Child And Screen / चाइल्ड एण्ड स्क्रीन ( Story On Screen Time)
"दादी, अपना मोबाईल दो ना मुझे।" 5 वर्षीय रेहान ने घर की बालकनी में बैठी अपनी दादी 55 वर्षीय सुधा से कहा ।
"क्यों दूँ मैं तुझे अपना मोबाईल?" सुधा ने रेहान की ओर आँखें दिखाते हुए पूछा।
"दादी प्लीज, मुझे गेम खेलना है।" रेहान ने जिद करने के अंदाज में कहा।
"ऐसी बात है तो जा अपनी माँ के फोन पर खेलना, जब वो स्कूल से वापिस आ जाए, मैं नहीं दूँगी अपना फोन" रेहान की माँ रचना पास ही एक प्राइमेरी स्कूल में टीचर है।
"दादी प्लीज"
"नहीं"
और इसी प्रकार फोन को लेकर अगले काफी देर तक दादी-पोते में बहस होती रही, लेकिन दोनों ही अपनी-अपनी बात से टस से मस नहीं हुए, फिर अंत में सुधा को ही अपनी जिद छोड़नी पड़ी, और अपना मोबाईल रेहान के सुपुर्दग करना पड़ा, और दूसरी ओर फोन मिलते ही रेहान का अंदाज कुछ ऐसा हो गया कि उसे दुनिया की सारी खुशियाँ मिल गयी हो।
"आदतें खराब कर रखी है रचना ने इसकी, हर वक्त मोबाईल पर ना जाने क्या करता रहता है, अगर ना मिले तो बैचेन हो जाएगा, अरे समझती क्यों नहीं समय से पहले आँखें खराब हो जायेंगी, और शरीर पर विपरीत प्रभाव पड़ेगा सो अलग, लेकिन मेरी सुनता कौन है।" सुधा बड़बड़ाती हुई बालकनी में इधर से उधर चक्कर लगाने लगी।
कुछ देर बाद, "क्या हुआ माँ, आप कुछ परेशान नज़र आ रही है?, तबीयत तो ठीक है ना आपकी" एक दुबली-पतली, गोरा रंग, एवं लंबे कद वाली रचना ने आकर पूछा।
"रचना....अच्छा हुआ जो तू आ गयी, अब संभाल अपने लाडले को, देख कैसे मोबाईल में घुसा बैठा है, अरे क्यों आदत खराब कर रहे हो तुम लोग इसकी, कभी तो घर के बाहर जाने दिया करो खेलने-कूदने, हर वक्त मोबाईल ही चलाता रहेगा तो इसका शरीरिक, और मानसिक दोनों ही रूपों से दुष्प्रभाव पड़ेगा।" सुधा एक ही साँस में अपनी बात कह गयी।
"माँ, आप सही हो, हमें हमारे बच्चों को मोबाईल, लैपटॉप जैसे इलेक्ट्रॉनिक गैजेट्स से दूर रखना चाहिए, हम अपनी सुविधा के लिए बच्चों के हाथ में मोबाईल तो दे देते हैं लेकिन इसका क्या दुष्प्रभाव पड़ेगा, ये बात हमें बाद में समझ आती है।" कहते-कहते रचना का स्वर धीमा हो गया।
"अरे क्या हुआ बेटा, तू उदास क्यों हो गयी, बुरा मान गयी क्या मेरी बात का, बेटा मैं तो जो कहती हूँ तुम्हारे भले के लिए कहती हूँ, अगर तुम्हें मेरी बात का बुरा लगा हो तो सॉरी, और अब अपनी सास को माफ करके बता कि आज कैसा गुजरा तेरा पूरा दिन" सुधा ने बात को संभालने की कोशिश करते हुए कहा।
"नहीं माँ आप गलत समझ रही हो, मैं आपसे बिल्कुल भी नाराज़ नहीं हूँ, बल्कि मैं तो आपकी बात से सहमत हूँ, और वादा करती हूँ, कोशिश करूँगी कि रेहान की हर वक्त फोन चलाने की आदत जल्द से जल्द छूट जाए।" रचना के कहते ही,
"लेकिन हुआ क्या है, जो तू आज इतनी बदली-बदली-सी नज़र आ रही है।" सुधा ने आश्चर्यचकित होते हुए पूछा।
"माँ आज स्कूल में एक अजीब घटना घटी।" रचना के कहते ही,
"घटना ! वो क्या ?" सुधा घटना को सुनने के लिए बेसब्र होने लगी।
"आज स्कूल में एक बच्चे के पेरेंट्स आए, बच्चे की उम्र 8 वर्ष है, कहने लगे उन्हे उनके बच्चे को स्कूल से निकलवाना है, अब वो उसे आगे नहीं पढ़ा सकते।" रचना ने जैसे ही अपना वाक्य पूरा कर एक सेकंड का विराम लिया,
"भला क्यों" सुधा ने अपना सवाल दाग दिया।"
"क्योंकि उनका बेटा अब देख नहीं सकता" कहते ही रचना का स्वर भर्राने लगा।
"देख नहीं सकता, कोई बीमारी हुई है उसे?"
