Swaal Astitv Ka / सवाल अस्तित्व का ( Story On Women)

        इंदौर की एक जानी-मानी कॉलोनी में बने एक बँगलें में आज काफी चहल-पहल है, कारण उस घर के मालिक 55 वर्षीय गौतम जी, एवं उनकी पत्नी 50 वर्षीय कुमकुम, की बेटी अंजना आज शादी के बाद पहली बार पगफेरे की रस्म के लिए आ रही है, जिसकी शादी दो दिन पहले इंदौर के ही एक परिवार में उस घर के मालिक अजित सिंह जी के बड़े बेटे प्रणव के साथ सम्पन्न हुई थी, जो कि एक प्राइवेट बैंक में ऑफिसर के पद पर कार्यरत है।            

    “वंदना, आरती की थाली तैयार की, या नहीं?” कुमकुम ने अपनी बहु से आवाज लगाकर पूछा।

    “कर रही हूँ मम्मी जी”

   “हम्म, थोड़ा जल्दी करो, कपिल, अंजना को लेकर आता ही होगा।” कपिल, कुमकुम का बड़ा बेटा, एवं वंदना का पति है।


    कुछ देर बाद, “मम्मी....” इतने में बाहर से 25 वर्षीय सामान्य कद-काठी, गोरे रंग के स्वामित्व वाली अंजना की आवाज आयी।

    “रुक, रुक बाहर दरवाज़ें पर ही खड़ी रह, पहले तेरी आरती उतारूँगी, उसके बाद अंदर आना।” इतने में कुमकुम ने अंजना को दरवाजे पर रोकते हुए कहा।

      “आरती ! वो क्यों?” अंजना ने आश्चर्य से पूछा।

    “शादी के बाद पहली बार आयी है ना इसलिए” जिसका जवाब उसी समय वहाँ आए गौतम जी ने दिया।

     “ओह....” अंजना ने धीमे से कहा।

     “तू बैठ, मैं तेरे लिए पानी लेकर आती हूँ।” आरती के उपरांत अंजना के घर में प्रवेश करते ही कुमकुम ने उसे ड्रॉइंग रूम में बैठने का इशारा करते हुए कहा।

     “वो तो मैं ही ले लूँगी, आप क्यों ला रही हो।” अंजना द्वारा सहजता से कहते ही,

     “दीदी, अब आप मेहमान हो इस घर में, और मेहमान की खातिरदारी की जाती है, ना कि वो खुद अपने चाय-पानी का इंतजाम करता है।” इतने में वंदना ने हँसतें हुए कहा।

    “मेहमान ! लेकिन ये तो मेरा ही घर है ना?” अंजना ने आश्चर्य से पूछा।

      “है नहीं, था, बेटा शादी के बाद लड़की का असली घर उसका ससुराल होता है, अब तू इस घर में एक मेहमान की हैसियत से ही आएगी।” गौतम जी के कहते ही, ना चाहते हुए भी अंजना की आँखें नम हो गयी, जिन्हे कि उसने बड़ी ही सूझबूझ से सबकी नज़रों से छुपा लिया।

       “एक दिन में ही पराया कर दिया आप लोगों ने मुझे तो” गौतम जी की बात सुन, निराश हो चुकी, अंजना ने जबरन मुस्कुराते हुए कहा।

       “यही दुनिया की रीत है, अच्छा बता क्या खायेगी, वहीं बनाऊँगी तेरे लिए, फिर शाम के डिनर के लिए तो दामाद जी की पसंद का खाना बनेगा।” कुमकुम के पूछते ही,

      “कुछ भी, जो आप चाहो, वैसे भी मेहमानों से पूछा नहीं जाता, मेजबान अपनी सुविधा से ही कुछ बना लेता है।” अंजना ने ताना कसा।

      “बेटा इसमे बुरा मानने वाली बात नहीं है, ये तो समाज द्वारा बनाया गया नियम है, शादी के बाद एक लड़की का असली घर उसका ससुराल ही होता है, मायके में तो वो एक मेहमान की हैसियत से ही आती है।” अंजना का मुरझाया हुआ चेहरा देख गौतम जी ने उसे समझाते हुए कहा।

     “हम्म, ठीक है” गौतम जी के द्वारा कही बात की बस इतनी-सी प्रतिक्रिया दे अंजना सामने रखी एक साप्ताहिक पत्रिका के पन्ने पलटने लगी।

     “दीदी, खाना बनने में तो अभी थोड़ा टाइम लगेगा, अगर आप कहो तो जब तक आपके लिए कुछ ठंडा बना दूँ........आपको कॉफी पसंद हैं ना, कोल्ड कॉफी बना देती हूँ।” वंदना के कहते ही,

