Aam Ka Ped / आम का पेड़ ( Story On Self Centeredness)

 

     ये किस्सा तकरीबन 10 साल पुराना है, जब मैं अपने परिवार के साथ अपने पति की नौकरी की वजह से राजस्थान के एक छोटे से गाँव खिचन में शिफ्ट हुई थी, हमारे घर के सामने वाले घर में मीठी नाम की एक ठिगने कद, एवं थोड़े भारी शरीर वाली महिला रहती थी, उम्र लगभग 60-65 वर्ष होगी, उन्होंने कभी शादी नहीं की, कम उम्र में ही माँ-बाप का साथ छूट गया, घर की बड़ी बेटी होने की वजह से पूरी ज़िंदगी अपने से छोटी चार बहनों के नाम कर दी, पढ़ा-लिखाकर उनका विवाह सम्पन्न परिवारों में किया, और शादी के बाद भी उनकी खैर-खबर लेती रही, लेकिन कुछ सालों बाद ही सभी बहनें अपने-अपने परिवारों के साथ इस कदर व्यस्त हो गयी कि उन्होंने मीठी से मिलने आना तो दूर फोन पर बात करना तक बंद कर दिया।

    गुजरते वक्त के साथ बहनों से तो दूरियाँ बढ़ती गयी, लेकिन मीठी के मिलनसार स्वभाव की वजह से गाँव वालों से नज़दीकियाँ, शुरुआत में तो सभी उन्हे मीठी दीदी कहते, और अपने बच्चों को मीठी मौसी पुकारने को कहते, फिर धीरे-धीरे सभी उन्हे मीठी मौसी कहने लगे, मीठी मौसी के घर के आँगन में एक आम का पेड़ लगा हुआ था, जो कि उन्हे उनकी जान से भी प्यारा था।

   “चल हट, उतर पेड़ से नीचे, पचास बार कहा है कि नज़र मत डाला करो मेरे आम के पेड़ पर, लेकिन तुम सब अपनी आदतों से बाज ही नहीं आते हो।” अपने घर के बगीचे में लगे आम के पेड़ पर गाँव के बच्चों को चढ़ता हुआ देख मीठी मौसी डंडा ले, चिल्लाती हुई, उन बच्चों की ओर भागी।

   “क्या हुआ मौसी, क्यों चिल्ला रही हो?” इतने में पड़ोस में रहने वाली गंगा ने पूछा।

   “नाक में दम कर रखा है इन बच्चों ने, भरी दोपहरी में भी चैन नहीं।” मीठी मौसी ने गुस्से से आँखें निकालते हुए कहा।

   “अरे मौसी, ये दोपहरी ही तो है, जब तुम थोड़ी देर के लिए शांति से सो जाती हो, और बच्चों को आम तोड़ने का मौका मिल जाता है, लेकिन आज तो तुमने उनसे वो मौका भी छीन लिया, बददुआ दे रहे होंगे बेचारे तुम्हें” गंगा ने विनोद करते हुए कहा।

  “मुझे तो लगता है तू भी मिली हुई है इन नटखटों से, बता कितने आम देते हैं तुझे दलाली में” मीठी मौसी के कहते ही,

  “हे राम, ऐसा लांछन तो ना लगाओ मौसी, मैं क्यों दलाली लेने लगी।”

  “तो क्या बिन दलाली ही बच्चों की आम चुराने में मदद कर रही है?”

  “हम्म.......नहीं,,नहीं,,नहीं, अरे मौसी मुझे तो कुछ पता ही नहीं कि ये बच्चे कब आते हैं, आम तोड़ने।”

  “सब समझती हूँ, पूरा गाँव मिला हुआ है, सबकी नज़र रहती है मेरे आम के पेड़ पर, लेकिन अब एक तरकीब सोच ली है मैंने”

  “वो क्या मौसी?”

  “कटवा डालूँगी पेड़ को, ना रहेगा बाँस, ना बजेगी बाँसुरी”

  “ऐसा गजब मत करो मौसी, तुम्हारे पेड़ के कच्चे आमों से ही तो गाँव के हर घर में साल भर का आचार डलता है, पेड़ के नीचे बैठ, उसकी छाया से राहगीरों को तृप्ति मिलती है, अरे तुम्हारे पेड़ के पके आम तो बाजार के आमों से भी अधिक स्वादिष्ट लगते हैं।” गंगा ने मीठी मौसी की चापलूसी करते हुए कहा।

   “अगर ऐसी ही बात है तो क्यों नहीं गाँव वाले बारी-बारी से पेड़ की चौकीदारी करते।” मीठी मौसी के कहते ही,

   “चौकीदारी !” गंगा ने धीमे स्वर में आश्चर्य से पूछा।

  “हम्म, चौकीदारी, क्यों निकल गयी हवा, बिन मेहनत आम सबको चाहिए, लेकिन कभी कोई ये नहीं कहता कि मौसी, थोड़ा आराम कर लो, पक्षियों से, और गाँव के नटखट बच्चों से हम बचायेंगे तुम्हारे पेड़ को” इतना कह मुँह मोड मौसी बड़बड़ाती हुई घर के अंदर चली गयी, और गंगा कुछ ना कह सकी।

   सच में उस दिन कुछ गलत नहीं कहा था मीठी मौसी ने, यही तो उनकी बहनों ने किया, मतलब निकलते ही मुँह मोड लिया, अब पलटकर अपनी माँ सामान बहन के हालचाल लेने भी नहीं आती, और वही गलती ये गाँव वाले कर रहे हैं, किसी को कच्चे, तो किसी को पके आम चाहिए, लेकिन मीठी मौसी को इन आमों को सही-सलामत रखने के लिए क्या-क्या पापड़ बेलने पड़ते हैं, ये कोई नहीं जानना चाहता। लेकिन इस साल आमों का मौसम जाते ही, मीठी मौसी ने पेड़ का कटवा उसकी चौकीदारी का झंझट ही  खत्म कर दिया, लेकिन आम अब भी आते हैं हर घर में, कभी बाजार से, तो कभी किसी दूसरे घर में लगे पेड़ से, लेकिन मीठी मौसी का जिक्र किसी की ज़ुबान पर नहीं आता। 

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