Gautmi Taai / गौतमी ताई ( Story On Resilient Women)
आज मौसम बेहद ही सुहावना है, सुबह से शीतल बयार चल रही है, पेड़-पौधे हवाओं के इशारों पे नृत्य कर रहे हैं, कोयलें समां बाँधने के इरादे से मधुर गीत गा रही हैं, तो कहीं-कहीं अपनी खुशी ज़ाहिर करने के लिए मयूर नृत्य कर रहे हैं।
अपने कमरे की खिड़की के नजदीक बैठी 60 वर्षीय गौतमी ताई, पिछले दो घंटे से इस मनोरम दृश्य का आनंद ले रही है, “काश अब बारिश हो जाए, तो मज़ा आ जाए।” गौतमी ताई ने बुदनुदाते हुए कहा।
“क्या कहा?” इतने में कुछ दूर खड़ी गौतमी ताई की बहु 35 वर्षीय सीमा ने पूछा।
“बारिश को बुला रही हूँ।”
“अगर बारिश आ गयी तो आपका तो कुछ नहीं बिगड़ेगा, लेकिन मेरे बच्चे स्कूल से लौटते हुए भीग जायेंगे।” सीमा ने मुँह बनाते हुए कहा।
“अरे सीमा बेटा, इतना भी कमजोर ना बनाओ अपने बच्चों को, कि दो बूँद बरसात की बर्दाश्त ना कर पाए अपने बदन पर” गौतमी ताई के कहते ही,
“कमजोर बनाने वाली बात ही नहीं है, अगले हफ्ते से एग्जाम हैं दोनों के”
“अरे भीग भी गए तो गरम-गरम काढ़ा बनाकर पिला दूँगी मैं, कुछ नहीं होगा फिर” गौतमी ताई के कहते ही,
“ये सब घरेलू नुस्खे आपके ज़माने के लिए सही थे, आजकल इनका कोई वजूद नहीं, और वैसे भी क्यों बहस कर रही हूँ मैं आपसे, आपको क्या फ़र्क पड़ता है, किसी के जीने-मरने से आप तो अपनी दुनिया में मस्त हो।” सीमा के कहते ही,
“कितना कड़वा बोलती हो तुम, अरे मुझे किस बात से फ़र्क पड़ता है, और किस बात से नहीं, ये दुनिया को चिल्ला-चिल्लाकर बताऊँगी क्या, ये तो सामने वाले को स्वयं समझ जाना चाहिए, और अगर तुम्हें ये लगता है कि मेरे पोते-पोती के बीमार पड़ने से मुझे कोई फ़र्क नहीं पड़ता तो, माफ करना सीमा बेटा, तुम निहायती बेवकूफ़ हूँ, खैर मैं भी पागल हूँ जो तुम्हारे साथ बहस कर रही हूँ।” इतना कहते ही गौतमी ताई टप-टप बरसा पानी, पानी ने आग लगाई......गीत .गुनगुनाने लगी।
गौतमी ताई महाराष्ट्र के नासिक शहर में पिछले 40 साल से रह रही है, अपने पति चंदन के साथ नासिक के इसी घर में तो सुनबाई बनकर आयी थी, यहाँ आने के एक साल बाद ही एक प्यारे से बेटे केशव की माँ बन गयी, और उसके एक साल बाद पति चंदन की सड़क दुर्घटना में मौत हो जाने की वजह से विधवा भी हो गयी, माता-पिता का साया बचपन में ही सिर से उठ गया, जवानी में पति का साथ।
इस दुनिया में बिल्कुल अकेली हो गयी थी गौतमी ताई, घर चलाने के लिए कमाई का भी कोई साधन नहीं था, छोटा-सा केशव का कैसे पेट भरे बस इसी कोशिश में लगी रहती, लेकिन कहीं कोई काम ही नहीं मिलता, अगर काम मिलता भी तो ज्यादा पैसा नहीं मिलता, फिर भी गौतमी ताई ने हिम्मत नहीं हारी, और घर से कपड़े सिलने का काम शुरू कर दिया, औरतों के सलवार-सूट, ब्लाउज, पेटीकोट आदि सिलना, साड़ी पर फ़ाल लगाना, और भी सिलाई से संबंधित छोटे-मोटे काम शुरू कर दिए, शुरुआती दिनों में तो गौतमी ताई को ग्राहक आकर्षित करने में काफी परेशानियों का सामना करना पड़ा, लेकिन फिर बाद में सब सही हो गया, और एक दिन ऐसा भी आया जब गौतमी ताई ने अपनी एक छोटी-सी दुकान कर ली, जिसमे मदद के लिए एक लड़की विधा को भी रख लिया, जो कि बेचारी स्वयं मजबूरी की मारी थी, और इस वजह से कम तनख्वाह में दुकान पर काम करने को तैयार हो गयी।