"नहीं माँ, बल्कि अधिकतर समय मोबाईल चलाने की वजह से उसकी आँखें खराब हो गयी।"
"हे ईश्वर, ये क्या अनर्थ हो गया।" सुधा ने अचंभित होते हुए कहा।
"माँ उस बच्चे के पेरेंट्स ने बताया कि वो एक सरकारी दफ्तर में कार्यरत हैं, सुबह बच्चे को स्कूल छोड़ ऑफिस के लिए निकल जाते हैं, और शाम को देर से घर लौटते हैं, इस दौरान उन्होंने बच्चे की देखभाल के लिए एक बाई रखी हुई है, जो बच्चे से पीछा छुड़ाने के इरादे से अक्सर या तो उसके लिए टी. वी. चलाए रखती है, या फिर उसके हाथ में गेम खेलने के लिए अपना फोन दे देती है।" रचना के बताते ही,
"ऐसी बाई को काम से क्यों नहीं निकाल दिया उन लोगों ने?" सुधा ने पूछा।
"क्योंकि उन्हे उसकी इस हरकत का काफी समय बाद पता चला।"
"तो क्या असीमित समय तक स्क्रीन के सामने रहने से बच्चे की आँखें खराब हो गयी?"
"हाँ, काफी हद तक, लेकिन डॉक्टर के मुताबिक इसका एक अन्य कारण भी है ।"
"वो क्या भला" सुधा ने उत्सुकतावश पूछा।
"बच्चे का रात के अंधेरे में मोबाईल चलाना........डॉक्टर के मुताबिक अंधेरे में मोबाईल की रोशनी रेटिना पर असर डालती है, इससे आँखों में जलन, धुंधलापन, और सूखापन हो जाता है, उनसे पानी निकलने लगता है, और धीरे-धीरे रेटिना के डैमेज़ होने से आँखों की रोशनी भी जाने की संभवना रहती है, जो कि उस बच्चे के साथ हुआ, और अंधेरें में स्क्रीन के सामने रहने का दुष्प्रभाव बच्चों पर ही नहीं बल्कि बड़ों पर भी पड़ता है, उनकी भी आँखें खराब होने का खतरा बना रहता है।" रचना द्वारा अपनी बात कहते ही,
"लेकिन ऐसी की मुसीबत आन पड़ी थी कि रात के अंधरे में फोन चलाने की जरूरत पड़ गयी।
"उसे फोन चलाने की लत लग गयी थी माँ, ये भी एक प्रकार का नशा है, जो एक बार लग जाए तो छूटने का नाम ही नहीं लेता, और वो बच्चा इसी लत की वजह से एक पल के लिए भी मोबाईल से दूर नहीं रह पाता था, अगर नींद नहीं आ रही होती थी तो रात के अंधेरे में फोन चलाने लगता, माँ आप जानती है, उस बच्चे को क्लास में सबसे ज्यादा नंबर वाला चश्मा लगा हुआ है।"
"चश्मा लगने के बावजूद उसके माँ-बाप को समझ नहीं आया कि बच्चे को स्क्रीन से दूर रखे, और रात में जब बच्चा मोबाईल चलाता था तो उसके माँ-बाप को नज़र नहीं आता था।" सुधा ने नाराजगी जताते हुए पूछा।
"पूछा था हमारी प्रिन्सपल ने उनसे, तो बोले अगर उसके हाथ से फोन छीनते तो रोने लगता, उन्हे सोने नहीं देता, तो फिर वो लोग ना चाहते हुए भी उसे फोन चलाने के लिए दे देते, जिससे कि शांति से सो सके।" रचना ने बताया।
"मिल गयी शांति, अपनी सुविधा के लिए बच्चे की ज़िंदगी बर्बाद कर दी।" सुधा के स्वर में गुस्सा साफ झलक रहा था
"सच कहा माँ आपने, हम पेरेंट्स अपनी सुविधा में ये भूल ही जाते हैं कि हमारी वजह से हमारे बच्चों का नुकसान हो रहा है, हमें केवल अपना कम्फर्ट नज़र आता है, लेकिन मैं वादा करती हूँ कि अब रेहान को स्क्रीन से दूर रखूँगी, उसे आउट्डोर गेम्स के लिए बाहर लेकर जाऊँगी, उसके साथ वक्त बिताऊँगी।" रचना द्वारा कहते ही,
"शाबाश, मेरी समझदार बहु........जानती है रचना किसी दूसरे की गलती से सबक लेने वाले को क्या कहते है।"
"क्या ?"
"समझदार....अब ये साबित हो गया है कि मेरी बहु समझदार है।"
"माँ....आप भी ना, मुझे बहुत परेशान करती हो।" रचना ने जैसे ही कहा,
"सास हूँ, हक बनता है मेरा, तुझे परेशान करने का, लेकिन फिलहाल तू रेहान के हाथ से फोन वापिस ले, बहुत देर से चला रहा है।" सुधा ने जैसे ही कहा,
रचना ने दौड़कर रेहान के हाथों से फोन छीन लिया, और उसके रोने, एंव जिद करने के बावजूद उसे फोन ना देकर, उसका ध्यान अन्य गतिविधियों में लगाने की कोशिश करने लगी,।
"शाबाश बेटा, रेहान को स्क्रीन से दूर रखने की कोशिश का तेरे द्वारा उठाया गया ये पहला कदम काबिल-ए-तारीफ़ है, काश सभी पेरेंट्स अपनी सुविधा को प्राथमिकता ना देते हुए अपने बच्चे के भविष्य के बारे में सोचे, वो ये समझने की कोशिश करें कि जो स्क्रीन टाइम उनका बच्चा व्यतीत कर रहा है, वो उसका दुश्मन है।" और इतना कह सुधा ने रचना का माथा चूम लिया।
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