Ek Pariwaar Ki Maut / एक परिवार की मौत ( Article On Social System )
बेहद ही भयावह,
एवं अविस्मरणीय दृश्य था वो, उस हादसे की तस्वीर मेरे ज़ेहन में आज भी ताज़ा है, सच
कहूँ तो भूलना चाहूँ, तो भी नहीं भूल सकती।
पाँच साल पहले की बात है, दिसंबर महीने का दूसरा
हफ्ता चल रहा था, सर्दी अपनी चरमसीमा पर थी, उन दिनों में नोएडा में रहती थी,
क्योंकि तकरीबन छ: साल पहले ही वहाँ, मेरी एक प्राइवेट कंपनी में नौकरी लगी थी।
यूँ तो मैं अक्सर शाम 7 बजे तक ऑफिस से निकलकर पौने आठ-आठ बजे तक घर पहुँच जाती
थी, लेकिन उस दिन ऑफिस में स्टाफ की कमी, एवं काम ज्यादा होने की वजह से घर लौटने
में रात के 10 बज गए, वैसे तो मेरे पति पुनीत ने मुझसे पूछा था कि वो मुझे ऑफिस
में लेने आ जाए, लेकिन मैंने ही मना कर दिया, और अकेली ही ऑफिस से निकल ऑटो-रिक्शा
ढूँढने लगी।
अभी मैं ऑटो-रिक्शा ढूँढते हुए ऑफिस से कुछ
दूर ही निकली थी कि पीछे से कार का हॉर्न सुनाई दिया, “मैं तो सड़क के
किनारे-किनारे चल रही हूँ, तो फिर ये हॉर्न किसके लिए बजा रहा है?” खुद से
ही सवाल करते हुए मैंने जैसे ही पीछे मुड़कर देखा तो एक कार सड़क पर कभी इधर-तो कभी
उधर बेतरतीब चल रही थी।
“अरे बाप रे ! लगता है पीकर चला रहा
है, हे भगवान, मार ना दे ये किसी को”।“ उस कार को देख मैं घबरा गयी, और तुरंत फुटपाथ पर
चढ़ गयी।
इतने में वो कार सड़क के एक तरफ रुक गयी, और
फिर मैंने चैन की साँस ली, “लगता है इसका पेट्रोल खत्म हो गया, चलो अच्छा
है, अब जब तक इस कार के ड्राइवर का नशा नहीं उतर जाता, ये कार नहीं चलनी चाहिए ।”
में बुदबुदाई, और इधर-उधर नजरें घुमा ऑटो-रिक्शा ढूँढते हुए फुटपाथ पर चलने लगी।
अभी मैं कुछ कदम ही चली थी कि सामने से एक
स्कूटर आता हुआ नजर आया, जिस पर संभवत: पति-पत्नी, और दो बच्चे सवार थे, जिनमे से
एक बच्चा आगे खड़ा हुआ था, व दूसरा बीच में बैठा हुआ था। इसी दौरान मुझे पीछे से
कार का हॉर्न सुनाई दिया, जिसे देखने के लिए जैसे ही मैंने पीछे गर्दन घुमाई तो वो
वही शराबी ड्राइवर वाली कार थी, “ओहो, ये तो फिर से चल पड़ी, ये कहीं मुझे ही
नहीं उड़ा दे।” ये ख्याल ज़ेहन में आते ही मैं फिर से फुटपाथ पर चढ़ गयी।
“हे ईश्वर ! सही सलामत घर पहुँचा देना
आज, पूरे 101 रुपए का प्रसाद चढ़ाऊँगी........लेकिन ये रिक्शा क्यों नहीं मिल रहा?”
मैं तेज-तेज कदम बढ़ाती हुई, बुदबुदाती जा रही थी, कि इतने में जोरदार धमाका
हुआ........। और सड़क पर चारों तरफ खून ही खून की नदिया बहने लगी।
शराबी कार चालक ने उस स्कूटर को टक्कर मार दी
थी, और स्वंय सड़क के एक तरफ बने बड़े से पेड़ से जा टकराया, ये सब देख मैं बुरी तरह
से घबरा गयी, मेरे दिमाग ने काम करना बंद कर दिया, मेरी आँखों के आगे अंधेरा छा
गया, चक्कर आने लगे, इतने में पर्स में रखा मेरा फोन बजने लगा, कुछ समझ नहीं आ रहा
था कि क्या करूँ, क्या ना करूँ, फिर किसी तरह से खुद को संभालते हुए मैंने पर्स से
मोबाईल निकाला, कॉल पुनीत का था। मैंने तुरंत फोन उठाया, और पुनीत को सारा किस्सा
सुना जोर-जोर से रोने लगी।
“नमिता, संभालों खुद को, और अपनी लोकैशन
भेजो मुझे, मैं अभी वहाँ पहुँचता हूँ, और जमा भीड़ से कहो कि उन चारों को तुरंत
अस्पताल लेकर जाए, हो सकता है किसी की जान बच जाए।” पुनीत के कहते ही,
“कौनसी भीड़ पुनीत ? यहाँ तो सड़क दूर-दूर तक
सुनसान है, तुम जल्दी आओ।” इतना कह मैं तुरंत फोन काट घायल परिवार की ओर बढ़ गयी।
“अरे इन चारों की तो सांसें चल रही
हैं।” और फिर मैं हिम्मत दिखाते हुए तुरंत एम्बुलेंस बुलाने के लिए कॉल
