Vidambanaa / विडंबना (Story On Women Sacrifice)
कभी किसी को
मुकम्मल जहाँ नहीं मिलता,
कहीं
ज़मीं तो कहीं आसमाँ नहीं मिलता
सच ही तो कहा है, हम ना जाने
क्या-क्या सपने देखते हैं, लेकिन वो सब पूरे हो जरूरी तो नहीं, फिर भी मैं ये
मानती हूँ कि जो कुछ होता है अच्छे के लिए होता है, या फिर ये कह लीजिए ये कहकर या
सोचकर खुद को और सामने वाले व्यक्ति को तसल्ली देती हूँ, क्योंकि जीवन में अगर ऐसी
परिस्थिति आ जाती है जिससे कि हम सहमत नहीं है तो उसे स्वीकार करने का इससे बेहतर
तरीका मुझे तो कोई ओर नज़र नहीं आता। दरअसल ये आर्टिकल लिखने का ख्याल मुझे पिछले
हफ्ते घटी एक घटना के बाद आया।
दरअसल मैं पिछले 10 सालों से अपने
पति की जॉब की वजह से मुंबई के कांदिवली इलाके में स्थित एक सोसाइटी में रह रही
हूँ, तो ज़ाहिर-सी बात है कि मेरी उसी सोसायटी में रहने वाली कुछ अन्य महिलाओं से
भी जान-पहचान हो गयी, उनमे से कुछ मेरी बहुत अच्छी दोस्त भी बन गयी, जिनके साथ
अक्सर मेरा मिलना-जुलना बना रहता है, उनमे से एक है प्रतिका, अभी दो दिन पहले ही
मैं यूँ ही शाम की चाय पर प्रतिका के फ्लैट पर उसके साथ गप्पे लड़ाने के इरादे से
चली गयी।
“क्या हुआ चेहरा क्यों लटका हुआ है
तेरा” डोर बेल बजाने के बाद उसके द्वारा दरवाजा खोलते ही मैंने सवाल दागा।
“कुछ नहीं, आ जा तेरे लिए चाय के साथ
समोसे भी ऑर्डर किए हैं।“ प्रतिका ने धीमी आवाज़ में कहा।
“क्या हुआ है, तबीयत तो ठीक है ना
तेरी, ना चेहरे पर कोई चमक, ना मेरे आने का कोई उत्साह, घर पर भी चारों तरफ उदासी
छाई हुई है, घर पर सब ठीक तो है, बच्चे, भैया, तू, अरे सब ठीक तो है, कुछ तो बोल?”
मैंने चिंताजनक स्वर में लगभग चिल्लाते हुए पूछा।
“हम्म सब सही है, समोसे आते होंगे।”
उसके कहते ही,
“अरे भाड़ में गए समोसे, मुझे तो
टेंशन होने लगी है, अच्छा इधर बैठ मेरे पास और बता कि हुआ क्या है।” और जैसे ही
मैंने उसे अपनी ओर खींचा, उसकी आँख से आँसू बहने लगे, जिन्हे उसने मुझसे छुपाने का
भरसक प्रयास किया लेकिन सफल नहीं हो पायी।
“प्रतिका क्या हुआ, तू रो रही है?” मुझे अब
उसकी चिंता होने लगी।
“नहीं, ऐसा तो कुछ नहीं है, बस यूँ
ही आँखें भर आयी।” उसने जबरन मुस्कुराने की कोशिश करते हुए कहा।
“देख, मुझे सबकुछ जानना है, इसलिए जो
भी प्रॉब्लम है सबकुछ मेरे साथ शेयर कर।” इतना कहते ही सबकुछ जानने की नीयत से मैं
उसकी ओर देखने लगी।
“आर्या, मेरी प्रॉब्लम कोई नई नहीं
है, बल्कि 20 साल पुरानी है।“
“ओह, समझ गयी, भैया से झगड़ा हुआ है,
और प्रॉब्लम कोई और नहीं बल्कि तेरे पतिदेव है।” मैंने ये इसलिए कहा क्योंकि
