Aise Bhi Dost Hote Hain ! / ऐसे भी दोस्त होते हैं ! (Story On Friendship)
जून के महीनें का पहला हफ्ता चल रहा था, गर्मी इतनी तेज पड़ रही थी कि सहन ना हो, घर से बाहर निकलो तो लू के थपेड़े बदन झुलसा देते, इस भीषण गर्मी के प्रकोप से बचने के लिए जयपुर शहर के शास्त्री नगर इलाके में किराए के घर में रहने वाली पल्लवी सुबह ही नाश्ता, और अपने पति जतिन जो कि एक प्राइवेट कंपनी में मैनेजर की पोस्ट पर कार्यरत है, का टिफ़िन लगाने के साथ-साथ दोपहर तक के रसोई के सारे काम निपटा अपने कमरे में पेंटिंग करने बैठ जाती। जतिन और पल्लवी ने घरवालों की मर्जी के खिलाफ जाकर घर से भागकर अन्तरजातीय शादी की थी, जिस वजह से दोनों के ही परिवारवालों ने इनसे नाता तोड़ लिया।
पल्लवी, जयपुर के एक प्राइवेट स्कूल में आर्ट टीचर है, फिलहाल स्कूल में समर-वैकैशन चलने की वजह से वो घर पर ही रहती, और अपना मनपसंद काम पेंटिंग कर वक्त गुजारती, जतिन, और पल्लवी के कोई औलाद नहीं होने की वजह से दोनों पति-पत्नी का नौकरी से बचा हुआ वक्त या तो खुद के लिए, या फिर एक दूसरे के लिए होता, बच्चा नहीं होने का कारण दोनों ही अक्सर निजी बताते।
दोनों ही पति-पत्नी की ज़िंदगी की गाड़ी बहुत ही सहजता से चल रही थी, कि एक दिन, “ट्रिन-ट्रिन” पल्लवी के मोबाईल की घंटी बजी, उस वक्त पल्लवी पेंटिंग बनाने में व्यस्त थी।
“किसका फोन आ गया इस समय” पल्लवी ने अपने हाथ में पहनी स्मार्ट वाच की ओर नज़र दौड़ाते हुए स्वंय से ही पूछा, और फिर कुछ दूरी पर चार्ज हो रहे मोबाईल की ओर बढ़ गयी, मोबाईल की स्क्रीन पर नज़र डाली तो उस पर जतिन का नाम डिस्प्ले हो रहा था।
“जतिन ! इस समय, लगता है आज ऑफिस में काम ज्यादा नहीं है, शायद इसलिए फोन कर लिया।” अंदाजा लगाते हुए पल्लवी ने जैसे ही फोन उठाया।
“हैलो” पल्लवी के कुछ बोलने से पहले ही दूसरी ओर से एक महिला की आवाज आयी।
“हैलो, कौन” पल्लवी ने घबराते हुए पूछा।
“हैलो मिसेज जतिन?’
“जी मैं बोल रही हूँ, लेकिन आप कौन” पल्लवी के स्वर में घबराहट साफ झलक रही थी।
“जी मैं निहारिका, जतिन की कलीग हूँ, दरअसल अभी कुछ देर पहले जतिन अपने कैबिन में चक्कर खाकर गिर पड़ा, उसे सिटी हॉस्पिटल लेकर गए हैं, आप भी वहाँ पहुँच जाइए।” निहारिका द्वारा अपनी बात पूरी करते ही,
“जी मैं पहुँचती हूँ।” इतना कह घबराई हुई पल्लवी फटाफट अपना पर्स उठा, पैरों में चप्पल डाल, बाहर खड़ी स्कूटी की ओर दौड़ी।
