूछ डाला।

    “किताब ! तुझे दिखाई नहीं दे रही अपने बाबा की हालत” संध्या एकाएक दिशा पर चिल्ला पड़ी।

    “मेरी गुड़िया, ऐसा हो सकता है भला मेरी बिटिया मुझसे कुछ माँगे, और मैं ना लाऊँ, ये लो अपनी कहानी की किताब” इतना कह उमेश ने अपने बनियान में बनी गुप्त जेब में से दो कहानियों की किताब निकाली और दिशा की ओर बढ़ा दी।

    “अरे वाह......मेरे बाबा मेरे लिए कहानी की किताब लाए, हुर्रे......” किताब हाथ में लिए दिशा पूरे घर में नाचने लगी।

    “ये कब खरीदी आपने?” इसी दौरान किताब की तरफ इशारा करते हुए संध्या ने उनेश से पूछा।

    “घर से निकलते ही सबसे पहले ये किताब ही खरीदी थी, सोचा बाद में कहीं भूल ना जाऊँ, संध्या, मैं हमारे बच्चों और तुम्हारे लिए कमाता हूँ, अगर तुम लोगों को ही खुश ना रख पाऊँ तो मेरी कमाई का क्या फायदा, और जिस मनुहार से आज सुबह दिशा ने मुझसे किताब की माँग की और तुमने भी कहा तो मुझसे लाए बिना रहा नहीं गया।” उमेश ने पास ही लेटे हुए अपने बेटे दक्ष को गोदी में उठाते हुए कहा, और संध्या उसकी बात सुन ये सोच भावुक हो गयी कि उमेश अपने परिवार से प्यार करता है इसलिए तो उनकी जरूरतें पूरी करने के लिए धूप, बरसात, गर्मी-सर्दी हर मौसम में food-delivery के लिए भागा फिरता है।

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