Itna Lalch Kyo / इतना लालच क्यों ? ( Story On Family)
पिछले हफ़्ते की बात है, मैं दिल्ली स्थित अपने घर के पीछे बने एक पार्क में सुबह की सैर कर रही थी, कि अचानक से मेरी नज़र पार्क में बनी एक बेंच पर बैठी दुबली-पतली, लंबे कद वाली, साँवले रंग की एक महिला पर पड़ी, "ये कौन है?" मैंने उसे पहचानने की कोशिश करते हुए स्वयं से ही पूछा............"अरे ये तो कविता है।" अगले ही पल मैंने चहकते हुए स्वंय को ही जवाब दिया। और बिना वक्त गवायें उस ओर चल पड़ी जहाँ कविता बैठी हुई थी, कविता मेरी कॉलेज फ्रेंड है, हमने दिल्ली के एक जाने-माने कॉलेज से एक साथ अन्डर ग्रेजुएशन की थी
"कविता" के पास पहुँचकर, जैसे ही मैने उसे आवाज
लगायी।
"सृष्टि !" वो चेहरे पर आश्चर्य क्व भाव लिए खड़ी
हो गयी।
"हम्म, मैं सृष्टि, तुम यहाँ कैसे?" मैंने पूछा।
"अब मैं यहीं रहती हूँ दिल्ली में, वो देखो सामने मेरा घर
है।" उसने पार्क की पूर्व दिशा की ओर एक बँगले की ओर इशारा
करते हुए कहा।
"तुम इस बँगले में रहती हो! क्या इन लोगों
ने बँगले का कुछ हिस्सा किराए पर देना शुरू कर दिया, लेकिन ऐसा कैसे हो
सकता है, इनका
तो खुद का परिवार बहुत बड़ा है।" मैं आश्चर्यचकित हो सवाल पे सवाल किए जा रही
थी।
"नहीं, मैं इस बँगले के मालिक
रत्न सिंह जी के छोटे बेटे स्वर्गीय अरमान सिंह की विधवा हूँ।" कविता के कहते
ही,
"क्या ! तुम अरमान की पत्नी हो, लेकिन उसने तो घर से
भागकर शादी की थी।"
"हाँ, मैं वो ही लड़की
हूँ।"
"सॉरी, माफ करना मुझे नहीं
पता था कि तुम अरमान की पत्नी हो, तकरीबन, दो महीनें पहले अखबार
में खबर आयी थी कि हैदराबाद में अरमान का एक्सीडेंट हो गया है, और फिर कुछ दिनों बाद
उसकी मौत की खबर आ गयी, अरमान
अब नहीं रहा, ये
जानकर बहुत दुख हुआ, मैं
उसकी शोक सभा में भी आयी थी, किन्तु तुम तो मुझे कहीं भी नज़र नहीं आयी
!" मैंने अरमान की शोक सभा के क्षणों को याद करते हुए कहा।
"मैं
उस वक्त यहाँ नहीं थी, हैदराबाद
के एक अस्पताल में भर्ती थी।"
"क्या ! लेकिन क्यों, क्या तुम भी उस एक्सीडेंट के दौरान
अरमान के साथ थी?" मैने
पूछा।
"नहीं, उस वक्त मैं प्रगनेंट
थी, और
डिलीवरी के लिए अस्पताल
में भर्ती हुई थी।" इतना कहते ही कविता की आँखें भर आयी।
"माफ करना कविता, मुझे इन सबके बारे में
कुछ नहीं पता था।"
"जानती हूँ।"
"लेकिन शोक सभा के
दौरान तुम्हारा कोई जिक्र नहीं आया, वैसे मैंने अरमान की
पत्नी के बारे में जानने की कोशिश की थी, लेकिन किसी ने स्पष्ट
जवाब नहीं दिया।
"जानती हूँ, मेरे ससुरालवाले मुझे
पसंद नहीं करते, वो
किसी से मेरे बारे में बात भी नहीं करना चाहते, और अब तो मेरी दो
महीनें की नन्ही बेटी आयुषी को भी अपशगुनी कहते हैं, क्योंकि उसके आने के
साथ ही अरमान चला गया।" कविता की आवाज में दर्द भरा हुआ था।
"तो फिर तुम यहाँ कैसे ?" उसकी दुख भरी दास्तान
सुन मेरे दिमाग
में ये सवाल उठना वाज़िब था।
"मजबूरी में"
"मतलब !"