कुछ देर बाद हॉस्पिटल पहुँच जैसे ही पल्लवी ने enquiary department में पूछा तो पता चला कि, कुछ देर पहले यहाँ जतिन नाम का व्यक्ति admit हुआ है, जो कि फिलहाल emergency ward में है, जतिन की जानकारी मिलते ही पल्लवी emergency ward की ओर भागी, “किशन भैया, क्या हुआ है जतिन को” वहाँ पहुँचते ही सामने जतिन के ऑफिस कलीग लगभग 40 वर्षीय सामान्य कद-काठी के किशन को सामने देख पल्लवी ने पूछा।
“पता नहीं भाभी, अचानक से ही बेहोश हो गया था, डॉक्टर चेक कर रहे हैं, लेकिन अभी तक कुछ बताया नहीं।” किशन बोला।
“जतिन, जतिन” अगले पल पल्लवी सामने लेटे जतिन की ओर गयी, और उसे पुकारने लगी।
“मैंने भी बहुत आवाज़ें लगायी भाभी, लेकिन कुछ बोल ही नहीं रहा जतिन” किशन के बताते ही,
“मैं पूछकर आती हूँ।” इतना कह पल्लवी कुछ दूर खड़े डॉक्टर की बढ़ गयी, और किशन भी उसके पीछे-पीछे चल पड़ा।
“डॉ साहब, मैं पल्लवी, वो जो वहाँ लेटे हुए है, उनकी पत्नी” पल्लवी ने जतिन की ओर इशारा करते हुए कहा।
“जी उनके टेस्ट चल रहे हैं, रिपोर्ट आने पर चक्कर आने का कारण पता चलेगा।” पल्लवी द्वारा कुछ पूछने से पहले ही डॉक्टर साहब ने उसे सबकुछ बता दिया, और वहाँ से चले गए।
“लेकिन....” पल्लवी बस इतना ही कह पायी, लेकिन किसी ने उसकी आवाज नहीं सुनी।
“कुछ समझ नहीं आ रहा कि क्या हुआ है, अच्छा-खासा काम कर रहा था कि अचानक से गिर पड़ा।” इतने में किशन बोला।
“रिपोर्ट आने तक इंतजार करते हैं।” बस इतना बोल पल्लवी जतिन के बेड के पास जा पास रखी कुर्सी पर अपना माथा पकड़कर बैठ गयी।
कुछ घंटों बाद, “मैडम, आपको डॉक्टर साहब अपने कैबिन में बुला रहे है।” एक नर्स ने आकर पल्लवी से कहा, और फिर पल्लवी तुरंत ही उठकर डॉक्टर के कैबिन की ओर भागी।
“डॉक्टर साहब, क्या मैं अंदर आ सकती हूँ?” पल्लवी के पूछते ही,
“जी, जी आइए”
“क्या हुआ है जतिन को, क्या आया रिपोर्ट में, उसे अभी तक होश क्यों नहीं आया?’ डॉक्टर के कैबिन में घुसते ही पल्लवी ने सवालों की बौछार कर दी।
“आप शांति से बैठिए पहले, लीजिए पानी पीजिए” डॉक्टर साहब ने पल्लवी को रीलैक्स करते हुए कहा।
“जी धन्यवाद, प्लीज बताइए क्या हुआ है जतिन को?” पल्लवी, जतिन की टेस्ट रिपोर्ट के बारे में जानने के लिए आतुर हो रही थी।
“देखिए, फिलहाल कुछ रिपोर्ट्स आनी अभी बाकी है, लेकिन अभी तक की रिपोर्ट्स के मुताबिक हमें लग रहा है कि आपके पति को ब्रैन ट्यूमर है।”
“ब्रैन ट्यूमर !” पल्लवी बस इतना ही कह पायी, और उसकी आँखों से आँसू बहने लगे।
“देखिए आप प्लीज शांत हो जाइए, अभी कुछ और रिपोर्ट्स आनी बाकी हैं, उसके बाद ही सब साफ होगा।” डॉ साहब ने मामले की नज़ाकत को समझते हुए कहा।
“वो कब तक आयेंगी?”
“एक-दो दिन में, वैसे आपके
साथ कोई और फैमिली मेम्बर नहीं आया?”