प्रतिका की शादी को 20 साल हो चुके थे।
“नहीं, बल्कि मेरी समस्या ये है कि
मैं और मेरे पति का स्वभाव बिल्कुल अलग है, मुझे बातें करना पसंद है तो उन्हे शांत
रहना, मुझे मस्ती-मज़ाक पसंद है तो इन्हे संजीदा रहना, मुझे हँसना पसंद है, तो वो
हमेशा ऐसा चेहरा बनाए रखते है जैसे कि किसी की शोक सभा में बैठे हुए हो, और मैं
हमेशा सकारात्मक सोचती हूँ और वो हमेशा नकारात्मक।”
“अरे तो ये सब कौनसी नई बातें है, ये
सब तो पिछले 20 सालों से चला आ रहा है।” मैंने प्रतिका को बीच में ही टोका।
“हाँ तू सही कह रही है, बल्कि मुझे
तो अब तक इन सब कि आदत हो जानी चाहिए, लेकिन आर्या क्या मुझे ही खुद को पूरी तरह
से अपने पति के हिसाब से बदलना चाहिए?” इतना कहते ही प्रतिका सवालिया नज़रों से
मेरी ओर देखने लगी।
“नहीं” मैंने संक्षिप्त-सा जवाब
दिया।
“आर्या, जानती हो शादी से पहले मैं
सोचती थी जिस भी इंसान से मेरी शादी होगी, वो मेरा पति तो होगा लेकिन उसके साथ
हमारा रिश्ता एक दोस्त का होगा, जिससे कोई भी बात करने से पहले मुझे सोचना नहीं
पड़ेगा, और हम एक-दूसरे के मन की बातें बिन कहे ही समझ लिया करेंगे, बहुत
मस्ती-मज़ाक किया करेंगे, बहुत सारी बातें किया करेंगे, दिन-भर में क्या हुआ
एक-दूसरे को बताया करेंगे, और भी ना क्या-क्या सोच रखा था मैंने” इतना कहते ही
प्रतिका चुप हो गयी।
“लेकिन प्रतिका सबकुछ आपको वैसा ही
मिले जैसा कि आप चाहते हो ये संभव तो नहीं ना” मैंने उसे समझाने के इरादे से जैसे
ही कहा,
“जानती हूँ, और मैं इन बीस सालों में
खुद को काफी बदल भी चुकी हूँ, जहाँ तक संभव होता है कम बोलती हूँ, संजीदा रहती
हूँ, हाँ आदत से मजबूर हूँ इसलिए कभी-कभार मस्ती-मज़ाक कर बैठती हूँ, जिसका कि मुझे
अपने पति का रिएक्शन देख पछतावा भी होता है, हाँ थोड़ा-बहुत जो भी हँसी-मज़ाक करती हूँ बच्चों
के साथ ही करती हूँ, पतिदेव से बात करने से पहले तो मुझे चार बार सोचना पड़ता है,
अधिकतर समय तो उनका चेहरा देखकर गले तक आए शब्द वापिस पेट में गिर जाते हैं, फिर
भी आर्या मैंने ही खुद को क्यों बदला है, मेरे पति के स्वभाव में तो रत्ती भर भी
बदलाव नहीं आया, पहले भी आँखों से आग उगलते थे और आज भी उगलते है, तो क्या उन्हे
स्वंय को मेरे हिसाब से थोड़ा भी नहीं बदलना चाहिए था।” इतना कहते ही प्रतिका की आँखों
में पानी भर आया।
“काफी भरी हुई है भैया के प्रति नफ़रत
से, क्या हुआ झगड़ा हो गया क्या?” मैंने उसके हाथ अपने हाथों में लेते हुए पूछा।
“नहीं, इसे झगड़ा नहीं कह सकते,
क्योंकि झगड़ा तो दो लोगों के बीच होता है, यहाँ तो एक तो कुछ बोलता ही नहीं, कम
