Pyar Ka chkrvyuh / प्यार का चक्रव्यूह (Story On Murder In Love)

    “मेरी समझ में नहीं आ रहा है कि हम कब तक यूँ छुप-छुपकर मिलते रहेंगे?” घर से सब्जी मंडी जा रही हूँ, ये बहाना बनाकर दूर एक कॉलोनी में बने गार्डन में 25 वर्षीय लंबे कद, सावलें रंग के अपने बॉय फ्रेंड दीपक से मिलने गयी 21 वर्षीय सामान्य कद-काठी, गोरे रंग वाली वृंदा ने पूछा।

    “किससे, तुम्हारे पति से, या मेरी बीवी से?” दीपक ने मज़ाकिया लहजें में पूछा।

    “दोनों से, मेरा कई बार मन करता है कि मार डालूँ दोनों को” दाँत पिसते हुए वृंदा ने जैसे ही कहा,

     “अगर इतनी हिम्मत होती तो कब का मार चुकी होती।”

   “हिम्मत की तो बात ही मत करना, वो तो मैं किसी की हत्या का पाप नहीं करना चाहती।” वृंदा के कहते ही,

    “अरे मेरी धर्मात्मा वृंदा” और दीपक के इतना कहते ही वृंदा, और दीपक ठहाका लगाकर हँस पड़े।

     “अच्छा छोड़ो अब मस्ती मज़ाक, और प्लान बनाओ की कैसे दोनों को ठिकाने लगाना है?” इतने में वृंदा ने पूछा।

    “मेरे पास एक सालिड आइडिया है।”

     “वो क्या?”

    “देखों, हम कुछ नहीं करेंगे, जो करना है वो दोनों ही करेंगे, हम तो सिर्फ तमाशा देखेंगे।” दीपक ने आँखें बड़ी करते हुए कहा।

    “वो दोनों क्या करेंगे, वो तो आपस में एक-दूसरे को जानते भी नहीं” वृंदा के कहते ही,

    “जानेगे, और जल्द ही एक-दूसरे को जानेंगे वृंदा रानी, तुम तो बस तमाशा देखती जाओ।” दीपक ने प्यार से वृंदा का गाल खींचते हुए कहा।

     “ठीक है, जो भी आइडिया है मुझे बाद में बताना, फिलहाल मुझे सब्जी लेते हुए घर के लिए निकलना है, नहीं तो मेरा पति कहेगा, इतना टाइम लगता है क्या सब्जी लाने में” इतना कह वृंदा वापिस जाने लगी, लेकिन दीपक वहीं बैठ कुछ सोचने लगा।

 

    5 साल पहले की बात है, जयपुर से 35 किलोमीटर दूर बगरु के रहने वाले एक फल विक्रेता की बेटी वृंदा, जो कि उस समय 16 साल की थी, बचपन से ही अपने पड़ोसी हस्तशिल्पकार के बेटे दीपक, जो कि उस समय 20 वर्ष का था, से प्यार करती थी, और दीपक भी उससे बहुत प्यार करता था, जिसकी जानकारी दोनों के ही परिवारवालों को कतई नहीं थी, फिर भी वो इन दोनों के मिलने, बातें करने पर पाबंदी लगाते, क्योंकि उन्हे डर था कि बड़े होते हुए लड़का-लड़की मिलेंगे, बातें करेंगे, तो गाँव वाले पचास बातें बनायेंगे, और वृंदा की बदनामी हो जाएगी, और फिर उसका ब्याह करना मुश्किल हो जाएगा।