“जी नहीं, मैं सब मैनेज कर लूँगी।” बस इतना कह पल्लवी अपने आँसू पोंछते हुए डॉक्टर के कैबिन से बाहर आ गयी।
दो दिन बाद- जतिन को होश आ चुका था, और उसकी बची हुई रिपोर्ट्स भी, जिनके मुताबिक डॉक्टर साहब ने ब्रैन सर्जरी की सलाह दी, लेकिन पल्लवी की आर्थिक स्थिति मजबूत नहीं होने की वजह से वो जतिन को डॉक्टर साहब की सहमति से डिस्चार्ज करवा घर ले आयी, और अब जतिन का दवाइयों के द्वारा घर पर ही इलाज चल रहा है, डॉक्टर का कहना है कि जितनी जल्दी जतिन की सर्जरी होगी, उतनी जल्दी उसके ठीक होने की उम्मीद है, इस वजह से पल्लवी ने अपने स्कूल में, जतिन के ऑफिस में, अपने कुछ जानकारों से, यहाँ तक कि जतिन, और स्वंय के परिवारवालों से भी मदद की गुहार लगायी, लेकिन सबने मुँह मोड लिया, और किसी ने उसकी मदद करने की कोशिश भी की तो वो पर्याप्त नहीं थी।
पल्लवी अब हार चुकी थी, उम्मीदों के सारे दरवाज़ें बंद हो चुके थे, इसी दौरान एक दिन, “पल्लवी....” अपना नाम सुन पल्लवी आवाज की दिशा की ओर देखने लगी।
“दीप्ति !” सामने खड़ी एक दुबली-पतली, तकरीबन 5’7’’ लंबी महिला को देख पल्लवी ने आश्चर्य से कहा।
“हाँ मैं दीप्ति, लेकिन तू यहाँ कैसे” दीप्ति के पूछते ही,
“मैं शास्त्री नगर में रहती हूँ, अपने पति जतिन के साथ, यहाँ अम्बाबड़ी सब्जी मंडी में सब्जी, और फ्रूइट्स लेने आयी थी, लेकिन तू यहाँ कैसे ?” पल्लवी ने पूछा।
“मैं यहाँ अम्बाबड़ी में ही रहती हूँ, अपने पति सौरभ, और दो बेटियों के साथ, मेरा खुद का घर है यहाँ” दीप्ति के कहते ही,
“बहुत खुशी हुई तुझसे मिलकर, सालों बाद मिलें हैं हम, याद है 10th के बाद ऐसे बिछुड़े कि फिर मिल ही नहीं पाए।” पल्लवी ने अपने बचपन की दोस्त को सामने देख कहा।
“हाँ, शुरुआती कुछ साल तो फोन पर संपर्क में रहे, फिर वो भी खत्म हो गया।” दीप्ति ने पल्लवी की बात को जारी रखते हुए कहा।
“हम्म, मेरे पापा का तबादला रायपुर हो गया था, इस चक्कर में सारे संपर्क टूट गए।” पल्लवी ने बताया।
“पल्लवी, तू कुछ बीमार-सी भी लग रही है, सबकुछ ठीक तो है?” इतने में दीप्ति ने पूछा।
“मैं बिल्कुल ठीक हूँ।”
“लेकिन, लगता तो नहीं है।”
दीप्ति के कहते ही
“मतलब” पल्लवी ने पूछा।
“देख चेहरा अपना, कितना मुरझाया हुआ है, आँखों के नीचे काले गड्डे हो रहे हैं, और कमजोर भी कितनी हो रही है, सब ठीक तो है ना।” दीप्ति के पूछते ही,
“अरे सब ठीक है, अच्छा अब मैं घर के लिए निकलती हूँ, तू अपना कान्टैक्ट नंबर दे फोन पे बात करेंगे।” पल्लवी ने कहा।
“नहीं, तू फिलहाल मेरे साथ मेरे घर चल रही है, पास में ही है, इतने सालों की ढेरों बातें भी तो करनी हैं।” दीप्ति ने जिद करने के अंदाज में जैसे ही कहा,
“अरे नहीं, पॉसिबल नहीं हो पाएगा, मैं ज्यादा देर के लिए जतिन को घर पर अकेला नहीं छोड़ सकती।”
“मैं कुछ समझी नहीं”
दीप्ति ने आश्चर्य से पूछा।
“बहुत लंबी कहानी है, बाद में बताती हूँ।” इतना कह जैसे ही पल्लवी अपनी स्कूटी की ओर जाने लगी, दीप्ति ने आनन-फानन में उससे उसका फोन नंबर, और अड्रेस माँग लिया।
अगले दिन दोपहर को जब पल्लवी जतिन को खाना खिला रही थी तो एकाएक डोर बेल बजी, “इस टाइम कौन आ गया, चैन से खाना भी खिलाने देते।” बड़बड़ाते हुए पल्लवी ने जैसे ही दरवाजा खोला, तो सामने दीप्ति थी।
“हैलो....” दीप्ति के कहते
ही,
“तू, यहाँ, इस वक्त”
“हाँ मैं यहाँ, वो भी इस
वक्त, अब अंदर नहीं बुलाएगी क्या?” दीप्ति के कहते ही,
“अरे हाँ सॉरी, सुन तू बैठ, मैं 10 मिनिट में आती हूँ।” इतना कह पल्लवी, दीप्ति को ड्रॉइंग रूम में बैठा, वापिस जतिन को खाना खिलाने चली गयी।
10-15 मिनिट बाद, “सॉरी यार तुझे इंतजार करना पड़ा।” पल्लवी ने माफी माँग, साथ लाया हुआ पानी का गिलास दीप्ति के सामने रखते हुए कहा।
“अरे नहीं, कोई बात नही, सॉरी तू खाना खा रही थी, और मैंने तुझे डिस्टर्ब कर दिया’’ दीप्ति को एहसास हुआ कि वो गलत वक्त पर आ गयी है।
“नहीं, दरअसल में जतिन को
खाना खिला रही थी।” पल्लवी के कहते ही,
“मैं कुछ समझी नहीं !”