करने लगी।
“पुलिस में भी इत्तला कर देती हूँ।”
और फिर मैंने अगले ही पल पुलिस को भी एक्सीडेंट की खबर दे दी, और स्वयं अपने पर्स
से पानी की बोतल निकाल जबरदस्ती उन चारों के मुँह में पानी डालते हुए, उन्हे
झकझोरकर उठाने की कोशिश करने लगी, कुल मिलाकर मैं हर संभव कोशिश करने लगी, उन्हे
बेहोश होने से रोकने की, लेकिन उनकी आँखें बंद होती जा रही थी।
“क्या हुआ?” इतने में पुनीत वहाँ आ गया।
“पुनीत मैंने एम्बुलेंस बुलवाई है, अभी तक
नहीं आयी, इन चारों की हालत बहुत खराब है, पता नहीं इनमे से कोई बचेगा भी, या
नहीं।” मेरे कहते ही,
“क्या खाक एम्बुलेंस आएगी, यहाँ से लगभग दो
किलोमीटर आगे भयंकर जाम लगा हुआ है।” पुनीत के कहते ही,
“तुम गाड़ी लाए हो ना, ऐसा करते है, हम ही
इन्हे अस्पताल लेकर चलते हैं।” और फिर तुरंत ही हमने उन चारों को गाड़ी में डाला,
और नजदीकी अस्पताल की ओर निकल गए, लेकिन अभी हमने आधी दूरी ही तय की थी कि जाम में
फँस गए।
“देखो जाम, अब कैसे इन लोगों को अस्पताल
पहुँचाए।” पुनीत ने झल्लाते हुए कहा।
“प्लीज हमें रास्ता दीजिए, हमारी गाड़ी में
चार घायल लोग हैं, जिनमे से दो छोटे बच्चें भी हैं, इन्हे तुरंत अस्पताल पहुँचाना
होगा।” मैं कार की विंडो से मुँह बाहर निकाल चिल्लाने लगी, लेकिन किसी ने मेरी तरफ
नहीं देखा, और ना ही कोई प्रतिक्रिया दी।
“देखा तुमने, कितनी मतलबी दुनिया है।” ये
नजारा देख पुनीत को गुस्सा आ गया, जो कि वाज़िब भी था।
“अरे पुनीत मैंने पुलिस को भी फोन किया था,
वो लोग घटनास्थल पर पहुँच जायेंगे।” इतने में मुझे याद आया।
“तुम उसी नंबर पर दुबारा कॉल कर बता दो कि
हम इन्हे लेकर अस्पताल जा रहे हैं।” और फिर मैंने वैसा ही किया, जैसा की पुनीत ने
बोला।
तकरीबन अगले एक घंटे तक जाम में फँसे रहने
के बावजूद हम जैसे तैसे करके अस्पताल पहुँचे, तो वहाँ जाकर पता चला कि ईमर्जन्सी
में कोई भी डॉक्टर ड्यूटी पर नहीं है, उन्हे उनके घर से बुलवाना पड़ेगा, जिसमे कुछ
वक्त जाएगा, फिर मैंने जब किसी दूसरे डॉक्टर को बुलाने के कहा तो पता चला कि वो
ऑपरेशन थिएटर में बिजी है, नतीजन, उन चारों का इलाज शुरू होने में बहुत देर हो
चुकी थी, और उन चारों को नहीं बचाया जा सका........।
उस
घटना ने मेरे मस्तिष्कपटल पर सवालों का ढ़ेर लगा दिया, जैसे कि लोग शराब क्यों पीते
हैं, और अगर पीते भी है तो उसके बाद ड्राइव क्यों करते हैं, कोई भी ट्रैफिक नियमों
का पालन क्यों नहीं करता, जिससे की जाम ना लगे, और उसमें फँसने से बचा जा सके, अगर
किसी को कहीं जल्दी जाना हो तो कम से कम वो वक्त पर तो पहुँच जाए, अरे कम से कम एम्बुलेंस
को तो जाम में फँसने ना दिया जाए, और सबसे बड़ी बात, कोई किसी जरूरतमन्द की मदद
करने के लिए आगे क्यों नहीं आता, क्यों सब मुँह मोड़कर चले जाते हैं, और इतना ही
नहीं, अस्पताल में भी क्यों तुरंत इलाज शुरू नहीं किया जाता, मामले की नज़ाकत को
समझे बिना ये कह दिया जाता है कि अभी इंतजार कीजिए, डॉक्टर साहब फला जगह व्यस्त
है, या फिर ड्यूटी पर मौजूद ही नहीं है। अगर ये सब बातें दुरुस्त होती तो, एक परिवार
को आसानी से मौत के मुँह में जाने से बचाया जा सकता था। लेकिन ये हो नहीं पाया.......
मैं जानती हूँ कि कितने ही सवाल मन में उठें, लेकिन इनका जवाब कहीं नहीं है, और ना ही बदलाव संभव है, ऐसा नहीं है कि बदलाव हो नहीं सकता, बल्कि कोई करना नहीं चाहता, दरअसल लोगों की आँखें तब ही खुलती है, जब उनका कोई अपना मुसीबत में हो, वरना अधिकतर लोग मुँह मोड लेते हैं।
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