      “और फिर कॉफी पीकर, अपने कमरे का जरूरी सामान पैक कर लेना, जिसको कि चाहे तो साथ ले जाना, या फिर यही एक बक्से में रख देना, और जो फैंकना हो उसे अलग रख देना, हम कबाड़ में दे देंगे।” इतने में रसोई से कुमकुम ने कहा।

       “क्यों?” अंजना ने पूछा।

      “जिससे कि तेरा कमरा अपूर्व इस्तेमाल कर सके।” अपूर्व, कपिल और वंदना का 6 वर्षीय बेटा है।

       “लेकिन मेरा कमरा?” अंजना ने पूछा

      “अब इस घर में तुझे अपने कमरे का क्या करना है।” कुमकुम ने रसोई से ही जवाब दिया।

 

      जिस घर में जन्म हुआ, जिस घर के आँगन में खेली-कूदी, पूरा बचपन बीता, जहाँ मम्मी-पापा, भाई-भाभी, भतीजा रहते हैं, जिस घर के आस-पड़ोस की लड़कियाँ सहेली बनी, जिसकी दीवारें अपनी लगती हैं, जिसके कण-कण में से अपनेपन की खुशबू आती है, जिसकी हवा भी अपनी लगती है, उसे कुछ ही क्षणों में पराया कर दिया, क्या यह एक लड़की को शादी के बाद मायके की तरफ से मिली सजा नहीं?”  कुमकुम के द्वारा कहते ही अंजना ने बड़बड़ाते हुए स्वंय से ही कहा, लेकिन किसी ने भी उसकी तरफ ध्यान नहीं दिया।

 

     कुछ देर बाद सबने मिलकर दोपहर खाना खाया, और इसी दौरान सबने अंजना से उसके ससुरालवालों के बारे में बातचीत की, और फिर सब आराम करने के इरादे से अपने-अपने कमरें में चले गए, और अंजना अपने कमरे में, जो कि कुछ देर पहले तक उसका था, पुरानी यादें ताज़ा करने के लिए, ये सोचकर कि अगली बार इसमे कुछ पल बिताने का मौका मिले या, ना मिले।

 

      शाम को जब प्रणव, अंजना को लिवाने आया, तो डिनर में उसके लिए कुमकुम, और वंदना ने अनगिनीत पकवान बनाए, और उसकी खूब खातिरदारी की, गौतम जी, और कपिल ने घर के दामाद जी से ढेरों बातें की, अपूर्व ने भी उसका खूब मनोरंजन किया, ये सब देख अंजना को बस एक दिखावे का एहसास हो रहा था, लेकिन उसने कुछ नहीं कहा, और कुछ देर बाद वो ढेरों मिठाइयाँ, व उपहार लेकर वापिस अपने ससुराल चली गयी।

 

      अंजना की शादी को एक महीना हो चुका है, अब वो अपने ससुराल के रंग-ढ़ंग में ढलने लगी है, यहाँ उसे अपनेपन का एहसास होने लगा है, उसकी राय को अहमियत दी जाती है, “सरिता, आज का खाना अंजना से पूछकर उसकी पसंद का बनाना।” इस एक महीनें में तीन-चार बार अपनी सास महिमा के मुँह से ये वाक्य सुन अंजना को तसल्ली है कि इस घर में उसकी पसंद-नापसंद को भी तवज्जो दी जाती है।

     यूँ तो शादी से पहले तक अंजना के मायके में भी उसकी अहमियत थी, लेकिन शादी के बाद इतनी जल्दी सबकुछ बदल जाएगा, ये तो उसने उम्मीद भी नहीं की थी, लेकिन अपने ससुराल को लेकर उसे ऐसा नहीं लगता, क्योंकि कहते है जिस घर में लड़की की डोली जाती है, उसी घर से उसकी अर्थी उठती है, तो ये तो तय है कि अब अंजना का ससुराल ही उसका घर है, यहाँ कोई उसे पराया नहीं कहेगा।

 

     वक्त गुजरता जा रहा था, और इसी गुजरते वक्त के साथ अंजना भावनात्मक रूप से अपने मायके से जितनी दूर होती जा रही थी, उतनी ही ससुराल वालों के नजदीक आती जा रही थी।


     प्रणव, और अंजना की शादी के 8 महीनें बाद एक बार जब महिमा, कुछ दिनों के लिए अपने मायके किसी कार्यक्रम में सम्मिलित होने गयी हुई थी तो पीछे से अंजना ने ड्रॉइंग-रूम की साज-सज्जा मैं कुछ बदलाव कर डाले, जिन्हे वापिस आकर देख “ये ड्रॉइंग-रूम का इन्टीरीअर किससे पूछकर चेंज किया तुमने?” महिमा ने गुस्से में पूछा।