दीप्ति ने आश्चर्य से पूछा।
“जतिन की तबीयत ठीक नहीं है।” इतना कहते ही पल्लवी खुद को रोक नहीं पायी, और रोने लगी।
“क्या हुआ?” दीप्ति ने
घबराते हुए पूछा।
“2 महीने पहले की बात है, जतिन को अचानक से ऑफिस में चक्कर आया........” और फिर पल्लवी ने शुरू से आज तक की सारी कहानी सुना डाली।
“कैसे माँ-बाप हैं, जो अपने बेटे के इलाज के लिए पैसे नहीं दे सकते, अरे उसने अपनी पसंद से शादी ही तो की है, कोई गुनाह तो नहीं” पूरी बात सुन दीप्ति ने कहा।
“कुछ समझ नहीं आ रहा कि क्या करूँ, अपने पति को ना तो तड़पते हुए देख सकती हूँ, और ना ही उनका इलाज करवा सकती हूँ।” इतना कह पल्लवी फिर से रोने लगी।
“तू सब्र कर सब ठीक हो जाएगा, ईश्वर ने इतनी बड़ी मुश्किल दी है तो उससे निकलने का रास्ता भी सुझाएगा।” दीप्ति ने पल्लवी को ढाँढ़स देते हुए कहा।
“सॉरी यार, अपने दुख में तेरे लिए चाय बनाना तो भूल ही गयी।” इतना कह पल्लवी जैसे ही चाय बनाने के लिए उठने लगी, दीप्ति ने उसे रोक लिया, और फिर कुछ देर बाद जतिन से मिल वापिस चली गयी। और फिर उसके बाद दोनों सहेलियों में अगले कई दिनों तक कोई संपर्क नहीं हुआ। लेकिन.......
15 दिन बाद, सुबह लगभग 7 बजे, पल्लवी के घर की बेल बजी, दरवाजा खोला तो सामने दीप्ति थी, “दीप्ति, तू, इतनी सुबह-सुबह” पल्लवी ने सामने दीप्ति को देख आश्चर्य से पूछा।
“हम्म, काम ही कुछ ऐसा था,
मैंने देर करना उचित नहीं समझा”
“मैं कुछ समझी नहीं”
पल्लवी ने पूछा।
“ये ले, और इलाज शुरू करवा जतिन का” इतना कहते ही दीप्ति ने एक चेक पल्लवी की हाथों में रख दिया, जिसे देख....
“एक करोड़ !” चेक देख
पल्लवी की आँखें फटी की फटी रह गयी।
“हम्म, पैसों का बंदोबस्त हो गया है, अब ज्यादा मत सोचे, और जल्द से जल्द इलाज शुरू करवा।”
“लेकिन इतनी बड़ी रकम आयी कैसे, और कहाँ से?” पल्लवी के लिए ये सब एक सपने जैसा था।
“मैंने अपना घर गिरवी रख दिया है।” दीप्ति के इतना कहते ही पल्लवी स्थिर हो गयी, उसे ना कुछ सुनाई दे रहा था, ना दिखाई, उसके सोचने समझने की शक्ति जा चुकी थी।
“सोच क्या रही है, बिल्कुल ठीक हो जाएगा जतिन” दीप्ति ने जैसे ही पल्लवी को झकझोरते हुए कहा।
“क्या जरूरत थी इतना सब करने की, मुझे तो विश्वास ही नहीं हो रहा कि तूने इतना बड़ा कदम उठाया है मेरे लिए, और कैसे लौटाऊँगी में तेरे ये रुपए, और एहसान” पल्लवी ने दीप्ति के सामने हाथ जोड़ते हुए कहा।
“उस बारे में हम बाद में बात करेंगे, फिलहाल जतिन को हॉस्पिटल लेकर जा, और जल्द से जल्द सर्जरी करवा।” दीप्ति के इतना कहते ही पल्लवी उसके गले लग गयी, और फूट-फूटकर रोने लगी।
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