यूँ तो अब विधा का साथ था, फिर भी गौतमी ताई के संघर्ष का समय कुछ ज्यादा ही लंबा था, इतना कि केशव शादी के लायक हो गया, और अब उन्हे केशव का घर बसाने की चिंता सताने लगी, गौतमी ताई ने भले ही जीवन-यापन के लिए भरपूर संघर्ष किया हो, लेकिन उसका नतीजा ये निकला कि केशव सरकारी दफ्तर में बाबू हो गया, और उसके कार्यस्थल पर उसकी इज्जत भी होने लगी, और इसी वजह से उसके ब्याह में ज्यादा मुश्किलें नहीं आयी, और केशव के दफ्तर में ही काम करने वाले बड़े बाबू ने सामने से अपनी बेटी सीमा का रिश्ता उसके लिए सुझा दिया।
केशव की शादी सीमा से हो चुकी थी, अब गौतमी ताई के जीवन में सबकुछ सही चलने लगा था, बेटा अच्छा कमाने लगा था, बहु ने पूरे घर की जिम्मेदारी अपने ऊपर ले ली थी, और ये सब देख गौतमी ताई ने दुकान का काम विधा के जिम्मे छोड़ आराम करने का विचार किया, लेकिन गौतमी ताई को आराम कहाँ, दुकान की जिम्मेदारी छोड़ी तो पता चला कि सीमा गर्भवती है, तो घर की जिम्मेदारियों ने आ घेरा।
समय गुजरता गया, कुछ महीनों बाद सीमा ने एक बेटे को जन्म दिया, पोते के आने से गौतमी ताई बहुत खुश थी, वो रात-दिन अपने नवजात पोते, और बहु की सेवा में ही लगी रहती, दूसरी ओर दुकान की जिम्मेदारी पूरी तरह से विधा ने संभाल ली थी, सबकुछ बहुत अच्छा चल रहा था, इसी प्रकार एक साल बीत गया, और इसी दौरान पता चला कि सीमा फिर से गर्भवती है, जिस वजह से गौतमी ताई की जिम्मेदारी पहले से भी ज्यादा बढ़ गयी, लेकिन उन्होंने अपनी जिम्मेदारी खुशी-खुशी निभाई।
कुछ महीनों बाद सीमा फिर से माँ बनी, इस बार उसने एक बेटी को जन्म दिया, घर में हर तरफ खुशी का माहौल था, क्योंकि केशव, और सीमा की बेटी उनकी ज़िंदगी में भाग्यशाली बनकर आयी थी, उसके आते ही केशव को प्रमोशन मिल गया, लेकिन ये अच्छा वक्त कुछ समय के लिए ही था, क्योंकि बदकिस्मती से जिस दिन केशव की बेटी एक महीने की हुई उसी दिन केशव एक सड़क दुर्घटना में ये दुनिया छोड़कर चला गया, उसके जाते ही गौतमी ताई, और सीमा की ज़िंदगी जैसे थम-सी गयी, अब आगे क्या होगा, क्या नहीं, आगे की ज़िंदगी कैसे गुजरेगी, बच्चों की परवरिश कैसे होगी, ढेरों सवाल थे सीमा के ज़ेहन में, लेकिन गौतमी ताई अपने बेटे के चले जाने की वजह से अंदर से पूरी तरह से टूट जाने पर भी फिर से उठकर खड़ी हुई, और उन्होंने अपनी बहु, और पोते-पोती को संभाला, बहु की पास ही के एक स्कूल में टीचर की नौकरी लगवाई, और खुद फिर से दुकान का काम देखने लगी, जिससे कि काम ज्यादा आए, गौतमी ताई ने मुश्किल वक्त में डटकर खड़े रह कर एक मिसाल कायम कर दी थी, अपने समाज में।
“माँ” अभी गौतमी ताई खिड़की से बाहर के नज़ारों का लुफ़्त उठा ही रही थी कि इतने में सीमा उसके पैरों में आकर बैठ गयी।
“क्या हुआ?” गौतमी ताई ने मुस्कुराते हुए पूछा।
“मुझे माफ कर दीजिए।”
“क्यों, कुछ गलती हुई है तुझसे?” गौतमी ताई ने सीमा का चेहरा अपने हथेली पे लेते हुए प्यार से पूछा।
“हम्म, मैंने कहा था ना कि आपको क्या फ़र्क पड़ता है किसी के जीने-मरने से उस बात के लिए”
“पगली, मैं तो कब का भूल चुकी हूँ उस बात को, अच्छा सुन बच्चे आते होंगे स्कूल से फटाफट आमरस-पूरी बना ले, आज कुछ अच्छा खाने का मन हो रहा है।” गौतमी ताई के कहते ही,
“हम्म” और फिर सीमा आमरस पूरी बनाने के इरादे से तुरंत रसोई की ओर चली गयी।
केशव के जाने के बाद गौतमी ताई, और सीमा का रिश्ता सास-बहु से बदलकर सहेलियों का हो चुका था, हर सुख-दुख की साथी थी दोनों, और हर मुश्किल वक्त के समय संभाला भी था एक-दूसरे को, इसलिए तो एक दूसरे की बात का बुरा मानना, नाराज होना, जैसी बातों की जगह नहीं थी इन दोनों की ज़िंदगी में।
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