You Are Impossible / यू आर इम्पॉसिबल (Story On Family)

        समय तकरीबन रात के आठ बजे, मुंबई के अंधेरी पूर्वी इलाके में स्थित एक सोसायटी में बने 3 bhk फ्लैट के एक कमरे में अँधेरा देख, “क्या हुआ कमरे में इतना अँधेरा क्यों किया हुआ है, लाइट ऑन कर लो।” 40 वर्षीय सारिका के कहते ही,

   “जरूरत नहीं है, कितनी ही लाइट ऑन कर लूँ, फिर भी ये अँधेरा नहीं जायेगा।”

   “जानती हूँ, ज़िंदगी भर नहीं जाएगा ये भी जानती हूँ, लेकिन इस समस्या का कुछ तो समाधान ढूँढना पड़ेगा ना” सारिका ने कमरे की लाइट ऑन करते हुए कहा।

   “लाइट ऑफ कर दीजिए प्लीज, डर लगता है रोशनी से” इतने में कमरे में क्रोधित स्वर में एक आवाज गूँजी।

   “हाथ हटाओं, एक नज़र देखूँ तो सही कि तुम गुस्से में कैसी लगती है।” सारिका ने मिले आदेश को नजरंदाज कर कमरे में बैठी अपनी 15 वर्षीय भांजी सिया के चेहरे से हाथ हटाने का प्रयास करते हुए कहा।

   “मौसी प्लीज, मुझे अकेला छोड़ दीजिए।” सिया के कहते ही,

   “सिया तुम यूँ कब तक उदास बैठी रहोगी, जो भी हालात हैं उन्हे स्वीकार करो बेटा।” सारिका के कहते ही,

   “स्वीकार करूँ, क्या स्वीकार करूँ मौसी, ये कि मेरे मम्मी-पापा अलग हो रहे हैं, मम्मी ने मेरे बारे में सोचे बिना ही अलग होने का फैसला किया है, मुझसे ज्यादा इम्पॉर्टन्ट उनकी ज़िंदगी में उनका ईगो है, या फिर ये स्वीकार करूँ कि मेरी मम्मी की ज़िंदगी में मुझसे ज्यादा उनकी खुद कि जॉब इम्पॉर्टन्ट है।

   अरे पापा को तो कंपनी की ओर से लंदन जाने का मौका मिल रहा है, जो कि उनकी लाइफ की सबसे बड़ी opportunity है, तो फिर मम्मी को और मुझे उन्हे support करते हुए उनके साथ लंदन जाना चाहिए, अगर मेरी पढ़ाई की वजह से प्रॉब्लम आ रही है तो मम्मी को उनके साथ जाना चाहिए मौसी, पापा को अकेले रहने की आदत नहीं है, वो मैनेज नहीं कर पायेंगे, लेकिन मम्मी ने तो डिवोर्स का ऐलान कर दिया।”

   “सिया, तुम्हारी मम्मी बेवकूफ तो नहीं, उन्होंने सोच-समझकर ही ये फ़ैसला लिया होगा, और डिवोर्स केवल तुम्हारी मम्मी ही नहीं बल्कि तुम्हारे पापा भी दे रहे है, इसलिए तुम्हें अपनी मम्मी को गलत नहीं समझना चाहिए।” सारिका के कहते ही,

   “मौसी, वो गलत ही है, और पापा के ऊपर भी उन्होंने ही डिवोर्स पेपर्स साइन करने के लिए प्रेशर डाला होगा, क्योंकि मेरे पापा तो बहुत अच्छे है, और हम दोनों से बहुत प्यार करते है। फिलहाल मुझे ये फ़ैसला लेना होगा कि आगे की ज़िंदगी किसके साथ गुजारनी है, मम्मी या पापा, मम्मी के साथ रहने का तो सवाल ही पैदा नहीं होता, पापा के साथ फिलहाल जा नहीं सकती, लेकिन उनके लंदन जाने से पहले उनसे मिलूँगी जरूर, क्योंकि इस समय वो बहुत दुखी होंगे।” इतना कह सिया रो पड़ी।  

   “सिया, बेटा चुप हो जाओ, मैं समझ रही हूँ तुम्हारा दुख, लेकिन प्लीज, सारी गलती तुम्हारी मम्मी की है, ये समझना बंद करो।”

   “मौसी आपको क्या लगता है, ये सब मेरे लिए आसान है, आप समझ भी नहीं सकती है कि मुझे कैसा लग रहा है, मानो मेरे ऊपर दुखों का पहाड़ गिर पड़ा हो, और वो भी उस समय जब इस साल मेरे 10th बोर्ड के इम्तिहान है, अरे मम्मी को लंदन नहीं जाना मत जाए, कोई बात नहीं, long distance relationship भी तो निभा सकते थे, और शादी से पहले निभाते थे ही ना, तो अब क्या हुआ, जिसमे अब तो मैं भी हूँ उनकी लाइफ में।” इतना कहते ही सिया की आँखें गुस्से से लाल हो गयी।