    घरवालों की पाबंदी के बावजूद वृंदा, और दीपक किसी ना किसी बहाने से चोरी-चुपके मिलते, कभी कही, तो कभी कहीं, लेकिन एक दिन इन दोनों को गाँव के कुछ लोगों ने मिलते हुए देख लिया, और उन्होंने पूरे गाँव में खबर फ़ैला दी कि वृंदा, और दीपक का कुछ चक्कर चल रहा है, और ये खबर इन दोनों के परिवारवालों तक भी पहुँची, गाँव में हंगामा खड़ा हो गया, पंचायत बुलाई गयी जिसमे दोनों के ही परिवारवालों को बुलवाया गया, काफी बहसबाजी हुई, कुछ लोग दीपक, और वृंदा के सख्त खिलाफ थे, तो कुछ उनके पक्ष में, लेकिन पंचायत का फ़ैसला दोनों के खिलाफ गया।

    इसके बाद वृंदा के परिवारवालों ने उसका घर से निकलना बिल्कुल करवा दिया, और उसके लिए आस-पास के गाँवों में कोई अच्छा-सा लड़का ढूँढने लगे, कुछ महीनों की कड़ी मेहनत के बाद जयपुर में रहने वाले, और वहीं एक मेडिकल शॉप पर काम करने वाले अजीत के साथ वृंदा की शादी पक्की हो गयी, और कुछ हफ्तों बाद बड़ी ही सादगी से वृंदा का ब्याह कर उसे विदा कर दिया गया।

    अब किसी को कोई चिंता नहीं थी, लेकिन दीपक, वृंदा के बिना बेचैन होने लगा, वो जल्द से जल्द जयपुर जाकर वृंदा को देखना चाहता था, उससे मिलना चाहता था, लेकिन ये सब मुमकिन नहीं था, क्योंकि उस समय अपने पिता के साथ हस्तशिल्पकारी का काम करने वाले दीपक के पास जाने का कोई बहाना नहीं था, और इसी वजह से दीपक मन मारकर रह जाता।

    वृंदा की शादी के एक महीनें बाद पास ही एक गाँव से दीपक के लिए पतली-दुबली, लंबे कद वाली कनक का रिश्ता आया। जिसे दीपक के परिवारवालों ने पहली ही नज़र में पसंद कर लिया, और बिना देर किये दोनों का विवाह कर दिया गया, लेकिन अब भी दीपक किसी भी तरह से जयपुर जाने के जुगाड़ लगाता रहता।

   “कनक, यहाँ बगरु में कुछ नहीं रखा है, हमें जीवन में उन्नति करनी चाहिए, कब तक कुएं के मेढक बने रहेंगे।” एक दिन दीपक ने कनक से कहा।

     “तो फिर क्या करना चाहिए?” कनक के पूछते ही,

    “किसी बड़े शहर में जाकर कुछ बड़ा काम करना चाहिए, जिससे कि कमाई भी ज्यादा हो, और हम अच्छी ज़िंदगी जी पाए।” दीपक ने ये बात कुछ इस ढ़ंग से कही कि कनक उससे प्रभावित हुए बिना नहीं रह सकी, और वो भी शहर जाने के लिए आतुर हो गयी।

    कनक का साथ मिलते ही दीपक की लॉटरी लग गयी, उसने कनक के कँधे पर बंदूक रख अपने माँ-बाप से जयपुर जाने की इजाजत माँगनी शुरू कर दी, अगर वो नानुकूर करते तो कनक जिद पर अड़ जाती, और कहती जब ज़िंदगी में अच्छे से जीने का मौका मिल रहा है तो क्यों छोड़े उसे, दूसरी ओर दीपक के पिताजी के कहने पर कनक के मायके वालों ने भी उसे समझाने की बहुत कोशिश की, लेकिन कनक, और दीपक की जिद के आगे किसी की नहीं चली, और कुछ दिनों बाद ही दोनों अपना सामान बाँध जयपुर के लिए रवाना हो गए।

