Kya Bahu Izzat Ki Haqdaar Nahi ? / क्या बहु इज्जत की हक़दार नहीं ? (Story On women Empowerment)
“राधिका, दो कप चाय बना
दे, पड़ोस से वाणी आंटी आयी हुई है।”
“जी मम्मी जी अभी बनाती हूँ।”
ये वार्तालाप मेरी मकान मालिक अनीता आंटी, और उनकी बहु
राधिका के बीच जोधपुर स्थित सरदारपुरा कॉलोनी के एक घर में हो रही थी, जिसमे
मैं ऊपरी मंजिल पर बने दो कमरे के हिस्से
में किराए पर रहती थी, और मैं अपने कमरे में ये सारी बातें सुन रही थी।
इस घर में अनीता आंटी, और राधिका के अलावा, मकान मालिक
विनोद अंकल, जो कि एक सेवानिवृत सरकारी अफसर थे, अनीता आंटी और विनोद अंकल का बेटा
विकास, जो कि एक ऑटो-मोबाईल कंपनी में कार्यरत था, और उसके और राधिका के दो
छोटे-छोटे बेटे 6 वर्षीय आहान, और 4 वर्षीय विहान भी साथ रहते थे। इन सबके अलावा
जोधपुर में ही विकास के एक बहन अल्पना, पति रोहित और बेटी इरा के साथ रहती थी, जो
कि दोनों ही एक प्राइवेट कंपनी में जॉब करते थे, और वो भी अक्सर मिलने आते रहते
थे।
“अरे, विकास भी आ गया, उसके लिए भी चाय बना
दे।” इतने में अनीता आंटी की ओर से एक और आदेश राधिका को मिला।
“हाँ बनाती हूँ।” राधिका ने कहा।
“आज संडे को कहा घूमने गया था, बीवी, बच्चों
को छोड़कर” इतने में वहाँ बैठी वाणी आंटी ने पूछा, जिसका जवाब अनीता आंटी ने दिया,
“कहाँ जाएगा, अपने दोस्तों से मिलने गया था,
अब एक इतवार ही तो मिलता है, यार-दोस्तों के साथ गुजारने को”
“राधिका को भी ले जाया कर घुमाने-फिराने” वाणी
आंटी ने कहा, लेकिन मैं जानती थी कि उन्होंने ये बात अनीता आंटी को भड़काने के इरादे
से कही है, क्योंकि उनका व्यवहार कैसा है अपनी बहु के साथ ये बात मुझसे छुपी नहीं थी।
“क्या करेगी राधिका घूम-फिर कर, अरे घर में पचास
काम होते है, वो तो पूरे होते नहीं, जब देखो कमरे में आराम ही करती रहेगी, अरे वो करे,
हो जाएगा घूमना-फिरना घर में ही, विकास तो पूरा हफ्ता नौकरी करता है, तो जरूरी हो जाता
है मूड फ्रेश करने के लिए दोस्तों से मिलना।” अनीता आंटी ने कहा।
“मम्मी, देखो, आहान ने मेरे कपड़ें गंदे कर दिए मिट्टी
ड़ालकर।” इतने में विहान रोते हुए आया, जो कि कुछ देर पहले अपने भाई आहान के साथ
बाहर गार्डन में खेलने गया था।
“ओहो, ये क्या किया, राधिका...अरे भई बदल
कपड़े अपने लाडले के” अनीता आंटी के कहते ही,
“मम्मी जी मैं रसोई में चाय-नाश्ता तैयार कर
रही हूँ, आप बदल दीजिए।” राधिका के कहते ही,
“मैं बदलवा देता हूँ।” इतने में विकास बोला।
“तू क्यों बदलवाएगा, अरे तू थका-हारा आया है,
तू आराम कर, राधिका ही बदलवाएगी, अरे करती क्या है पूरा दिन, काम ही कितना है घर