"सृष्टि, तुम तो जानती हो, सालों पहले मेरे
माँ-बाप का निधन हो गया था, भाई-भाभी
के पास रहती थी मैं, लेकिन
जब उन्हे पता चला कि मैंने अरमान के साथ भागकर शादी कर ली है तो उन्होंने मुझसे
सारे नाते तोड़ लिए, यहाँ
तक कि वो अरमान के जाने पर भी मुझसे मिलने नहीं आए, दूसरी ओर शादी के बाद
मैंने अपनी मर्जी से जॉब छोड़ दी थी, और अब दूसरी जॉब मिलना
बेहद ही मुश्किल है, और
आयुषी के साथ जॉब मैनेज करना असंभव, तो फिर क्या करती
बार-बार इज्जत की धज्जियाँ उड़ने के बावजूद पेट पालने के लिए आ गयी यहाँ "
कविता द्वारा अपनी बात पूरी करते ही,
"तेरे यहाँ आने पर तेरे
ससुरलवालों ने कोई ऐतराज नहीं किया, और उन्होंने आयुषी को
कैसे अपना लिया ?" इतना पूछते ही मेरी सवालिया नजरें कविता के चेहरे पर
जा टिकी।
"मैंने कब कहा कि मेरे
ससुरलवालों ने मुझे, और
मेरी बेटी को अपना लिया है, बल्कि
मैं उस घर के अंदर एक नौकरानी की हैसियत से रहती हूँ, घर के सारे काम करती
हूँ, 20, 000 रुपए
महीनें के हिसाब से मिलते है, लेकिन बाहर वालों के लिए उनके स्वर्गवासी
पुत्र की विधवा हूँ।" कविता के जवाब देते ही,
"ये तो बेहद ही दर्द
भरा है, तो
फिर तू यहाँ रहती क्यों है, क्यों
रोज-रोज बेइज्जत होती है, कहीं
कोई इज़्ज़तदार नौकरी क्यों नहीं कर लेती।" मैने सुझाव दिया।
"रहूँगी तो यही, अपने हक के लिए, सृष्टि ये बँगला अरमान
के दादाजी की संपाति है, जिस
पर अरमान के बाद अरमान
की पत्नी होने के नाते, मेरा
भी अधिकार बनता है, और
इसी नाते मैं इस पर से अपना अधिकार नहीं छोड़ूँगी।"
"तो फिर तुम अपने हक के
पैसे लेकर यहाँ से चली क्यों नहीं जाती, चंद पैसों के लिए
क्यों रोज-रोज अपनी इज्जत खराब कर रही हो?" मैंने सुझाव दिया।
"वो आसानी से नहीं
मिलेंगे।"
"लेकिन क्यों?
"क्योंकि उन पर मेरी
जेठानी कुंडली मारकर बैठी हुई है।" कविता ने बताया।
"बेहद ही असमंजस की
स्थिति है, अभी
तो तुम्हारे ससुर जिंदा है, फिर
ये जेठानी कहाँ से आ गयी।"
"अरे भई मेरी जेठानी का
कहना है कि इस पूरी संपाति पर उसके इकलौते बेटे का अधिकार है, इसलिए वो मेरे ससुर को
अपने चाकू की नोक पर रखती है, कहती है अगर उन्होंने ये सारी
जमीन-जायदाद उसके बेटे के अलावा किसी ओर के नाम की तो उससे बुरा कोई नहीं होगा, और इतना ही नहीं एक
बार मेरे ससुर ने बातों ही बातों में कह दिया कि इस संपत्ति पर तो उनकी बेटी यानि
कि मेरी नन्द अर्चना का भी हक बनता है, उसके बाद तो मेरी
जेठानी ने अर्चना का यहाँ आना ही बंद करवा दिया, अब बेचारे मेरे
सास-ससुर को जब भी अर्चना की याद आती है तो उसके घर जाकर मिल आते हैं, और जो मेरा देवर है, उसने तो डर के बारे
सामने से ही अपने सारे हक छोड़ दिए, कहता है मुझे कुछ नहीं
चाहिए, बस
शांति से मुझे, और
मेरे परिवार को यहाँ रहने दो, जानती है सृष्टि, मेरी जेठानी का औरा इतना भयंकर है कि कोई
सामने कुछ बोल भी नहीं पाता।" कविता के बताते ही,
"अरे बाप रे ! इंसान है
या शैतान?" मैंने
आश्चर्यचकित होते हुए पूछा।
"जो भी है, मैं भी उसे बराबर की
टक्कर दे रही हूँ, अपना
हिस्सा तो लेकर रहूँगी, चाहे
इसके लिए चाकू उठाना पड़े, या
छुरी।" कविता के द्वारा कहे गए इस वाक्य को सुन मैं सहम गयी, सोचने लगी क्या
जमीन-जायदाद इतनी अहम होती है, जबकि उसे तो कोई मरने के बाद साथ लेकर भी
नहीं जाता।
"तू कहाँ रहती है, बुलाएगी नहीं अपने
घर" इतने में कविता के द्वारा कहे गए इस कथन ने मेरा ध्यान उसकी ओर खींचा।
"हाँ-हाँ क्यों नहीं, वो देख सामने वाले जो
घर बने हुए हैं, बस
उनके पीछे ही मेरा घर है, अड्रेस
मैसेज कर दूँगी, तू
अपना फोन नंबर दे दे मुझे" मैंने दक्षिण दिशा की ओर बने हुए घरों की तरफ
इशारा करते हुए कहा।
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