   “लेकिन जो भी situation है उसे स्वीकार करते हुए तुम्हें फ़ैसला लेना होगा कि अब आगे क्या।” सारिका के कहते ही,

   “मौसी, मैं फ़ैसला ले चुकी हूँ कि अब मैं आपके साथ रहूँगी, अगर आपको कोई ऐतराज ना हो तो।” इतना कहते ही सिया अपनी मौसी की ओर उम्मीद भरी नज़रों से देखने लगी।

   “सिया, मेरा बच्चा, you are most welcome, लेकिन इससे पहले तुम्हें अपनी मम्मी के बारे में भी सोचना चाहिए, जो भी है आखिरकार वो तुम्हारी माँ है।” सारिका ने जैसे ही कहा,

   “ये बात तो उन्हे पहले सोचनी चाहिए थी मौसी, माँ होने का फ़र्ज़ तो उन्हे निभाना चाहिए था, लेकिन नहीं उन्होंने तो best employee का फ़र्ज़ निभाया।”

   “अच्छा ठीक है, फ़िलहाल इस टॉपिक पर कोई बात नहीं, चलो पहले डिनर कर लो।” इतना कह सारिका, सिया को जबरदस्ती उठा खाने की टेबल की ओर ले गयी।

 

   कुछ घंटों बाद, “सिया बेटा मुझे किसी काम से अभी बाहर जाना होगा, तुम्हें कुछ चाहिए तो तरुण को बोल देना.........तरुण ध्यान रखना सिया बेबी का” सारिका, सिया और अपने नौकर तरुण को कह अभी घर से बाहर निकली ही थी कि, उसके फोन की घंटी बज उठी। 

    “कैसा चल रहा है वहाँ सब सरू, सिया कैसी है?” फोन पर दूसरी ओर से आवाज आते ही,

    “कैसी होगी दीदी, ये तो आपको समझना चाहिए, आखिरकार आप उसकी माँ है।” सारिका ने रूखेपन से कहा।  

   “जानती हूँ तुम भी नाराज़ हो मुझसे, लेकिन क्या करूँ मजबूर हूँ, और मेरी मजबूरी तुम बखूबी जानती भी हो।”

   “जानती हूँ, इसलिए कह रही हूँ कि सिया को सब सच-सच बता दीजिए, वो अब बच्ची नहीं है, उसका सच्चाई जानना जरूरी है।” सारिका के कहते ही,

   “नहीं, ये नहीं हो सकता, उस पर बुरा असर पड़ेगा।”

   “खैर, आप थोड़ा इंतजार कीजिए, मैं आपसे मिलने ही आ रही हूँ, फिर आराम से बैठकर विस्तार से बात करेंगे, फिलहाल ड्राइव कर रही हूँ, इसलिए ज्यादा बात नहीं कर सकती।” इतना कह सारिका ने फोन काट दिया।

   कुछ देर बाद सारिका के बांद्रा वेस्ट स्थित एक सोसायटी में गाड़ी पार्क करते ही, “आ गयी तुम, मैं तुम्हारा ही इंतजार कर रही थी।” सारिका जैसे ही गाड़ी से उतरी उसके सामने लगभग 45 वर्षीय एक सभ्य सी दिखने वाली महिला आ खड़ी हुई।

   “हर्षा दीदी आप यहाँ ! घर चलिए, वहीं बैठकर शांति से बात करेंगे।” इतना कह सारिका अपनी बहन, जो कि सिया की माँ भी थी अपने साथ उनके फ्लैट की ओर ले गयी।

   “सरू बहन, मैं पागल हो जाऊँगी, तुम ही बताओ क्या करूँ, क्या कहूँ सिया से, कैसे बताऊँ उसे सच्चाई, कितना गलत असर पड़ेगा उस बच्ची पर सच जानकर, अरे इस बार तो उसका 10th बोर्ड भी है, कैसे मन लगेगा उसका पढ़ाई में, मेरी बेटी की ज़िंदगी बर्बाद ना हो जाए।” फ्लैट में घुसते ही हर्षा ये सब कह फूट-फूटकर रोने लगी।

   “दीदी, दीदी शांत हो जाओ, पहली बात तो ये आपकी कोई गलती नहीं है, गलती सारी जीजाजी की है, बल्कि आप तो अपनी बेटी की नज़रों में बुरी बन मामले को बहुत ही होशियारी से संभाल रही हो।” सारिका के कहते ही,

   “नहीं सरू, मैं टूट चुकी हूँ, अब कुछ भी संभालने की हिम्मत नहीं।” हर्षा के कहते ही,

   “दीदी, मेरी बात मानो, सिया को सब सच-सच बता दो, आपके और जीजाजी के डिवोर्स की सही-सही वजह बता दो, कम से कम आपके प्रति जो उसके मन में घृणा आ गयी है, वो तो खत्म हो जाएगी।” सारिका ने हर्षा के दोनों हाथ अपने हाथों में ले उसकी आँखों में आँखे डालते हुए कहा।