में......” इतना सुन राधिका सारा काम छोड़ विहान के कपड़े बदलवाने के इरादे से उसे जबरदस्ती
खींचकर ये कहते हुए कमरे में ले गयी कि,
“जानवरों की तरह से पूरा दिन लगी रहती हूँ, मदद करवाना
तो दूर, ताने ही सुनने को मिलते हैं, अरे एक छोटे से बच्चे के कपड़े बदलवाने तक कि तो
मदद कारवाई नहीं जाती आप लोगों से” और फिर कमरे से विहान के जोर-जोर से रोने की आवाज़ें
आने लगी, ज़ाहिर-सी बात है राधिका का गुस्सा विहान पर निकल रहा था।
“मम्मी...”इतने में एक नई आवाज मेरे कानों में पड़ी,
जो कि अल्पना की थी।”
“आज तो आंटी के यहाँ अच्छी-खासी चहल-पहल हो
रही है।” मैं मन ही मन बुदबुदाई।
“अल्पना, कैसी है बेटा”
“वाणी आंटी, नमस्ते, मैं ठीक हूँ आप कैसी हो,
बड़े दिनों बाद मिलना हुआ अपना” ये आवाज़ें अल्पना, और वाणी आंटी के बीच हो रही
बातचीत की थी।
“हाँ तो आंटी को याद ही नहीं करती तू, बस जब
भी आती है अपनी मम्मी से मिलकर वापिस चली जाती है।” वाणी आंटी ने शिकायत भरे लहजें
में कहा।
“क्या करूँ आंटी, यहाँ भी बस कुछ ही देर के
लिए मिलने आ पाती हूँ।” अल्पना के कहते ही,
“चल कोई बात नहीं, तू मिल अपने परिवार से, मैं
निकलती हूँ, वैसे दामाद जी, और तेरी बेटी नज़र नहीं आ रहे।” वाणी आंटी ने पूछा।
“हाँ वो बाहर गाड़ी पार्क करके आ रहे हैं, आप
रुकिए उनसे मिलकर जाना।” इतने में ही इरा, और रोहित भी आ गए और उनसे थोड़ी औपचारिक
बातें कर वाणी आंटी तो वापिस चली गयी, लेकिन विनोद जी का घर शोरगुल से गूँजने लगा,
जिसकी आवाज से अंदर कमरे में बैठे विनोद जी भी बाहर आ गए।
“आज तो मेरी अल्पना बिटिया रानी आयी है, और साथ में
छोटी गुड़िया इरा को भी लायी है।” विनोद जी ने इरा को गोद में उठाते हुए कहा।
“भाभी, खाने में क्या बना रही हो?” इतने में अल्पना
का स्वर कानों में पड़ा।
“आलू-मटर, बूंदी रायता और पराँठे” राधिका के
जवाब देते ही,
“अरे यार, कुछ तो अच्छा बनाओ।”
“तू बोल क्या खायेगी, वो ही बनवा दूँगी।”
अपनी बेटी का उदासी भरा स्वर सुन अनीता आंटी ने उससे पूछा।
“मम्मी मेरा पाव-भाजी खाने का मन हो रहा
है।”
“राधिका, सुना ना, चलो तैयारी करो पाव-भाजी
बनाने की” अनीता आंटी द्वारा राधिका को आदेश देते ही,
“लेकिन मम्मी जी खाना तो तैयार है, और अब
पूरा खाना दुबारा से बनाना पड़ेगा।” राधिका के कहते ही,
“तो क्या हुआ, मेरी बेटी कौनसा रोजाना आकर
कुछ खाने को माँगती है।” अनीता आंटी का स्वर मुझे कुछ क्रोध से भरा हुआ प्रतीत
हुआ।
“भाभी, रहने दो, जो भी है, हम वो ही
खायेंगे।” रोहित ने परिस्थिति को समझते हुए कहा।
“क्यों रहने दो, बनाने दो पाव-भाजी” अनीता
आंटी के कहते ही,
“ठीक है तो फिर अल्पना मदद करवाएगी।” रोहित
का ये कहना मुझे समझदारी भरा निर्णय लगा, लेकिन...