   जयपुर पहुँचने के बाद दीपक का सबसे पहला काम था, वृंदा को ढूँढना, क्योंकि उसी के मुताबिक दीपक को अपने रहने का ठिकाना ढूँढना था, और काम की तलाश भी वहीं आस-पास करनी थी, और ये सभी काम उसने एक महीनें के अंतराल में कर लिए, रहने के लिए विध्याधर नगर मंदिर मोड पर एक रूम मिल गया, जो कि वृंदा की गली से अगली गली में ही था, एवं वहीं पास में एक स्कूल में चपरासी का काम, यहाँ तक कि कनक को भी एक ब्यूटी-पार्लर में काम मिल गया, और अजीत भी मंदिर मोड पर स्थित एक मेडिकल शॉप पर काम करता था, सब कुछ पूरी प्लानिंग के साथ हो रहा था, जिसका अजीत, और कनक को तिल भर भी अंदाजा नहीं था। सबकुछ सेट हो जाने के बाद शुरू हुआ दोनों पुराने प्रेमियों का चोरी-चोरी मिलना।

    

    “दीपक, क्या सोचा तुमने कैसे ठिकाने लगाना है दोनों को” अगले दिन उसी पार्क में मिलने आयी वृंदा ने दीपक से पूछा।

   “सुनों........” और फिर दीपक ने अपना आइडिया विस्तारपूर्वक वृंदा को सुना डाला।

    “आइडिया तो अच्छा है, काम करेगा?” वृंदा के पूछते ही,

   “100%”

   “ठीक है तो फिर तुम लग जाओ काम पर” वृंदा के कहते ही, 

   “मौका देखकर मिशन शुरू करता हूँ।” दीपक ने जवाब दिया।

    

    तकरीबन 2 हफ्ते बाद, “सुनों जी, पता नहीं क्यों आज मेरे पेट में दर्द हो रहा है।” कनक ने अपना पेट पकड़ करहाते हुए कहा।

    “डॉक्टर के पास ले चलूँ।” दीपक ने पूछा।

   “नहीं, शायद गैस होगी, ऐसा करो, काला नमक, अजवाइन दे दो” और फिर दीपक ने वैसा ही किया जैसा कि कनक ने कहा, लेकिन उसके दर्द में कोई फ़र्क नहीं पड़ा, तो फिर दीपक पास की मेडिकल शॉप से जिसमे कि अजीत काम करता था पेट दर्द की दवाई ले आया, (दरअसल पिछले दो हफ्तों में दीपक ने अजीत से अच्छी दोस्ती कर ली थी, और अजीत, कनक को भी अच्छे से जानने लगा था, और अजीत की नज़रों में वृंदा, कनक, और दीपक को, लेकिन अजीत, और कनक में से किसी को भी वृंदा, और दीपक के रिश्ते को लेकर कोई अंदाजा नहीं था।) जिसे लेकर कनक की हालत पहले से भी बदतर हो गयी, उसे चक्कर आने लगे, एवं कुछ ही देर में बेहोश हो गयी, कनक की ये हालत देख घबराया हुआ दीपक उसे ले अस्पताल भागा, लेकिन वहाँ पहुँचने से पहले ही कनक ने दम तोड़ दिया।

   मेडिकल शॉप से ली गयी दवाई लेने के बाद ही कनक की हालत बिगड़ने की वजह से दीपक ने अजीत पर केस कर दिया, क्योंकि दवाई उसी ने दी थी, इस घटना के बाद मामला बिगड़ गया, अजीत जेल चला गया, और वृंदा के पास इतने पैसे नहीं थे कि उसकी जमानत करवा सके, और वैसे भी अजीत की जमानत होना मुश्किल थी, क्योंकि दीपक ने उस पर हत्या का इल्जाम लगाया।  

   लबोरेट्री में कनक को दी गयी दवाई की जाँच करने पर पता चला कि उसमे जहर था, लेकिन उसी प्रकार की अन्य दवाइयाँ में ऐसा कुछ नहीं था, इस वजह से ये माना गया कि उसमे जहर अजीत ने मिलाया है, पुलिस को जहर मिलाने का शक दीपक पर भी हुआ, जिसके तहत दीपक के घर की जाँच-पड़ताल की गयी, लेकिन वहाँ ऐसा कोई सबूत नहीं मिला, लेकिन दुकान में रखे अजीत के सामान में से वो ज़हर जरूर मिला, मामला साफ था, जहर अजीत ने ही दवाई में मिलाया था, लेकिन अब पुलिस इस सवाल का जवाब ढूँढने में लगी हुई थी कि आखिरकार अजीत ने ऐसा क्यों किया?