      “इसमे पूछना क्या है मम्मी जी, मेरा घर है, इतना फ़ैसला तो मैं इसके बारे में ले ही सकती हूँ ना” अंजना ने बड़ी ही सहजता से जवाब दिया।

     “देखों तुम्हे जो भी अपने मन की करनी है, अपने माँ के घर जाकर करना, यहाँ वहीं होगा जो मैं चाहूँगी।” महिमा के कहते ही,

     “आपका मतलब है, मैं इस घर के संदर्भ में कोई भी फ़ैसला नहीं ले सकती?” अंजना ने भर्राई हुए आवाज में पूछा।

    “हम्म, इस घर में क्या होगा, क्या नहीं, इसका फ़ैसला मैं लूँगी, तुम नहीं” इतना कह महिमा पैर पटकते हुए अपने कमरे में चली गयी, और वहाँ रह गयी आँखों में आँसू लिए अंजना।

 

     शाम को जब प्रणव बैंक से लौटा तो, “प्रणव, आज........” और फिर अंजना ने प्रणव को पूरी बात विस्तारपूर्वक बता डाली।

      “इसमे इतना परेशान होने वाली क्या बात है, मम्मी का ये व्यवहार तो स्वभाविक है, अरे अंजना, पिछले कई सालों से मम्मी इस घर के बारे में अकेली फ़ैसले ले रही है, और अब तुमने उनसे बिना सलाह-मशवरा किए बदलाव कर दिया, तो उन्हे अजीब तो लगेगा ही, चिंता मत करो, एक-दो दिन मैं सब ठीक हो जाएगा, और जल्दी ही वो दिन भी आ जाएगा जब मम्मी तुम्हें दुत्कारने के बजाय, तुम्हें सराहेंगी।” प्रणव के समझाने पर अंजना को भी उसकी बात सही लगी, और फिर वो सामान्य हो गयी, एवं कुछ दिनों बाद महिमा ने भी ड्रॉइंग रूम के इन्टीरीअर को अपना लिया।

       

     दो महीनें बाद, “कल रक्षाबंधन का त्यौहार है, शादी के बाद मेरा पहला रक्षाबंधन, क्यों ना भैया, भाभी, और अपूर्व को यहाँ खाने पर बुला लूँ।” अंजना ने उत्साहित होते हुए स्वयं से ही कहा, और फिर कपिल को फोन लगा, उसे, वंदना, और अपूर्व को रक्षाबंधन के लिए आमंत्रित कर डाला।

 

     अगले दिन जब कपिल, वंदना, और अपूर्व आए तो सबने उनकी खूब खातिरदारी की, उनके साथ सबने बहुत सारी बातें की, अंजना ने अपने मायके वालों के लिए उनकी पसंद का खाना अपने हाथों से बनाया, अपूर्व की पसंद का पिज्जा भी बनाया, और फिर कपिल के हाथ में एक मिठाई का डिब्बा, और अपूर्व को चॉकलेट देकर विदा किया।

 

    “किससे पूछकर तुमने अपने मायके वालों को बुलाया?” सबके जाने के बाद महिमा ने अंजना को अपने कमरे में बुलाकर पूछा।

    “मम्मी जी, इसमे पूछने वाली क्या बात है, मेरा घर है, मैं किसी को भी बुला सकती हूँ।” अंजना ने बड़ी ही सहजता से जवाब दिया। 

    “ये तुम्हारा नहीं मेरा घर है, और आगे से किसी को भी आमंत्रित करने से पहले तुम मुझसे पूछोगी, अगर तुम्हें अपनी मनमानी करनी है तो, अपनी माँ के घर जाकर करना, यहाँ नहीं, समझीपहले अपनी मर्जी से ड्रॉइंगरूम का इन्टीरीअर चेंज कर दिया, अब मेरे घर में अपने भाई-भाभी को इन्वाइट कर लिया....?” और इतना कह महिमा गुस्से से अंजना को घूरने लगी, लेकिन अंजना बिना कोई प्रतिक्रिया दिए चुपचाप महिमा के कमरे से बाहर आ गयी।अपने अस्तित्व को लेकर मन में उठ रहे सवालों के साथ, जैसे कि जिस घर में उसका जन्म हुआ वो भी उसका नहीं, जिस घर से उसकी अर्थी उठेगी वो भी उसका नहीं, तो फिर उसका घर कौनसा है, जिस परिवार ने उसे आसानी से त्याग दिया वो, या जो उसे अपना ही पा रहा है वो?

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