   “तो तू ये कहना चाहती है कि मैं सिया से कहूँ उसके रोल मॉडल, दुनिया के सबसे अच्छे उसके पापा गलत है, और मैं सही, टूट जाएगी सरू वो, तू नहीं जानती अपने पापा को अपना भगवान मानती है वो लड़की, इससे अच्छा तो मैं अपनी छवि खराब कर लूँ उसकी नज़रों में” हर्षा के कहते ही,

   “अरे आज नहीं तो कल, कभी ना कभी तो उसे सच्चाई पता चलेगी ना दीदी” सारिका के कहते ही,

   “नहीं, कभी भी उसे सच्चाई का पता नहीं चलेगा, क्योंकि प्रशांत (हर्षा के पति) तो अब एक बार जाने के बाद वापिस इंडिया आयेंगे नहीं।”

   “तो क्या तुम बेकसूर होते हुए भी पूरी ज़िंदगी अपनी ही बेटी की नज़रों में बुरी बनी रहोगी, दीदी महान बनना बंद करो, और सिया को सबकुछ सच-सच बता दो।” सारिका ने समझाते हुए कहा।

   “क्या बता दूँ, कि सिया दुनिया में सबसे अच्छे तेरे पापा, तेरे रोल मॉडल तेरे पापा, अब हमारे साथ नहीं रहना चाहते, मैं उन्हे नहीं बल्कि वो मुझे डिवोर्स देना चाहते है, क्योंकि उन्होंने एक नया परिवार बना लिया है, एक और शादी कर ली है, इतना हीं नहीं उनका एक बच्चा भी है, और वो सब अब लंदन शिफ्ट होना चाहते हैं, क्योंकि तुम्हारे पापा की नयी वाइफ की कंपनी उसे लंदन भेज रही है, तुम्हारे पापा तो उसके साथ जा रहे है, यहाँ से रिजाइन करके, जिसका कि तुम्हारी मम्मी को भी कुछ दिन पहले ही पता चला है।” कहते-कहते हर्षा रोने लगी।

   “हाँ बिल्कुल यही सब कहना है दीदी, सच्चाई जितनी जल्दी बताओगी उतना अच्छा है।”

   “नहीं सरू, नहीं, टूट जाएगी मेरी बेटी, इससे अच्छा अब तक जो चल रहा वो ही चलने दे।” इतना कह हर्षा धीमे-धीमे कदमों से अपने कमरे की ओर चली गयी और दरवाजा बंद कर जोर-जोर से रोने लगी।

   “दीदी, मैं निकलती हूँ, सिया मेरा इंतजार कर रही होगी।” सारिका ने अब हर्षा को अकेले छोड़ना ही बेहतर समझा, लेकिन हर्षा कोई जवाब देती इससे पहले ही,

   “मौसी, मैं यहीं हूँ।” अचानक से सारिका सिया की आवाज सुन अवाक रह गयी।

   “सि......सि......सिया...... सिया बेटा...तुम......तुम यहाँ अचानक से?” सारिका हकलाते हुए बमुश्किल अपना वाक्य पूरा कर पायी।

   “सिया !” इतने में हर्षा कमरे से बाहर निकल आश्चर्य से सिया की ओर देखने लगी।

   “मम्मी......” और हर्षा को देख सिया भागकर उसके गले लग फूट-फूटकर रोने लगी।

   “क्या हुआ, सब ठीक तो है, तुम ठीक हो, तरुण...तरुण ने कुछ किया?” सिया को इस तरह से रोते देख सारिका को किसी अनहोनी की आशंका होने लगी।

   “किसी ने कुछ नहीं कहा मौसी, मैं ठीक हूँ, बल्कि अब ज्यादा ठीक हूँ।” सिया के कहते ही,

   “मतलब?” सारिका के पूछा

   “मौसी, मैं आपके पीछे-पीछे ही यहाँ आ गयी थी, मैं जानती थी कि आप मम्मी से ही मिलने के लिए घर से निकली हो, और मैं आप दोनों की बातें सुन सब सच जानना चाहती थी, क्योंकि बार-बार आपके द्वारा मम्मी का पक्ष लेने से मुझे लग रहा था कि पापा-मम्मी के डिवोर्स की वजह वो नहीं जो मैं समझ रही हूँ, बल्कि कुछ ओर ही है, जो कि मुझसे छुपाई जा रही है, और अब सारी सच्चाई मैंने दरवाजे के बाहर खड़े होकर सुन ली है, जिसे जान नफ़रत हो गयी है पापा से......” अपनी बात पूरी कर सिया वही पास रखे सोफ़े पर बैठ दोनों हाथों से अपना मुँह छुपा रोने लगी।

   “सिया...” अगले ही पल जैसे ही हर्षा ने सिया के सामने घुटनों के बल बैठ आवाज लगायी।

   “मम्मी, मुझे माफ कर दीजिए, पापा की इमेज मेरी नज़रों में अच्छी ही बनी रहे, इसके लिए आपने खुद को बुरा बना लिया......सच में you are impossible” और सिया के इतना कहते ही सिया, हर्षा और सारिका एक दूसरे के गले लग गयी, और साथ ही सारिका ने चैन की साँस ली कि अब सारी सच्चाई सिया के सामने है।     

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