    

    कुछ दिनों बाद, दीपक अपना रास्ता साफ हो गया, लेकिन हमने तो ऐसा कोई प्लान नहीं बनाया था, और अजीत का कनक की दवाई में जहर मिलाने वाली बात तो मुझे बिल्कुल भी समझ नहीं आ रही, उसको क्या फ़ायदा होने वाला था कनक के मरने से, उसका क्या लेना देना।” वृंदा ने अपनी सवालिया नजरें दीपक पर डालते हुए पूछा।

    “पता नहीं, ऐसा करना, तुम अजीत से मिलने जेल जाना, और उससे सारी सच्चाई जानने की कोशिश करना।” दीपक ने कहा, और अगले दिन जब वृंदा, अजीत से मिलने जेल में गयी, और उससे दवाई में जहर मिलाने का कारण पूछा तो अजीत का जवाब सुन वृंदा के पैरों तले जमीन खिसक गयी।

   अजीत ने बताया कि वो, और कनक एक दूसरे से प्यार करते थे, दरअसल कनक का मायका, और अजीत का ननिहाल पड़ोसी थे, और जब भी अजीत अपने ननिहाल जाता कनक से जरूर मिलता, पहले तो दोनों बहुत अच्छे दोस्त बने, फिर धीर-धीरे दोनों में प्रेम का बीज पनपने लगा, गुजरते वक्त के साथ परिस्थिति कुछ ऐसी हो गयी कि दोनों कहीं भी हो, लेकिन दिन में एक बार फोन पर बात जरूर करते, दोनों ने पूरे ज़िंदगी एक-दूसरे के साथ गुजारने के वादे किये, लेकिन एक दिन अजीत के मम्मी-पापा ने उसका रिश्ता उससे बिना पूछे वृंदा के साथ तय कर दिया, अजीत के लाख मना करने के बावजूद वो नहीं माने, और अजीत, और वृंदा की शादी हो गयी। 

   शुरुआती दिनों में तो अजीत ने ये योजना बनाई कि वो वृंदा को इस हद तक परेशान करेगा कि वो उसे तलाक देने पर मजबूर हो जाए, लेकिन उसकी शादी के तकरीबन डेढ़ महीनें बाद ही कनक, की शादी दीपक से हो गयी, फिर भी अजीत ने हिम्मत नहीं हारी, और लगातार कनक से संपर्क बनाने की कोशिश करता रहा, लेकिन एक दिन जब कनक ने उससे कहा कि अब हमारा कोई रिश्ता नहीं, अब दीपक ही मेरे सबकुछ है, तो अजीत टूट गया, उसने कनक को समझाने की बहुत कोशिश की, लेकिन वो नहीं मानी, वो दिल से दीपक को अपना पति मान चुकी थी, और कनक के इसी उपेक्षा भरे व्यवहार को देखते हुए अजीत ने एक दिन गुस्से में उसकी कसम खा कर कहा कि अगर तू मेरी नहीं हो सकती तो किसी की नहीं होने दूँगा, जान ले लूँगा तेरी, चाहे इसके लिए मुझे पूरी ज़िंदगी जेल में गुजारनी पड़े।......और उसने वो सब कर दिखाया

    अजीत के मुँह से पूरा किस्सा सुन वृंदा के ज़ेहन में यही ख्याल आया कि हम फालतू में ही टेंशन ले रहे थे, यहाँ तो किस्मत खुद मुझे, और दीपक को मिलवाने के लिए आतुर थी।  


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