बोले इंसान वहाँ तक तो फिर सहन कर लिया जाए लेकिन मेरा पति तो ना बोलता और ना ही
सुनना भी पसंद नहीं करता, उनका तो बस एक ही फंडा है, “चुप रहो, और रहने दो”
घुटन होने लगती है यार, और हाँ, मेरे और बच्चों के अलावा किसी ओर से बात करनी हो
तो घंटों तक करेंगे, जनाब हँस- हँसकर करेंगे, ये भी कोई जीवन है, अरे इससे बेहतर
शादी ही नहीं करते, या फिर पसंद की लड़की से शादी करते, कम से कम मेरी और बच्चों की
ज़िंदगी तो बर्बाद नहीं होती।” थूक गटकते हुए प्रतिका ने अपनी बात पूरी की।
“कभी बच्चों ने भैया के व्यवहार पर
कोई ऐतराज जताया?” मैंने पूछा।
“हाँ रिया कभी-कभार कहती है कि उसकी
फ़्रेंड्स के पापा उन्हे पूरा टाइम देते है, लेकिन मेरे पापा तो पाँच मिनिट बैठकर
बात तक नहीं करते, लेकिन बच्चों की ज़िंदगी में वो कमी पूरी करने की मैं पूरी कोशिश
करती हूँ आर्या, लेकिन उनके पापा की कमी तो पूरी नहीं कर सकती ना, और फिर मेरा
क्या?” प्रतिका के कहते ही,
“अच्छा, मन शांत कर अपना, जो भी बात
करनी हो मुझसे कर लिया कर।” मैंने उसका ध्यान भटकाने के इरादे से कहा, लेकिन,
‘वो सब ठीक है यार, लेकिन मेरा भी मन
करता है कि इनके साथ वक्त बिताऊँ, ढ़ेर सारी बातें करूँ, कुछ इनकी सुनूँ, कुछ अपनी
कहूँ।”
“अच्छा विस्तार से बता हुआ क्या है।”
मेरे पूछते ही,
“कल रात हम एक रेस्टोरेंट में डिनर
पर गए थे, तो मैं वहीं का एक पुराना किस्सा सुनाने लगी, अभी मैंने सुनाना शुरू भी
नहीं किया था कि मेरे पतिदेव ने ये कहकर चुप करवा दिया कि हाँ-हाँ ठीक है।“
“क्या पता वो किस्सा सुनकर उन्हे
बुरा फ़ील होता हो।” मैंने संभावना जताई।
“अरे ऐसा कुछ नहीं है, बल्कि उनका
सोचना है कि एक बार में एक ही काम करो, खाना खाने आए हो तो सिर्फ खाना खाओ, कुछ
बोलो मत, अरे यार ये भी क्या बात हुई, ऐसे तो इंसान के पास हर सेकंड कुछ ना कुछ
काम होता है, तो क्या वो गूंगा ही हो जाए, उसे कुछ कहना है, बताना है, या फिर
पूछना है तो कब करे, और आर्या जहाँ तक मैं समझती हूँ पुरानी अच्छी यादें ताज़ा करने
से, पुराने वो किस्से सुनने या सुनाने से जिनसे मन खुश होता है, रिश्तों में ताज़गी
बनी रहती है, और परिवार के साथ वक्त भी अच्छा गुजरता है, और जानती है मजे की बात
तो ये है कि उस समय तक हमारी टेबल पर मेन्यू कार्ड तक नहीं आया था, और मेरी बात भी
कोई ज्यादा लंबी नहीं थी ।”
“प्रतिका, मेरे लिए तेरी प्रॉब्लम
समझना नामुमकिन नहीं लेकिन मुश्किल जरूर है, क्योंकि मैं कभी ऐसी स्थिति से गुजरी
नहीं हूँ, लेकिन प्रतिका तुम एक बात भूल रही हो।”
“वो क्या?”