“क्यों करवाएगी मदद, मिलने आयी है काम
करवाने नहीं, राधिका को करने दो काम, अरे घर में काम ही कितना है, जो सब उसकी मदद
के लिए खड़े हो जाते हो, आप सब बैठो, बातें करते हैं, और घर के सभी कामों की
जिम्मेदारी राधिका को संभालने दो।” और फिर विनोद अंकल के घर पर एक अच्छी-खासी
बातचीत, हँसी-मज़ाक की महफ़िल जम गयी।
यूँ
तो मैं रोजाना सुबह नौ बजे ही बैंक के लिए निकल जाती हूँ, और वापिस आने में अक्सर
रात के आठ बज जाते है, इसलिए नीचे मकान मालिक के यहाँ क्या हो रहा है कुछ पता नहीं
चलता, लेकिन किसी भी बैंक हॉलिडे वाले दिन, और रविवार को अच्छी-खासी फिल्म देखने
को मिल जाती है, और अगर उस दिन अल्पना अपने परिवार के साथ आयी हुई हो तो
अच्छा-खासा मनोरंजन हो जाता है।
मैं पिछले दो साल से इस घर में एक किराएदार
की हैसियत से रह रही हूँ, और इन दो सालों में मुझे इस परिवार को अच्छे से समझने,
और परखने का मौका मिला है, और ये ही नहीं, इस प्रकार का माहौल मुझे और भी कई घरों
में देखने को मिला, या फिर सुनने में आया है, यहाँ तक कि कहीं ना कहीं मेरे घर
का माहौल भी कुछ ऐसा ही है। जिस वजह से मेरे ज़ेहन में अनगिनीत सवालों ने जन्म ले
लिया है।
जैसे कि क्या बहु इंसान नहीं होती, वो थकती
नहीं, उसकी भावनाएं नहीं होती, पूरा दिन काम करने के बावजूद ये क्यों कहा जाता है
कि काम ही क्या है इसके पास, और कोई उसकी इज्जत क्यों नहीं करता, उसके द्वारा किए
जाने वाले कामों के लिए उसे प्रोत्साहित क्यों नहीं किया जाता, और अगर बहु नौकरी
करती है तो भी ये उम्मीद की जाती है कि वो ही सुबह सारा काम करके घर से निकले और
वापिस आकर सारा काम करे।
इसके विपरीत बेटा अगर एक पानी का गिलास भी
भरकर दे दे तो तारीफ़ों के पुल बाँध दिए जाते हैं, और बहु के काम में हजारों
गलतियाँ निकाली जाती हैं। वही दूसरी ओर बेटी, और दामाद को पूरा सम्मान और इज्जत दी
जाती है, अगर बेटी बोल दे कि उसे ससुराल में बहुत अधिक काम करना पड़ता है, तो ये
कहा जाता है कि तेरी सास कैसी औरत है, कुछ भी काम नहीं करवाती, चाहे कहने वाला
महिला स्वंय अपनी बहु की मदद ना करवाती हो, दामाद को सर्वोच्च सम्मान देना तो
हमारे देश की रीत है, कुल मिलाकर बेटा, बेटी, दामाद सभी के साथ अच्छा व्यवहार किया
जाता है, लेकिन वही एक बहु के साथ भेदभाव !
मैं जानती हूँ कि इन सवालों का कोई जवाब
नहीं, हाँ शायद कई घरों में बहु के प्रति व्यवहार में बदलाव भी आया है, लेकिन इस
बदलाव का प्रतिशत काफी काम है, जिसमे बढ़ोतरी होनी चाहिए, और इसके लिए सभी को अपने
विचारों में थोड़ा-थोड़ा बदलाव करना होगा, क्योंकि जो लड़की आपके घर में बहु बनकर आयी
है, या आने वाली है, वो भी किसी के घर की बेटी है, और जो आपकी बेटी है वो भी किसी के
घर बहु बनकर गयी हुई है, या फिर जाएगी।
कुल मिलाकर चाहे बेटा हो, या दामाद, बहु हो या
बेटी सभी हर लिहाज से बराबरी के हकदार हैं, चाहे घर, और बाहर का काम हो, माँ-बाप की
सेवा हो, या फिर प्रॉपर्टी में हिस्सा..........।
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