“वो ये कि तुम एक लेखिका हो, तुम्हें
अपनी मन की बातें कहने के लिए किसी व्यक्ति विशेष की जरूरत नहीं, बल्कि तुम तो
अपनी बातें लिखकर भी व्यक्त कर सकती हो, और जानती हो भगवान जानता था कि तुम्हारा
भविष्य कैसा होने वाला है, और तुम्हारा स्वभाव कैसा है तो उसने पहले ही सब इंतजाम
करके भेजा है, मैडम तुम्हें लिखने की एक अनूठी काबलियत देकर भेजा है, और साथ ही
तुम्हारे जीवन में मुझे भी भेजा है, प्यारे-प्यारे बच्चे दिए है, जिनका तुम्हारे
साथ रिश्ता एक दोस्त जैसा है, इसलिए अब रोना बंद करो, और जो भी मन की भड़ास निकालनी
है मेरे सामने निकालो, लेकिन चाय और समोसे के साथ, सिर्फ तुम्हारे पति मैं
प्रॉब्लम है बाकी सब तो ठीक है यार इन्जॉय करो लाइफ को” मैंने तनावपूर्ण हो चुके माहौल
को हल्का करने के इरादे से कहा लेकिन,
“आर्या, तुम सही कह रही हो, लेकिन
जीवनसाथी के साथ बातें करने से जो सुकून मिलता है किसी ओर के साथ नहीं, और ना ही
लिखने में, पूरी दुनिया के साथ बिताया गया वक्त एक तरफ और जीवनसाथी के साथ बिताए
गए पल एक तरफ, ऐसा वक्त जिसमे वो दोनों एक-दूसरे के साथ अपनी बातें सांझा करें,
थोड़ा मस्ती मज़ाक करें, और भी ना जाने क्या सपने देखे थे मैंने, खैर छोड़ मेरा दुख
मुझ तक ही सीमित रहे तो अच्छा है, चल रसोई में चाय बनाते हैं।” इतना कह प्रतिका
जबरन मेरा हाथ खींच मुझे रसोई की ओर ले गयी, और थोड़ी देर बाद मैं चाय-नाश्ता कर
अपने घर वापिस आ गयी, लेकिन ढ़ेर सारे सवालों के साथ।
सवाल ये था कि शादी के बाद स्त्री ही
स्वंय को क्यों बदलती है, अपना सबकुछ छोड़ घर-परिवार, माँ-बाप, भाई-बहन, दोस्त,
रिश्तेदार सिर्फ एक इंसान के भरोसे पर उसके घर आ जाती है, और इतना ही नहीं उसकी,
और उसके परिवार की खुशियों के मुताबिक खुशी-खुशी खुद को ढ़ाल लेती है, खुद की
पसंद-नापसंद सब भूल जाती है, लेकिन एक आदमी खुद को रत्ती भर भी नहीं बदलता, उससे
तो इतना भी नहीं होता कि जो स्त्री उसके भरोसे इसके घर आयी है, उसकी खुशी के लिए
दो पल उसके साथ गुजार ले, उसका सुख-दुख सुन ले, उससे चार बातें कर ले, नहीं बल्कि
वो तो मन से उस स्त्री को अपने जीवन का हिस्सा मानना ही नहीं चाहता। कैसी विडंबना
है ये एक स्त्री के जीवन की, लेकिन राहत की बात ये भी है कि सभी पुरुष एक जैसे
नहीं होते, जैसे कि मेरे पति और मेरे बीच रिश्ता बहुत अच्छा है, हम पति- पत्नी
होने साथ-साथ अच्छे दोस्त भी है। लेकिन प्रतिका जैसी स्त्रियों का क्या, उनका तो
जीवन बर्बाद ही समझो ! ऐसे में इंसान कहाँ तक अपने मन को ये कहकर तसल्ली दे कि,
कभी किसी को
मुकम्मल जहाँ नहीं मिलता,
कहीं ज़मीं तो कहीं आसमाँ नहीं मिलता
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